Gold Price History 2025: बीते साल 2025 में सोना सबसे बड़ा कीवर्ड बनकर उभरा है। महीने बीतते रहे और सोने के दाम रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड तोड़ते रहे। 2010 में जो सोना ₹18,500 प्रति 10 ग्राम था वह 2025 में ₹1,36,000 के पार निकल गया। यह सिर्फ कीमतों का उछाल नहीं है बल्कि यह महंगाई, वैश्विक अनिश्चितता और दुनिया की बदलती अर्थव्यवस्था की एक दमदार कहानी है जो हर भारतीय परिवार को सीधे तौर पर प्रभावित करती है।
सोने की चौंकाने वाली प्राइस जर्नी
पिछले 15 सालों में सोने की कीमतों ने जो सफर तय किया है वह किसी को भी हैरान कर सकता है। 2010 में सोना ₹18,500 प्रति 10 ग्राम था। अगले 10 सालों में यह बढ़कर ₹48,500 पर पहुंच गया। 2022 में सोने की कीमत ₹52,670 हो गई और फिर 2025 में तो सोने ने ₹1,36,000 का आंकड़ा पार कर लिया। मतलब साफ है कि सोने के दाम आसमान छू रहे हैं और यह रुकने का नाम नहीं ले रहे।
5000 साल पुराना है सोने का इतिहास
सोना किसी एक इंसान या किसी एक सभ्यता ने नहीं खोजा। इतिहास में यह अपने आप प्रकृति से मिला और अलग-अलग सभ्यताओं ने अलग-अलग समय पर इसका इस्तेमाल शुरू किया। सोने के इस्तेमाल के सबसे पुराने पुरातात्विक साक्ष्य आज से लगभग 5000 साल पुराने प्राचीन मिस्र से मिलते हैं।
नेशनल माइनिंग एसोसिएशन की माने तो पुराने समय में पूर्वी यूरोप के लोग सोने को गहने और सजावटी चीजें बनाने के लिए इस्तेमाल करते थे। लगभग 1500 ईसा पूर्व तक आते-आते मिस्र में सोने का व्यापार के लिए उपयोग होने लगा था।
प्राचीन मिस्र में सोने का धार्मिक महत्व
प्राचीन मिस्र में सोने का गहरा धार्मिक महत्व था। उस समय माना जाता था कि सोना ईश्वर के शरीर का हिस्सा है। इसी विश्वास के कारण मंदिरों और धार्मिक कार्यों में सोने का काफी चलन बढ़ा। इतना ही नहीं अमीर लोगों की कब्रों में सोने के ताबूत, मास्क और गहने रखे जाते थे ताकि आत्मा को अगले जीवन में किसी चीज की कमी न रहे।
भारत में हड़प्पा सभ्यता से है सोने का नाता
अगर भारत की बात करें तो हड़प्पा सभ्यता में भी सोने के पुरातात्विक साक्ष्य मिलते हैं। इतिहासकार बताते हैं कि कर्नाटक की कोलार गोल्ड फील्ड समेत अफगानिस्तान और ईरान जैसी जगहों से सोना सिंधु घाटी के शहरों तक पहुंचा।
वैदिक साहित्य में भी सोने पर मंत्र मिलते हैं। ऋग्वेद में सोने के लिए ‘हिरण्यम’ शब्द का प्रयोग किया गया है। यह दिखाता है कि सोना सिर्फ एक धातु नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक चलन का अहम हिस्सा था।
प्राचीन चीन में सोने को मानते थे अमरत्व का राज
प्राचीन चीन में तो सोने की कहानियां एक कदम और आगे जाती हैं। कई राजाओं का मानना था कि अगर सोने को पी लिया जाए तो बुढ़ापा रुक सकता है और इंसान हो जाएगा अमर। यह बताता है कि अलग-अलग सभ्यताओं में सोने को कितना खास माना जाता था और इसकी दीवानगी कोई नई बात नहीं है।
कैसे बना भारत ‘सोने की चिड़िया’?
