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Epstein Files India: हरदीप पुरी का इस्तीफा हुआ तो कई बड़े मंत्री जाएंगे!

कांग्रेस का आरोप- Digital India की जानकारी देश से पहले एपस्टीन नेटवर्क को दी गई, शेयर बाजार में 7 लाख करोड़ डूबे

The News Air Team by The News Air Team
शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026
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Epstein Files
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Epstein Files Hardeep Puri Controversy: संसद में एपस्टीन फाइल्स को लेकर जबरदस्त हंगामा मचा हुआ है। कांग्रेस ने गंभीर आरोप लगाए हैं कि केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी की जेफरी एपस्टीन से कई बार मुलाकात हुई थी। इसके साथ ही यह भी आरोप लगा कि डिजिटल इंडिया की जानकारी भारतीय नागरिकों से पहले एपस्टीन नेटवर्क को दे दी गई थी। इस पूरे विवाद के बीच सवाल उठ रहे हैं कि अगर एक मंत्री का इस्तीफा हुआ तो क्या कई और बड़े मंत्रियों की कुर्सी तक बात पहुंच जाएगी और क्या प्रधानमंत्री की कुर्सी भी खतरे में आ सकती है।


कांग्रेस का गंभीर आरोप: Digital India की जानकारी एपस्टीन को पहले दी गई

कांग्रेस ने एक बड़ा आरोप लगाया है। पार्टी का कहना है कि 13 नवंबर 2014 को एपस्टीन ने रीड हॉफमैन को एक मेल भेजा जिसमें डिजिटल इंडिया के बारे में जानकारी दी गई थी।

अब यहां तारीख पर गौर कीजिए। डिजिटल इंडिया जुलाई 2015 में शुरू हुआ था। यानी कांग्रेस का आरोप है कि डिजिटल इंडिया नवंबर 2014 में ही उस नेटवर्क के हाथ में रख दिया गया था जिसको जुलाई 2015 में भारत में लागू करवाया गया।

कांग्रेस ने कहा कि एपस्टीन को भारत के नागरिकों से पहले डिजिटल इंडिया की जानकारी हरदीप पुरी दे रहे थे। यह आरोप अगर सच है तो बेहद गंभीर है।

Epstein Files


हरदीप पुरी का जवाब: मामूली मुलाकात थी

केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने इन आरोपों का जवाब दिया है। उन्होंने कहा कि यह मिनिमल इंटरेक्शन था यानी बहुत मामूली मुलाकात थी।

पुरी ने कहा कि 2008 में एपस्टीन ने एक चार्ज के लिए दोषी करार दिया था जो कि एक नाबालिग महिला से संबंधित था। बाकी की कहानियां बहुत बाद में सामने आईं और कई लोगों को शक था।

लेकिन विपक्ष इस जवाब से संतुष्ट नहीं है और इस्तीफे की मांग कर रहा है।


कई कैबिनेट मंत्रियों पर सवाल

यह मामला सिर्फ हरदीप पुरी तक सीमित नहीं है। सवाल कई और कैबिनेट मंत्रियों पर भी उठ रहे हैं।

एस. जयशंकर विदेश मंत्री हैं। उन पर सवाल है कि तेल के मुद्दे पर वे खामोश क्यों हैं। अभी तक जिन बातों का जिक्र वे देश हित में कर रहे थे अब उस पर खामोशी क्यों है।

पीयूष गोयल वाणिज्य मंत्री हैं। उन पर सवाल है कि ट्रेड डील को लेकर वे कृषि के फायदों की बात कर रहे हैं जबकि वे एग्रीकल्चर मिनिस्टर नहीं हैं। तेल के खेल से वे पल्ला झाड़ रहे हैं।

अश्विनी वैष्णव आईटी मंत्री हैं। आईटी एक्ट को लेकर उनसे सवाल हैं कि परिस्थितियों को नए सिरे से क्यों नहीं संभाला जा रहा।

गिरिराज सिंह ने एपस्टीन फाइल से ध्यान हटाने के लिए नेहरू की पुरानी तस्वीरें उठा लीं।

भूपेंद्र यादव पर्यावरण मंत्री हैं। अरावली को लेकर हंगामा मचा तो वे खामोश हो गए।

निर्मला सीतारमण वित्त मंत्री हैं। बजट को डील से जोड़कर पेश किया गया।

राजनाथ सिंह रक्षा मंत्री हैं। डिफेंस डील पर खुलकर नहीं बोल रहे लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की ताकत बढ़ने की बात कर रहे हैं।


इस्तीफा क्यों नहीं होगा?

