India Defence Deal 2026: भारत इस वक्त अपने इतिहास की सबसे बड़ी डिफेंस डील के केंद्र में है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रोन भारत में हैं और करीब 40 बिलियन डॉलर (लगभग ₹3.4 लाख करोड़) की राफेल डील को अंतिम रूप दिया जा रहा है। दूसरी तरफ इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तेल अवीव पहुंचें और करीब 8.67 बिलियन डॉलर (लगभग ₹74,000 करोड़) की एक और डिफेंस डील पर मुहर लगे। यानी सिर्फ जनवरी-फरवरी 2026 में ही भारत ने कुल ₹4.5 लाख करोड़ की डिफेंस डील कर दी या करने जा रहा है। सवाल यह है कि इतनी बड़ी डील के पीछे असली वजह क्या है और टैक्सपेयर के पैसे का क्या हो रहा है?
2015 में मोदी ने क्या कहा था – “हम नंबर वन नहीं रहना चाहते”
ठीक 11 साल पहले 2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने एरो इंडिया कार्यक्रम में खुले तौर पर कहा था — “India has the reputation of the largest importer of defence equipment in the world. That may be music to the ears of some of you here, but this is one area where we would not like to be number one.” यानी भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक है और सरकार नहीं चाहती कि इस मामले में भारत नंबर वन बना रहे।
उस वक्त प्रधानमंत्री ने तीन बातें साफ-साफ कही थीं। पहला – जो भी देश भारत के साथ डिफेंस डील करे, उसे टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करनी होगी। दूसरा — प्रोडक्शन भारत में होगा। और तीसरा — इससे HAL (हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड) जैसी सरकारी कंपनियों को मजबूती मिलेगी।
लेकिन 11 साल बाद 2026 में भारत एक बार फिर दुनिया का सबसे बड़ा हथियार खरीदार बन चुका है। फ्रांस और इजराइल दोनों के साथ मिलाकर ₹4.5 लाख करोड़ की डील हो रही है।
फ्रांस से 114 राफेल — डील में क्या है?
डसॉ एविएशन के 114 राफेल मल्टीरोल फाइटर जेट्स की यह खरीद भारत की अब तक की सबसे बड़ी सैन्य खरीद (largest military hardware procurement) है। Defence Acquisition Council (DAC) ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। डील की शर्तों के मुताबिक 114 में से 18 जेट फ्लाई-अवे कंडीशन में सीधे फ्रांस से आएंगे, जबकि बाकी 96 राफेल भारत में बनाए जाएंगे। इसमें लगभग 60% स्वदेशी पार्ट्स का इस्तेमाल होगा और मेक इन इंडिया प्रोग्राम के तहत निर्माण होगा।
डसॉ एविएशन एक भारतीय कंपनी के साथ मिलकर प्रोडक्शन करेगी। हाल ही में डसॉ ने अपने जॉइंट वेंचर रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड में हिस्सेदारी 49% से बढ़ाकर 51% कर दी है। यानी इस साझेदारी में अनिल अंबानी की रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर भी शामिल है।
पिछली राफेल डील से क्या सबक मिला?
2016 में जब पहली बार 36 राफेल की डील हुई थी, तब भी यही वादा किया गया था कि फाइटर जेट भारत में बनेंगे और डसॉ एविएशन के साथ भारतीय कंपनी का जुड़ाव होगा। नागपुर के MIDC क्षेत्र में अनिल अंबानी की कंपनी खड़ी भी हुई, लेकिन वहां वैसा प्रोडक्शन कभी नहीं हुआ जिससे कहा जा सके कि राफेल भारत में बन रहा है। अब एक बार फिर वही वादे दोहराए जा रहे हैं — सवाल है कि इस बार हकीकत कितनी अलग होगी?
इजराइल से ₹74,000 करोड़ की डील — क्या-क्या मिलेगा?