ब्रिटिश राज से पहले भारत दुनिया का एक बड़ा व्यापारी देश था। भारत के मसाले, काली मिर्च, सिल्क और कॉटन यूरोप में खासे मशहूर थे। लेकिन बदले में उन देशों के पास देने के लिए सिर्फ सोना था या चांदी। 1700 आते-आते भारत दुनिया की जीडीपी में लगभग 24 से 27 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता था जबकि पूरे यूरोप की हिस्सेदारी करीब 23 प्रतिशत थी। इसी ने भारत को बनाया ‘सोने की चिड़िया’।
विश्व युद्धों के बाद बदल गई पूरी व्यवस्था
दोनों विश्व युद्धों के बाद दुनिया की राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था पूरी तरह बदल गई। देशों के बीच कर्ज बढ़ गया और ज्यादातर सरकारों की आर्थिक हालत खस्ता हो गई। 1945 में दूसरा विश्व युद्ध खत्म होने के बाद जर्मनी, जापान और लगभग पूरा यूरोप आर्थिक तबाही से जूझ रहा था।
इन देशों को पैसे की सख्त जरूरत थी। इस जरूरत को पूरा करने के लिए सरकारों ने सोने के भंडार की परवाह किए बिना बड़े पैमाने पर नोट छापे। नतीजा कई देशों में भयंकर महंगाई देखने को मिली।
1944 का ब्रेटन वुड्स समझौता
इसके बाद 1944 में ब्रेटन वुड्स एग्रीमेंट हुआ। इस समझौते के तहत अमेरिकी डॉलर को दुनिया की मुख्य रिजर्व करेंसी का दर्जा दिया गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उस समय अमेरिका के पास दुनिया का सबसे बड़ा सोने का भंडार था। बाकी देशों ने अपनी-अपनी करेंसी को डॉलर से जोड़ दिया और शुरुआत में यह व्यवस्था काफी स्थिर रही।
1971 में निक्सन ने बदल दी दुनिया
1960 का दशक आते-आते अमेरिका पर महंगाई और वियतनाम युद्ध जैसे खर्चों का दबाव बढ़ने लगा। इससे अमेरिकी सोने वाली तिजोरी धीरे-धीरे खाली होने लगी। आखिरकार 1971 में अमेरिका के 37वें राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने डॉलर के बदले सोना देने की व्यवस्था को खत्म कर दिया।
इसके साथ ही ब्रेटन वुड्स सिस्टम कमजोर पड़ गया और दुनिया ने पूरी तरह फिएट मनी सिस्टम को अपना लिया। फिएट मनी सिस्टम का मतलब है एक ऐसी व्यवस्था जहां करेंसी की वैल्यू सोने, चांदी या किसी और चीज से न जुड़ी हो बल्कि सरकार के आदेश और लोगों के भरोसे पर टिकी हो। इसके बाद सोना ओपन मार्केट का हिस्सा बना मतलब जैसी मांग वैसा भाव।
सोने के बढ़ते दामों का असली कारण
सोने के चढ़ते दामों के पीछे कई बड़े कारण हैं जिन्हें समझना जरूरी है।
पहला कारण महंगाई: जब भी दुनिया में महंगाई बढ़ती है तो लोग सोने को एक सुरक्षित निवेश के तौर पर देखते हैं। कारण यह है कि सोना अपनी वैल्यू कभी नहीं खोता इसलिए सोना खरीदना एक फायदेमंद सौदा हो जाता है जिससे सोने की मांग और कीमत दोनों बढ़ जाती है।
दूसरा कारण ब्याज दरें: जब बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट या बॉन्ड्स पर मिलने वाला ब्याज कम होता है तो लोग वहां से पैसा निकालकर सोने में लगाने लगते हैं।
तीसरा कारण वैश्विक अस्थिरता: रूस-यूक्रेन युद्ध, ईरान-इजराइल युद्ध और ट्रंप सरकार की नीतियों ने दुनिया भर में निवेशकों में डर का माहौल बना दिया। डॉलर पर भरोसा डगमगा गया और शेयर बाजार में भारी गिरावट भी आई। ऐसे में निवेशक सोने को सेफ इन्वेस्टमेंट मानते हैं। यहां तक कि दुनिया भर के केंद्रीय बैंक भी अपने गोल्ड रिजर्व को बढ़ाने लगते हैं। इसीलिए बीते कुछ सालों में रूस, चीन और भारत जैसे देशों ने अपने गोल्ड रिजर्व को काफी बढ़ाया है।
क्या होगा अगर सोने की कीमत हो जाए जीरो?
