गोवा राजनीति का दलदल आज यहाँ वहाँ कल

लेखक- पंडित संदीप

गोवा की राजनीति को समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। राजनीति भरोसे की किताब है तो भरोसे का पन्ना गोवा की राजनीतिक किताब से शायद गायब है। टिकट जिस दल ने दिया उस दल को ही काटने वालों का कमाल गोवा की राजनीति को दागदार बनाता है।
जिस दल ने नेता बना विधानसभा भेजा उसी दल से गद्दारी कर विरोधी के साथ खड़े होने वालों की इतनी लंबी फेहरिस्त है कि आप सिर पकड़ सोचने पर मजबूर हो जाएंगे आखिर कोई बचा भी है क्या? 5 साल में 70% करीब विधायक जिस दिल से चुनकर आए उस दल को ही ठेंगा दिखा खिलाफत करने लगे, शायद ही देश के किसी प्रदेश में इतनी राजनीतिक गिरावट आई हो जितनी गोवा की गलियों में देखी जा रही है। आया राम गया राम की जगह अब “गोवा राम” ही काफी हो गया मालूम होता है।
मार्च 2017 से जनवरी 2022 तक 40 विधायकों वाले गोवा में 27 अपने ही दल के खिलाफ खड़े हो ताल ठोक रहे हैं ऐसी राजनीति, ऐसा शह मात का खेल, ऐसा दलबदल का फैशन जो सागर किनारे गोवा में होता है शायद ही देश के किसी और प्रदेश में करने की सोच भी पनपी हो।
एक सदी पुरानी कांग्रेस का पंजा अब इतना कमजोर हो गया है कि उसकी पकड़ अपने नेताओं पर दिन प्रतिदिन ढीली पड़ने लगी है,इतनी ढीली कि कोई भी कभी भी छिटक कर कहीं भी जा सकता है। इस मौके की ताक में बैठी किसी भी तरह कुर्सी पाने, बचाने वाली बीजेपी सबको लपक अपना बनाने का सबक प्रदेश को सिखा रही है। जनता खामोश तमाशबीन बन अगले चुनाव का इंतजार करती है और चुप चाप सब सहने की आदी मालूम पड़ती है।
पिछले चुनाव के बाद 5 साल की परिक्रमा कुछ यूं शुरू हुई कि राजनीतिक धोखेबाजी की शुरुआत दिग्गज कांग्रेसी नेता कद्दावर माने जाने वाले विश्वजीत राणे ने भरे सदन में बीचो-बीच भरी सभा से वॉक आउट कर तब कि जब मनोहर पर्रिकर सरकार 2017 का बहुमत साबित करने में सकुचा रही थी। श्रीमान राणे के बढ़ते कदम ने सरकार को मजबूत और कांग्रेस को मजबूर कर दिया था, उनके ये बढ़े कदम आखिर बीजपी में शामिल हो कर ही रुके।अभी तो बस दल के पीठ में छुरा घोंपने की शुरुआत भर थी फिर क्या दो साल बाद दयानंद सोपते और सुभाष शिरोडकर पंजे से हाथ को छुड़ा बड़ी मजबूती से फूल को अपने हाथ में थाम फूलदल की संजीवनी बन गए।
मार्च 2019 मनोहर पर्रिकर के निधन के साथ ही पर्रिकर के युग का अंत भी हो गया, पर दलबदल की राजनीति का अंत गोवा में न हुआ और न शायद गोवा की जमीन पर कभी हो ही पायेगा। नया चेहरा नई पारी तो नई बारी थी, गोवा के सबसे पुराने दल एमजीपी के तीन विधायक में से दो ने दल बदल का जाल बुन अपनी पार्टी एमजीपी को फंसा खुद आज़ाद हो सत्ता के साथ हो गए। पुराने दल को छोड़ मनोहर अजगांवकर उप मुख्यमंत्री बनने के लिए साथी विधायक दीपक पुष्कर को साथ ले बीजेपी के साथी बन सत्त्ता का शीर्ष हो गए।
