Four Labour Codes India के खिलाफ अब एक और बड़ा आंदोलन शुरू होने जा रहा है। केंद्रीय ट्रेड यूनियनों, स्वतंत्र क्षेत्रीय फेडरेशनों और एसोसिएशनों के संयुक्त मंच ने 27 मार्च 2026 को एक बड़ा ऐलान करते हुए देशभर की ट्रेड यूनियनों से 1 अप्रैल 2026 को काला दिवस (Black Day) के रूप में मनाने का आह्वान किया है। यह वही तारीख है जिसे केंद्र सरकार ने चार श्रम संहिताओं के कार्यान्वयन हेतु केंद्रीय नियमों की अधिसूचना के लिए पहले से घोषित किया है। ट्रेड यूनियनों ने इन संहिताओं को श्रम-विरोधी और नियोक्ता-समर्थक करार देते हुए कहा कि ये मजदूरों की 150 सालों की कमाई को एक झटके में खत्म कर देंगी।
12 फरवरी की हड़ताल के बाद भी सरकार ने नहीं सुनी बात
Four Labour Codes India का विरोध कोई नया नहीं है। ट्रेड यूनियनें लगातार इन श्रम संहिताओं के खिलाफ आवाज उठाती रही हैं, जिन्हें तथाकथित “श्रम सुधार” और “Ease of Doing Business” के नाम पर लाया गया है। 12 फरवरी 2026 को देशभर में एक ऐतिहासिक आम हड़ताल (General Strike) हुई थी, जिसमें श्रमिकों, किसानों और आम नागरिकों ने बड़े पैमाने पर भागीदारी की। लेकिन इतने बड़े विरोध के बावजूद केंद्र सरकार ने न तो इन श्रम संहिताओं को वापस लिया और न ही केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के साथ कोई सार्थक बैठक की।
ट्रेड यूनियनों ने यह भी आरोप लगाया कि इन संहिताओं के मसौदा तैयार करने के चरण से ही उनसे कोई परामर्श नहीं किया गया। इतने गंभीर मुद्दे पर, जो करोड़ों श्रमिकों के जीवन से सीधे जुड़ा है, लंबे अरसे से भारतीय श्रम सम्मेलन (Indian Labour Conference) भी नहीं बुलाया गया है। मंच ने इसे अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों का खुला उल्लंघन बताया, जिनके प्रति भारत एक राष्ट्र के रूप में प्रतिबद्ध है।
मजदूरों को ब्रिटिश काल जैसे शोषण में धकेलने की कोशिश: ट्रेड यूनियनें
Four Labour Codes India पर जारी वक्तव्य में ट्रेड यूनियनों ने सबसे तीखे शब्दों में कहा कि ये श्रम संहिताएं देश के श्रमिकों को फिर से ब्रिटिश औपनिवेशिक काल जैसी शोषणकारी परिस्थितियों में धकेलने का प्रयास हैं। मंच ने याद दिलाया कि श्रमिक वर्ग ने औपनिवेशिक काल में अत्यधिक शोषण के खिलाफ और स्वतंत्र भारत में भी कई अधिकारों के लिए लंबा संघर्ष किया है।
इन अधिकारों में 8 घंटे का कार्यदिवस, कार्यस्थल पर सुरक्षा, यूनियन बनाने और संगठित होने का अधिकार, सामूहिक सौदेबाजी, आंदोलन करने और हड़ताल का अधिकार शामिल हैं। इसके अलावा सम्मानजनक वेतन, सामाजिक सुरक्षा, ठेका श्रमिकों के नियमितीकरण, स्थायी कार्यों में ठेका प्रथा की समाप्ति, समान काम के लिए समान वेतन, बोनस, ग्रेच्युटी और पेंशन जैसे अधिकार भी श्रमिकों के लंबे संघर्ष की देन हैं।
150 सालों की उपलब्धियां खतरे में
ट्रेड यूनियनों ने बताया कि 1926 के ट्रेड यूनियन अधिनियम के माध्यम से यूनियन बनाने के अधिकार को वैधानिक मान्यता मिली थी। ब्रिटिश काल में श्रमिकों के पूर्वजों के संघर्ष से कई श्रम कानून बने और स्वतंत्र भारत में संसद द्वारा कुल 44 केंद्रीय श्रम कानून तथा विभिन्न राज्यों द्वारा लगभग 150 कानून बनाए गए। श्रम भारतीय संविधान की समवर्ती सूची में शामिल है, इसलिए केंद्र और राज्य दोनों को इस पर कानून बनाने का अधिकार है।
मंच ने कहा कि ये सभी उपलब्धियां लगभग 150 वर्षों के अथक संघर्ष का परिणाम हैं और वर्तमान केंद्र सरकार Four Labour Codes India के माध्यम से इन उपलब्धियों को एक झटके में समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। यह बात आम मजदूरों के लिए बेहद चिंताजनक है क्योंकि अगर ये संहिताएं लागू हो गईं तो उनके दशकों पुराने अधिकार खतरे में पड़ जाएंगे।
चार श्रम संहिताओं में क्या है खतरनाक?
