India China Trade Policy : भारत और चीन के बीच बिगड़े रिश्तों में नरमी के संकेत तब दिखे हैं, जब अमेरिका के साथ टैरिफ विवाद अपने चरम पर है और भारत ने एक अहम रणनीतिक कदम पर विचार शुरू कर दिया है।
भारत और चीन के बीच रिश्तों को लेकर एक बड़ा और संवेदनशील मोड़ सामने आया है। नई दिल्ली में इस वक्त ऐसा संकेत मिल रहा है कि केंद्र सरकार पांच साल पुराने उस प्रतिबंध को हटाने पर विचार कर रही है, जिसके तहत चीनी कंपनियों को सरकारी ठेकों में हिस्सा लेने से रोका गया था। यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब भारत और अमेरिका के बीच टैरिफ डील अटकी हुई है और अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump लगातार भारत को लेकर कड़े बयान दे रहे हैं।
भारत-चीन रिश्तों में अचानक आई नरमी का संकेत
भारत और चीन कभी एक-दूसरे के सबसे बड़े रणनीतिक विरोधी माने जाते थे, खासकर 2020 में सीमा पर हुए तनाव के बाद। उसी दौर में भारत सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनज़र चीनी कंपनियों पर कड़ा प्रतिबंध लगाया था, जिसके चलते वे सरकारी टेंडर प्रक्रिया से बाहर हो गईं। लेकिन अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं। सूत्रों के हवाले से यह दावा किया गया है कि वित्त मंत्रालय ने इन प्रतिबंधों को हटाने की सिफारिश की है, ताकि चीन के साथ व्यापारिक रिश्तों को फिर से पटरी पर लाया जा सके।
वित्त मंत्रालय की प्लानिंग और PMO की भूमिका
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे अहम भूमिका प्रधानमंत्री कार्यालय की मानी जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त मंत्रालय की सिफारिशें अब सीधे PMO के पास पहुंच चुकी हैं और अंतिम फैसला वहीं से लिया जाएगा। अगर हरी झंडी मिलती है, तो चीनी कंपनियों के लिए भारत में सरकारी प्रोजेक्ट्स के दरवाजे दोबारा खुल सकते हैं। बताया जा रहा है कि कई मंत्रालयों ने उपकरणों की कमी और परियोजनाओं में हो रही देरी को लेकर सरकार को आगाह किया था, जिसके बाद इस प्रतिबंध पर पुनर्विचार शुरू हुआ।
गलवान के बाद चीन को लगा था बड़ा आर्थिक झटका
2020 में गलवान घाटी की हिंसक झड़प के बाद भारत ने जो फैसला लिया था, उसने चीन को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचाया था। उस समय चीनी कंपनियां करीब 700 से 750 अरब डॉलर के सरकारी टेंडरों से बाहर हो गई थीं। इतना ही नहीं, चीन की सरकारी कंपनी CRRC को 216 मिलियन डॉलर के ट्रेन निर्माण प्रोजेक्ट से भी बाहर कर दिया गया था। इसके बाद 2021 में चीनी कंपनियों को मिलने वाले नए प्रोजेक्ट्स की वैल्यू घटकर सिर्फ 1.67 अरब डॉलर रह गई थी।
अमेरिका से बढ़ता तनाव और ट्रंप फैक्टर
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे अमेरिका की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने हाल के दिनों में भारत पर टैरिफ बढ़ाने के संकेत दिए हैं और यहां तक कहा है कि जो देश रूस से तेल खरीदेंगे, उन पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सकता है। साथ ही अमेरिका की पाकिस्तान के साथ बढ़ती नजदीकियों ने भी भारत को रणनीतिक तौर पर सोचने पर मजबूर किया है।
चीन से नजदीकी, लेकिन पूरी सतर्कता के साथ
हालांकि भारत चीन के साथ व्यापारिक रिश्तों में सुधार की दिशा में कदम बढ़ा रहा है, लेकिन सरकार पूरी तरह अलर्ट भी है। यही वजह है कि चीनी कंपनियों के सरकारी टेंडर पर लगे प्रतिबंध हटाने पर विचार हो रहा है, लेकिन चीन से जुड़े प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) पर लगे अन्य प्रतिबंध अभी भी बरकरार हैं। साफ संकेत है कि भारत दोस्ती की ओर हाथ बढ़ा रहा है, लेकिन आंखें खुली रखकर।
रेयर अर्थ मिनरल और व्यापारिक मजबूरी
चीन ने भारत के लिए रेयर अर्थ मिनरल के आयात से जुड़े लाइसेंस जारी किए हैं, जो इलेक्ट्रिक वाहन और बैटरी स्टोरेज जैसे सेक्टर के लिए बेहद अहम माने जाते हैं। इससे दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग को नई दिशा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। इसी मुद्दे पर अमेरिका और चीन के बीच भी तनाव लगातार बना हुआ है।
विश्लेषण: ट्रंप की नीतियों ने बनाया नया समीकरण
इस पूरे घटनाक्रम को देखें तो साफ होता है कि अमेरिका की आक्रामक टैरिफ नीति और भारत पर लगातार बढ़ते दबाव ने नई दिल्ली को विकल्प तलाशने पर मजबूर कर दिया है। भारत-चीन-रूस की संभावित नजदीकियां इसी बदलते वैश्विक संतुलन का संकेत देती हैं। हालांकि चीन के इतिहास को देखते हुए भारत किसी भी तरह का जोखिम उठाने के मूड में नहीं है और हर कदम बेहद सोच-समझकर रखा जा रहा है।
मुख्य बातें (Key Points)
- भारत सरकार चीनी कंपनियों पर लगे 5 साल पुराने प्रतिबंध हटाने पर विचार कर रही है
- फैसला प्रधानमंत्री कार्यालय की मंजूरी पर निर्भर करेगा
- अमेरिका के साथ टैरिफ डील अटकी होने से भारत की रणनीति बदली
- गलवान के बाद चीनी कंपनियों को भारी आर्थिक नुकसान हुआ था
- चीन से नजदीकी बढ़ी, लेकिन भारत पूरी तरह सतर्क बना हुआ है