असली खेला तो मानो अभी गोवा को देखना बाकी था। गोवा की राजधानी पणजी में मनोहर पर्रिकर की विरासत पर पंजे की ताकत से उपचुनाव में अतनासियो मोंसेरेट उर्फ बाबुश ने धमाकेदार जीत दर्ज कर पूरी बीजेपी को चित कर दिया। यह जीत इतनी शानदार थी कि पूरे देश में पर्रिकर की सीट कांग्रेस ने कब्जा ली यह सुर्खी बन गई। कांग्रेस ने अपनी पकड़ को गोवा में मनोहर की सीट जीत मजबूत कर लिया था यह बीजेपी कि सर्व शक्तिमान सीट पर कांग्रेस की बड़ी जीत थी और अतनासियो मोंसेरेट का बड़ा धमाका। जीत के जश्न में डूबी कांग्रेस को मदहोश कर अतनासियो मोंसेरेट अपनी पत्नी और आठ कांग्रेसी विधायकों को ले कब बीजेपी की नाव पर सवार हो गए कांग्रेस को इस खबर का पता खबरों को देख कर ही हुआ।
गोवा में चुनाव जिस दल से जीता उस दल का उतना ही उपयोग, उस दल से उतना ही नाता, उतना ही उपयोग है, फिर आगे किसके होंगे?किसके साथ रहेंगे? जीतने के बाद ही तय होता है। इसी दलबदल गन्दगी को सियासत, संभावना, समीकरण, सौदेबाजी, सरलता कुछ भी नाम दो इस दिलबदल और दल बदली के खेल का खेला तो जारी ही है। खिलाड़ी भी तैयार है मौका और मैदान मिलते ही पाला बदलने में पल भर की देर भी नहीं लगती।
चुनावी रणभेरी बज चुकी है, बिगुल बजते ही दल बदलू नेता फिर तैयार होकर सज संवर कर बाहर आ गए हैं। इस नई पारी में शुरुआती बाजी मारी निर्दलीय रह सत्ता के साथ मलाई खाने वाले रोहन खोटे ने उन्होंने फूलबाजों से वफादारी निभाई और निर्दलीय से बीजेपी के साथी हो गए, जबकि गोवा फॉरवर्ड ब्लॉक के सभी नेता जहाँ कांग्रेस से समझौता करने दिल्ली दरबार में हाज़िर थे उनके ही एक विधायक जैयस सलगांवकर ने अपनी एक चाल से पूरी पार्टी को हिला कर रख दिया। जब दिल्ली में उनका दल पंजे को पकड़ मजबूती से साथ रहने का दम भर पंजा थाम रहा था तब वह कमल दल के प्रेम में डूब फूलछाप हो गए। गोवा में भंडारी समाज बहुतायत है बेशक, पर संगठित नहीं अगर यह समाज आज भी एक हो जाए तो अपनी सरकार बिना किसी दल के बना सकते हैं। इस बार दल बदलने की बारी इसी समाज के पहले मुख्यमंत्री का गौरव हासिल करने वाले आने वाले अशोक नायक की थी, अशोक बाबू ने उस कांग्रेस को बाय बाय बोल दिया जिसने उन्हें सीएम की कुर्सी पर बिठा मान सम्मान दिया। सीएम की कुर्सी पर बैठने वाले पहले भंडारी नेता थे अशोक बाबू जो सी एम सावंत के साथी बन बीजेपी को मजबूत करने की चाल चल रहे हैं। इनके बाद एमएलए गोविंद गौड़े भी तेजी से दौड़े निर्दलीय का तगमा उतार बीजेपी का हार गले मे डाल फूल बहार के साथी हो गए।
गोवा की सरजमीं में कांग्रेस कितनी बार टूटी, कांग्रेस कितनी बार बिखरी, कांग्रेस से कौन-कौन छोड़ गए, कितने छूट गए कांग्रेस को भी शायद याद नहीं होगा। कांग्रेस को छोड़ देने की बारी इस बार कांग्रेसी पूर्व मुख्यमंत्री लुइझिनो फलेरो ने अपने बुजुर्ग कांधे डगमगाते कदमो पर संभाली। ममता की क्षमता पर भरोसा कर राज्यसभा की अपनी टिकट कटाई और गोवा में तृणमूल की नींव जमाई।
ये अनुभवी पूर्व दिग्गज राजनीतिक खिलाड़ी सम्भवतः अपनी अंतिम पारी खेलने वाले लुइझिनो ने राज्यसभा में अपनी सीट पक्की की और कांग्रेस को नमस्ते। शरद पवार के एकमात्र चिराग गोवा में रहे एनसीपी के विधायक चर्चिल अलेमाओ ने इस बार पाला बदला बेटी वलांका के भी टिकट की गारंटी ग्रहण कर दीदी के साथ घड़ी की टिकटिक छोड़ दो फूल के हो गए।