Four Labour Codes India को लेकर ट्रेड यूनियनों ने विस्तार से बताया कि इन संहिताओं में ऐसे कठोर और दमनकारी प्रावधान हैं जो श्रमिकों के मूलभूत अधिकारों को छीन लेंगे। मंच के अनुसार इन संहिताओं में यूनियन बनाना कठिन, पंजीकरण मुश्किल और निरस्तीकरण आसान कर दिया गया है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि नियोक्ताओं द्वारा किए गए उल्लंघनों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया जा रहा है, जबकि ट्रेड यूनियन गतिविधियों को दंडनीय बनाया जा रहा है।
कार्य समय की सीमा को खुला छोड़ दिया गया है, जिससे नियोक्ता इसे मनमाने ढंग से बढ़ा सकते हैं। हड़ताल का अधिकार लगभग समाप्त कर दिया गया है। फिक्स्ड टर्म रोजगार को सामान्य बनाया जा रहा है, जिसका मतलब है कि स्थायी नौकरियां खत्म होंगी और श्रमिकों को बार-बार अनुबंध पर रखा जाएगा।
सामाजिक सुरक्षा और न्यूनतम वेतन पर भी हमला
ट्रेड यूनियनों ने बताया कि Four Labour Codes India के तहत मौजूदा सामाजिक सुरक्षा कानूनों को कमजोर किया जा रहा है। सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा के झूठे दावे के बावजूद वास्तव में अधिक श्रमिकों को इसके दायरे से बाहर रखा जा रहा है। सुरक्षा मानकों से समझौता किया जा रहा है और 17 क्षेत्रीय श्रम कानूनों को समाप्त कर बड़ी संख्या में श्रमिकों को व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य के अधिकार से वंचित किया जा रहा है।
न्यूनतम वेतन कानूनों को भी कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। मंच ने आरोप लगाया कि सरकार गरीबी रेखा से नीचे “राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन” लागू करने की कोशिश कर रही है, जो मजदूरों के लिए किसी अपमान से कम नहीं होगा। ये संहिताएं संगठित क्षेत्र को असंगठित बनाने और असंगठित श्रमिकों को बुनियादी अधिकारों से वंचित करने की दिशा में काम कर रही हैं। मंच ने कहा कि इनमें कई प्रावधान भारतीय संविधान की भावना, अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों (FPRW) और मानवाधिकारों के विरुद्ध हैं।
1 अप्रैल को कैसे मनाया जाएगा काला दिवस?
ट्रेड यूनियनों ने Four Labour Codes India के खिलाफ 1 अप्रैल 2026 को पूरे देश के सभी कार्यस्थलों पर काला दिवस मनाने का आह्वान किया है। मंच ने विरोध के कई रचनात्मक तरीके सुझाए हैं। श्रमिक काले बैज लगाकर, हाथों या माथे पर काली पट्टी बांधकर अपना विरोध दर्ज करा सकते हैं। लंच अवकाश के दौरान विरोध प्रदर्शन, नारेबाजी, धरना-प्रदर्शन और जुलूस निकाले जा सकते हैं।
इसके अलावा साइकिल या मोटरसाइकिल यात्राएं और अन्य रचनात्मक तरीकों से भी विरोध जताया जा सकता है। यह कार्यक्रम राज्य इकाइयों द्वारा संयुक्त या स्वतंत्र रूप से तथा संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) के समर्थन से आयोजित किया जा सकता है।
लोकतंत्र की असली कसौटी अधिकारों की रक्षा में: ट्रेड यूनियनें
केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने कहा कि ऐसी स्थिति में उनके पास Four Labour Codes India के खिलाफ संघर्ष जारी रखने और उनके क्रियान्वयन के खिलाफ प्रतिरोध खड़ा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। मंच ने 12 फरवरी 2026 की ऐतिहासिक राष्ट्रव्यापी हड़ताल को सफल बनाने वाले श्रमिकों, किसानों और अन्य नागरिकों को सलाम करते हुए सभी को लंबी लड़ाई के लिए तैयार रहने का आह्वान किया।
मंच ने समाज के सभी वर्गों से अपील की कि वे इस विरोध कार्यक्रम का समर्थन करें। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की असली कसौटी सामूहिक संगठन बनाने, यूनियन बनाने और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने के अधिकार में निहित है। अगर यह अधिकार छिन गया तो लोकतंत्र की नींव ही कमजोर पड़ जाएगी।
क्या सरकार और मजदूरों के बीच टकराव और बढ़ेगा?
Four Labour Codes India को लेकर केंद्र सरकार और ट्रेड यूनियनों के बीच टकराव लगातार गहरा होता जा रहा है। 12 फरवरी की हड़ताल के बाद अब 1 अप्रैल को काला दिवस का ऐलान इस बात का संकेत है कि श्रमिक संगठन पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। सरकार ने अब तक न तो इन संहिताओं में कोई बदलाव किया है और न ही ट्रेड यूनियनों से कोई संवाद स्थापित किया है। यह रवैया आने वाले दिनों में और बड़े आंदोलनों की जमीन तैयार कर सकता है। 44 केंद्रीय और 150 राज्य स्तरीय श्रम कानूनों को बदलकर महज चार संहिताओं में समेटने का यह प्रयोग अगर बिना श्रमिकों की सहमति के लागू हुआ, तो औद्योगिक संबंधों में एक गहरा संकट खड़ा हो सकता है। ऐसे में सरकार के लिए संवाद का रास्ता अपनाना न सिर्फ जरूरी बल्कि अपरिहार्य हो गया है।
मुख्य बातें (Key Points)
- केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने Four Labour Codes India के खिलाफ 1 अप्रैल 2026 को देशभर में काला दिवस मनाने का आह्वान किया।
- 12 फरवरी 2026 की ऐतिहासिक हड़ताल के बाद भी सरकार ने न संहिताएं वापस लीं, न ट्रेड यूनियनों से बातचीत की।
- ट्रेड यूनियनों ने कहा कि ये संहिताएं मजदूरों के 150 सालों के संघर्ष से मिले अधिकारों को खत्म कर देंगी और हड़ताल, यूनियन बनाने और सामाजिक सुरक्षा के अधिकार छीन लेंगी।
- काला दिवस पर काले बैज, काली पट्टी, धरना-प्रदर्शन, जुलूस और साइकिल-मोटरसाइकिल यात्राओं से विरोध जताया जाएगा।








