LPG Cylinder OTP System : केंद्र सरकार द्वारा गैस सिलेंडर की डिलीवरी में पारदर्शिता लाने और फर्जी डिलीवरी रोकने के लिए लागू किया गया मोबाइल ओटीपी सिस्टम अब आम उपभोक्ताओं के लिए बड़ी परेशानी बनता जा रहा है। यह समस्या सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि गांवों और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग भी इससे जूझ रहे हैं। कमजोर नेटवर्क, देर से या बिल्कुल न आने वाला ओटीपी और सख्त डिलीवरी नियम—इन सबने सिलेंडर पाना मुश्किल कर दिया है।

नेटवर्क कमजोर, ओटीपी नहीं—डिलीवरी टली
उपभोक्ताओं का कहना है कि कई बार मोबाइल नेटवर्क कमजोर होने के कारण ओटीपी समय पर नहीं पहुंचता। कुछ मामलों में ओटीपी कई मिनट बाद आता है या फिर आता ही नहीं। ऐसे में डिलीवरी कर्मचारी सिलेंडर देने से मना कर देते हैं और डिलीवरी टाल दी जाती है।
एजेंसी के चक्कर, समय और मेहनत की बर्बादी
ओटीपी न मिलने पर लोगों को बार-बार गैस एजेंसी के दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। इससे समय और मेहनत दोनों की बर्बादी होती है। ग्रामीण इलाकों में तो स्थिति और भी कठिन है, क्योंकि सिलेंडर वाली गाड़ी दिन में सिर्फ एक बार ही आती है।

बुजुर्ग, गरीब और अशिक्षित सबसे ज्यादा प्रभावित
इस व्यवस्था का सबसे ज्यादा असर बुजुर्गों, अशिक्षित लोगों और गरीब परिवारों पर पड़ रहा है। कई घरों में गैस कनेक्शन किसी दूसरे पारिवारिक सदस्य के नाम पर होता है, जो डिलीवरी के समय घर पर मौजूद नहीं रहता। ओटीपी उसी नंबर पर आता है, जिससे सिलेंडर मिलना अटक जाता है और घरेलू कामकाज प्रभावित होता है।
डिलीवरी कर्मचारियों से बहस की नौबत
कई उपभोक्ताओं ने बताया कि ओटीपी न होने पर डिलीवरी कर्मचारियों के साथ बहस तक की स्थिति बन जाती है। कर्मचारी नियमों का हवाला देते हैं, जबकि उपभोक्ता अपनी मजबूरी बताते हैं। इस टकराव से समस्या और बढ़ जाती है।

डिजिटल सिस्टम की समझ भी बड़ी चुनौती
बहुत से लोग अभी भी डिजिटल प्रक्रिया से पूरी तरह परिचित नहीं हैं। मोबाइल ओटीपी, मैसेज और वेरिफिकेशन जैसे कदम उनके लिए जटिल हैं। ऐसे में तकनीक, सुविधा बनने के बजाय बाधा बन रही है।
ग्रामीण समाधान की मांग
उपभोक्ताओं ने सुझाव दिया है कि सरकार को हर गांव में गैस सिलेंडर की एक दुकान खोलनी चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर लोग सीधे सिलेंडर ले सकें। अचानक सिलेंडर खत्म होने पर फिलहाल कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होती।

उपभोक्ता मंचों की चिंता
सामाजिक संस्थाओं और उपभोक्ता मंचों ने भी इस मुद्दे पर चिंता जताई है। उपभोक्ता प्रतिनिधि Gurdeep Singh Tor का कहना है कि जब डिजिटल सिस्टम अनिवार्य किए जा रहे हैं, तो लोगों को पर्याप्त सुविधाएं और व्यावहारिक विकल्प भी मिलने चाहिए।
क्यों जरूरी है बदलाव
पारदर्शिता के इरादे से शुरू किया गया ओटीपी सिस्टम अगर जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाता, तो इसका मकसद ही उलटा पड़ जाता है। बिना नेटवर्क, बिना विकल्प और बिना लचीलापन—यह व्यवस्था आम आदमी की रसोई पर सीधा असर डाल रही है।
जानें पूरा मामला
मोबाइल ओटीपी आधारित गैस डिलीवरी सिस्टम का उद्देश्य फर्जीवाड़ा रोकना था, लेकिन नेटवर्क और डिजिटल साक्षरता की कमी ने इसे चुनौतीपूर्ण बना दिया है। ग्रामीण-शहरी उपभोक्ता समान रूप से परेशान हैं और समाधान की मांग कर रहे हैं।

मुख्य बातें (Key Points)
- गैस सिलेंडर डिलीवरी का ओटीपी सिस्टम लोगों के लिए परेशानी बना।
- कमजोर नेटवर्क के कारण ओटीपी समय पर नहीं आता, डिलीवरी टलती है।
- बुजुर्ग, गरीब और अशिक्षित उपभोक्ता सबसे ज्यादा प्रभावित।
- ग्रामीण इलाकों में वैकल्पिक व्यवस्था की मांग तेज।