सत्ता दल के घर में घुसने वालों की कतार की होड़ के बीच पहली बार खबर आई कि बीजेपी भी दरक रही है। यह काम किया बीजेपी को गोवा में जमाने वाले मटान्ही डे सल्दान्हा की धर्मपत्नी अलीना सल्दान्हा ने। दो बार बीजेपी की एमएलए और मंत्री रही मेडम अलीना ने बीजेपी को मटान्ही के सपनों से दूर मनोहर की नियत से अलग होता दल बता केजरीवाल की झाड़ू को थाम गोवा में आप की मौजूदगी का एहसास कराया। यह आप वालों को बड़ा ईनाम मालूम हुआ, पूर्व उप मुख्यमंत्री नार्वेकर का ज़िक्र भी जरूरी है जिनका झाड़ू दल ने जोर शोर से स्वागत किया अब वो निर्दलीय चुनावी समर में खड़े होते दिख रहे हैं। बीजेपी के माइकल लोबो ने फूल छोड़ पंजा पकड़ा तो दूसरे बीजेपी एमएलए प्रवीण जांटे ने बीजेपी को छोड़ बीजेपी को मिटाने की शपथ लेने वाली एमजीपी में अपना भविष्य देख गले लगा लिया।
5 साल में 27 एमएलए पुराने दल का दिल दुखा अपने जीते हुए दल से पीछा छुड़ा नये निशान, नये पहचान के साथ नए नारो, नए नेताओं के नाम जिंदाबाद कर फिर जनता दरबार में आ डटे हैं इस वादे के साथ कि जिता दो तो सब काम करेंगे, सभी वादा पूरा करेंगे। गोवा में बात बात पर कसम खाने के आदी नेताओ में एक बार फिर शपथ लेने, कसम खाने, वादा करने का सिलसिला शुरु हो गया है। कोई दल नारियल हाथ में थाम एक साथ मंदिर में कसम खा रहा है, तो कोई चर्च के पवित्र दर पर यह प्रतिज्ञा ले रहा है कि अब जिस दल से जीतेंगे नहीं बदलेंगे। गोवा की राजनीति समझना सचमुच बच्चों का खेल नहीं है क्योंकि यहाँ के नेता बच्चों की तरह ही रूठ कर अपना जमा जमाया घर रेत के घरोंदे की तरह तोड़ नए आशियाने में कब पहुंच जाते हैं खबर उनके पड़ोसी को भी नहीं होती। ऐसे ही एक विधायक हैं रेजिनाल्डो कांग्रेस को छोड़ कब तृणमूल के हो गए थे और कब तृणमूल को छोड़ कांग्रेस की तरफ लपके चर्चा बनी रही। कांग्रेस ने दुबारा हाथ नहीं बढ़ाया तो साहब आसमान से गिरे खजूर पर अटके की कहावत चरितार्थ कर अब निर्दलीय मैदान में उतर गए हैं। सत्तासीन दल के बड़े चेहरे भी दल की नीति से आजिज हो अलविदा कह रहे है मनोहर पर्रिकर के सुपुत्र उत्पल अपने पिता की विरासत बचाने के लिए बीजेपी के विरोध में पणजी से निर्दलीय ताल ठोक रहे हैं, उसी के खिलाफ जिसने बीजेपी से मनोहर की सीट छीन ली थी आज बीजेपी की सीट छिनने वाला बीजेपी की टिकट से लड़ रहा है और मनोहर का बेटा उसी बीजेपी को हराने के लिए निर्दलीय अपने पिता की पहचान के दम पर। बीजेपी के ही पूर्व मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारसेकर भी बीजेपी के फूल को भूल बता अपने दम पर चुनावी दांव खेल रहे हैं। अब दस मार्च ही बताएगा कि गोवा में दलबदलुओ की जीत का सफर जारी रहेगा या फिर जनता जंपरस को उनके घर की कैद देगी। परिणाम कुछ भी हो पर गोवा की राजनीति अजीब तो है।

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