इजराइल के साथ करीब 8.67 बिलियन डॉलर की डील में चार एडवांस्ड वेपन सिस्टम शामिल हैं। Rafael, Elbit Systems और Israel Aerospace Industries जैसी कंपनियों से यह हथियार खरीदे जाएंगे।
– SPICE 1000: इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल गाइडेंस वाले प्रिसिजन बम जो पिनपॉइंट सटीकता के साथ लक्ष्य को भेद सकते हैं।
– Rampage मिसाइल: एयर-टू-सरफेस मिसाइल जो सुखोई-30 और मिग-29 से दूर बैठकर बड़े ठिकानों को तबाह कर सकती है।
– Air Lora: एयर-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल जो भारतीय वायुसेना की मारक क्षमता को कई गुना बढ़ाएगी।
– Ice Breaker: AI-एनहांस्ड इंफ्रारेड गाइडेड मिसाइल जो जमीन और समुद्री दोनों लक्ष्यों को भेद सकती है।
प्रधानमंत्री मोदी 25-26 फरवरी को इजराइल दौरे पर जाएंगे, यह उनकी 2017 के बाद दूसरी इजराइल यात्रा होगी।
डिफेंस प्रोडक्शन में प्रगति — लेकिन सवाल बाकी
सरकार का दावा है कि 2014 में भारत का डिफेंस प्रोडक्शन ₹46,429 करोड़ था जो अब बढ़कर ₹1,57,000 करोड़ हो चुका है। डिफेंस एक्सपोर्ट भी ₹1,000 करोड़ से बढ़कर ₹23,000 करोड़ तक पहुंच गया है। निश्चित रूप से यह बड़ी प्रगति है।
लेकिन भारत दुनिया को बेचता क्या है? बुलेट प्रूफ जैकेट, पेट्रोल बोट्स, हेलीकॉप्टर, रडार, लाइटवेट टॉर्पिडोज और कुछ गोला-बारूद। तेजस अभी उस रूप में तैयार नहीं हुआ है कि दुनिया के बाजार में बिक सके। जिस स्तर की टेक्नोलॉजी और आत्मनिर्भरता की बात होनी चाहिए थी — फाइटर जेट, एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम — वह अभी गायब है।
R&D बजट सिर्फ ₹500 करोड़ — ₹4.5 लाख करोड़ की डील के मुकाबले
सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा यह है कि भारत का टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड (डीप टेक्नोलॉजी और R&D) का बजट सिर्फ ₹500 करोड़ है। यानी एक तरफ ₹4.5 लाख करोड़ विदेशी कंपनियों को दिए जा रहे हैं और दूसरी तरफ अपनी रिसर्च विंग के लिए मात्र ₹500 करोड़। यह अंतर बताता है कि आत्मनिर्भरता की दिशा में अभी कितना लंबा सफर बाकी है।
सरकारी कंपनियां हाशिए पर, प्राइवेट सेक्टर आगे
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने खुद बताया कि प्राइवेट सेक्टर की हिस्सेदारी अब कुल डिफेंस प्रोडक्शन का करीब 25-30% हो चुकी है। 462 कंपनियों को 788 इंडस्ट्रियल लाइसेंस बांटे गए हैं। अडानी डिफेंस, रिलायंस, टाटा, लार्सन एंड टुब्रो — सब इस क्षेत्र में आ चुके हैं।
एक बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि HAL, भारत डायनामिक्स, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, मझगांव डॉक, कोचीन शिपयार्ड जैसी सरकारी कंपनियां जो दशकों से डिफेंस प्रोडक्शन की रीढ़ रही हैं, वे DRDO की लिस्ट से धीरे-धीरे गायब हो रही हैं और उनकी जगह प्राइवेट कॉर्पोरेट्स ले रहे हैं।
₹7.85 लाख करोड़ का डिफेंस बजट — पैसा कहां जा रहा?
भारत का इस साल का कुल बजट करीब ₹53 लाख करोड़ है और डिफेंस बजट ₹7.85 लाख करोड़ — जो अब तक का सबसे बड़ा है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि सरकार खुद पर ही ₹16 लाख करोड़ से ज्यादा खर्च करती है — इस्टैब्लिशमेंट खर्च ₹8.24 लाख करोड़, वेतन ₹3.67 लाख करोड़ और अन्य प्रशासनिक खर्चे ₹4.5 लाख करोड़। यानी सरकार अपने ऊपर डिफेंस बजट से भी ज्यादा पैसा खर्च कर रही है और यह सारा पैसा अंततः टैक्सपेयर की जेब से आता है।
GST, इनकम टैक्स, कॉर्पोरेट टैक्स, कस्टम ड्यूटी, एक्साइज ड्यूटी, सेस — सब मिलाकर करीब ₹50 लाख करोड़ सीधे-सीधे आम जनता और कंपनियों से वसूला जाता है।
मैक्रोन क्यों थे सबसे ज्यादा खुश?
फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रोन की खुशी जाहिर थी। उनके देश को इतिहास का सबसे बड़ा डिफेंस एक्सपोर्ट ऑर्डर मिला है। पैसा भारत का जाएगा, प्रोडक्शन की कमाई फ्रांस की कंपनियों को मिलेगी। इसीलिए मुंबई की सड़कों पर सुबह-सुबह जॉगिंग करते मैक्रोन बेहद खुश नजर आए। ठीक उसी तरह नेतन्याहू भी बार-बार कह रहे हैं — “1.5 बिलियन लोगों वाले देश के प्रधानमंत्री आ रहे हैं, हमें उनका इंतजार है।”
मुख्य बातें (Key Points)
- फ्रांस से 114 राफेल (~₹3.4 लाख करोड़) और इजराइल से 4 एडवांस्ड वेपन सिस्टम (~₹74,000 करोड़) — कुल ₹4.5 लाख करोड़ की डिफेंस डील।
- 2015 में PM मोदी ने कहा था “हथियार आयात में नंबर वन नहीं रहना चाहते” — 2026 में भारत फिर दुनिया का सबसे बड़ा हथियार खरीदार बन चुका है।
- डिफेंस प्रोडक्शन ₹46,429 करोड़ से बढ़कर ₹1,57,000 करोड़ हुआ, लेकिन R&D बजट सिर्फ ₹500 करोड़ — आत्मनिर्भरता की राह अभी दूर।
- 462 प्राइवेट कंपनियों को 788 लाइसेंस बांटे गए — HAL जैसी सरकारी कंपनियां हाशिए पर, अडानी-अंबानी डिफेंस सेक्टर में आगे बढ़े।