अब आते हैं एक दिलचस्प हाइपोथेटिकल सिचुएशन पर। क्या होगा अगर दुनिया भर की सरकारें सोने के बढ़ते दामों से तिलमिलाकर एक दिन यह तय करें कि सोना पत्थर बराबर है? मतलब सोना अपनी असल वैल्यू खो दे और सोना बन जाए आलू। ऐसे में दुनिया और देश की इकॉनमी तथा जियोपॉलिटिक्स पर क्या असर होगा?
दुनिया में कुल कितना सोना है?
सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि दुनिया में कुल कितना सोना है जो खदानों से निकाल लिया गया है। अगर दुनिया का सारा सोना इकट्ठा किया जाए तो सात मंजिला इमारत बन सकती है। इसमें साढ़े तीन फ्लोर लोगों के गहनों से बनेंगे और डेढ़ फ्लोर सरकारों के गोल्ड रिजर्व से बनेंगे। इसके बाद जो बचेगा वह होगा टेक्नोलॉजी और इन्वेस्टमेंट का हिस्सा। मतलब सरकारों समेत लोगों ने भी सोने में अंधाधुंध निवेश किया है।
भारतीय परिवारों पर होगा सबसे बड़ा असर
भारत की अर्थव्यवस्था पर इसका असर सबसे बड़ा होगा जो सीधे आम लोगों पर दिखाई देगा। भारतीय परिवारों के पास लगभग 34,600 टन सोना है। 10 अक्टूबर 2025 को इकोनॉमिक टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में लोगों के घरों में लगभग 3.8 ट्रिलियन डॉलर का सोना है जो देश की जीडीपी का लगभग 89 प्रतिशत है।
अगर सोने की कीमत शून्य हो जाए तो यह पूरी बचत एक झटके में खाक हो जाएगी। इसका मतलब यह होगा कि करोड़ों परिवारों की सालों की बचत खत्म हो जाएगी।
बैंकिंग सिस्टम पर भारी दबाव
इसके साथ ही भारतीय बैंकिंग सिस्टम पर भी जबरदस्त दबाव बढ़ेगा। रिपोर्ट्स बताती हैं कि अक्टूबर 2025 तक भारत में लगभग 3.38 लाख करोड़ रुपये का गोल्ड लोन चल रहा है। इससे कहीं ज्यादा सोना कोलैटरल के रूप में रखा जाता है।
अगर सोने की कोई कीमत नहीं रहेगी तो बैंकों के लिए गोल्ड लोन समेत कोलैटरल बेकार हो जाएगा। इसका मतलब है कि लगभग 3.38 लाख करोड़ के गोल्ड लोन पूरी तरह से एनपीए यानी नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स में बदल जाएंगे। जिससे कुल एनपीए ₹4.32 लाख करोड़ से बढ़कर ₹7.7 लाख करोड़ से भी ज्यादा हो जाएगा। यह देश की बैंकिंग सिस्टम के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बन सकता है।
सोने के आयात पर असर
दूसरी तरफ भारत एक बड़ा गोल्ड इंपोर्टिंग देश है। हर साल सैकड़ों टन सोना आयात किया जाता है। अक्टूबर 2025 में ही सोने का इंपोर्ट रिकॉर्ड 14.72 बिलियन डॉलर का रहा जिससे ट्रेड डेफिसिट भी बढ़ा। सोने की कीमत जीरो होने पर इसका इंपोर्ट खत्म हो जाएगा जिससे रुपया मजबूत होगा।
देशों के फॉरेक्स रिजर्व पर भारी असर
सोने की कीमत शून्य होने का सबसे बड़ा असर देशों के फॉरेक्स रिजर्व पर पड़ेगा। अमेरिका, जर्मनी, चीन, रूस और भारत जैसे देशों के केंद्रीय बैंक अपने रिजर्व का एक बड़ा हिस्सा सोने में रखते हैं।
गोल्ड रिजर्व के आंकड़े:
- अमेरिका: 8133 टन सोना (कीमत लगभग ₹87 लाख करोड़)
- चीन: 2264 टन सोना (कीमत लगभग ₹33 लाख करोड़)
- भारत: 841 टन सोना (कीमत लगभग ₹11 लाख करोड़)
अगर सोने की कीमत जीरो हो जाए तो सभी देशों को अरबों का नुकसान होगा। इससे देशों की करेंसी स्टेबिलिटी, क्रेडिट रेटिंग और इंटरनेशनल कॉन्फिडेंस सब पर गहरा असर पड़ेगा।
जियोपॉलिटिकल स्तर पर गहरे प्रभाव
यह तो थी इकॉनमी की बात लेकिन जियोपॉलिटिकल स्तर पर भी इसके प्रभाव होंगे और बहुत गहरे होंगे। हाल के सालों में रूस और चीन जैसे देशों ने डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए सोने के भंडार बढ़ाए हैं। ब्रिक्स जैसे समूहों में रिजर्व करेंसी की चर्चा भी सोने के समर्थन के आधार पर होती रही है।
अगर सोना पूरी तरह बेकार हो जाए तो डॉलर डोमिनेटेड फाइनेंशियल सिस्टम और मजबूत हो जाएगा। अमेरिका की मॉनेटरी पावर और बढ़ सकती है क्योंकि उसके पास सबसे मजबूत करेंसी और फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस हैं।
वहीं चीन और भारत जैसे देश जो सोने को स्ट्रेटेजिक एसेट मानकर जमा कर रहे थे वे कमजोर स्थिति में आ जाएंगे। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में पावर बैलेंस बदल सकता है और रूस तथा ईरान जैसे देशों पर इकोनॉमिक सैंक्शन का प्रभाव और तेज हो सकता है।
विश्लेषण: सोने का भविष्य क्या होगा?
कुल मिलाकर अगर सोने की कीमत जीरो हो जाए तो दुनिया भर की इकॉनमी, इन्वेस्टमेंट, सेंट्रल बैंक की नीतियों और जियोपॉलिटिक्स सब चीजों पर सीधा असर पड़ेगा। यह तो एक हाइपोथेटिकल सिचुएशन है लेकिन सोने के बढ़ते दामों ने दुनिया भर में अपना असर डाला है।
भारत जैसे देश में जहां शादी-ब्याह और त्योहारों पर सोना खरीदना संस्कृति का हिस्सा है वहां सोने की कीमतों का हर उतार-चढ़ाव करोड़ों परिवारों को सीधे प्रभावित करता है। यही वजह है कि सोना सिर्फ एक धातु नहीं बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी भी है।
मुख्य बातें (Key Points)
- सोने की कीमत 2010 में ₹18,500 से बढ़कर 2025 में ₹1,36,000 के पार पहुंच गई है जो पिछले 15 सालों में लगभग 7 गुना वृद्धि दर्शाती है।
- भारतीय परिवारों के पास लगभग 34,600 टन सोना है जिसकी कीमत लगभग 3.8 ट्रिलियन डॉलर है जो देश की जीडीपी का 89 प्रतिशत है।
- सोने के बढ़ते दामों के पीछे महंगाई, कम ब्याज दरें और रूस-यूक्रेन युद्ध तथा ईरान-इजराइल युद्ध जैसी वैश्विक अस्थिरता मुख्य कारण हैं।
- भारत में अक्टूबर 2025 तक लगभग 3.38 लाख करोड़ रुपये का गोल्ड लोन चल रहा है और सोने की कीमत जीरो होने पर यह सब एनपीए बन जाएगा।
- अमेरिका के पास 8133 टन, चीन के पास 2264 टन और भारत के पास 841 टन सोने का रिजर्व है जो इन देशों की आर्थिक मजबूती का आधार है।
FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न