सवाल यह है कि जब इतने गंभीर आरोप लग रहे हैं तो किसी का इस्तीफा क्यों नहीं हो रहा। इसका जवाब बहुत साफ है।

अगर हरदीप पुरी का इस्तीफा हुआ तो फिर जयशंकर का भी हो सकता है। अश्विनी वैष्णव का भी। पीयूष गोयल का भी। भूपेंद्र यादव का भी। निर्मला सीतारमण का भी। धर्मेंद्र प्रधान का भी। गिरिराज सिंह का भी। प्रह्लाद जोशी का भी। मनसुख मांडविया का भी।

इस्तीफे की कड़ी लग गई तो झड़ी लग जाएगी और उसके बाद बात प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच जाएगी।


कैबिनेट मंत्रियों की राजनीतिक ताकत पर सवाल

एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या किसी भी मंत्री की इतनी ताकत नहीं है कि वह अपने हिसाब से अपने मंत्रालय को चला सके। या फिर काबिलियत नहीं है। और अगर ताकत और काबिलियत से इतर जाएं तो फिर उनकी पहचान ही क्या है।

कैबिनेट मंत्रियों की फहरिस्त देखें तो जयशंकर, हरदीप पुरी, अश्विनी वैष्णव, पीयूष गोयल, भूपेंद्र यादव, निर्मला सीतारमण, जेपी नड्डा, धर्मेंद्र प्रधान, गिरिराज सिंह, प्रह्लाद जोशी, मनसुख मांडविया – इनमें से कोई भी अपनी कॉन्स्टिट्यूएंसी के बाहर किसी दूसरी सीट को जिता नहीं सकता।

अपने क्षेत्र में भी जीतते हैं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा लेकर ही जीतते हैं। यह भी सच है।


अमेरिका-भारत ट्रेड डील का असर

व्हाइट हाउस की फैक्ट शीट में जो दर्ज है वह चौंकाने वाला है। एग्रीकल्चर प्रोडक्ट्स हों, इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट्स हों, ऑयल हो, 500 बिलियन डॉलर की खरीद हो – सब कुछ इस डील में शामिल है।

जो कैबिनेट मिनिस्टर पहले कह रहे थे उस पर अब कोई भरोसा करने को तैयार नहीं है। टेक्सटाइल सेक्टर हो, डायमंड सेक्टर हो, आईटी सेक्टर हो – हर क्षेत्र में सवाल उठ रहे हैं।

राहुल गांधी आज किसानों से मिले और उन्हें यही फैक्ट शीट दिखाई। किसान पूछ रहे हैं कि अब रास्ता बचेगा क्या।


वेनेजुएला से तेल का मामला

एक और बड़ा मुद्दा वेनेजुएला से तेल का है। भारत सरकार को अभी खुला लाइसेंस नहीं दिया गया है कि वो वेनेजुएला से तेल कैसे खरीदेगी। लेकिन भारत का प्राइवेट सेक्टर जो ऑयल रिफाइनरी चलाता है उसको लाइसेंस दे दिया गया है।

रिलायंस पहले भी वेनेजुएला से तेल ले रहा था। 2019 में प्रतिबंध लगे तो बंद हो गया। अब वो पाइपलाइन फिर से खुल गई है।

चीन रोजाना 4 लाख बैरल तेल वेनेजुएला से खरीदता था। अब चीन ने बंद कर दिया है। यह तेल अब भारत के प्राइवेट सेक्टर को मिलेगा। लेकिन वेनेजुएला का तेल अमेरिकी बिजनेस के हाथों से चलेगा।


रूस-अमेरिका में नजदीकी

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट ने चौंका दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक अब रूस को डॉलर से कोई आपत्ति नहीं है। वो तमाम डील डॉलर के तहत ही करेगा।

अमेरिका और रूस कमोबेश एक ही मंच पर खड़े हो गए हैं। आने वाले वक्त में यूक्रेन में कोई कठपुतली सरकार दिखाई दे सकती है और जिस जमीन पर रूस ने कब्जा किया है वो उसी के पास रह सकती है।

अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो खुलकर कह रहे हैं कि सब कुछ बदल गया है। जियोपॉलिटिक्स का मतलब अब वो नहीं है जो पुराने वक्त में हुआ करता था।


शेयर बाजार में 7 लाख करोड़ डूबे

आज भारतीय शेयर बाजार में निवेशकों के लगभग 7 लाख करोड़ रुपये डूब गए। जिम्मेदारी कौन लेगा? कोई नहीं।

आईटी सेक्टर में भी बड़ा संकट है। एंथ्रोपिक की एआई तकनीक ने पूरे सेक्टर की नींद उड़ा दी है। एक झटके में आईटी शेयरों में 50 बिलियन डॉलर तक की गिरावट आ गई।

भारत में लगभग 283 बिलियन डॉलर की आईटी सर्विस इंडस्ट्री है। इस पर आने वाले वक्त में कैसे चोट होगी – अश्विनी वैष्णव का कोई नजरिया साफ नहीं है।


18 फरवरी से दिल्ली में AI सेमिनार

18 तारीख से दिल्ली में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर अंतरराष्ट्रीय सेमिनार होने वाला है। दुनिया के कई राष्ट्राध्यक्ष मौजूद होंगे। ब्राजील के राष्ट्रपति लूला भी आ रहे हैं।

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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर ही पूरी भारतीय आईटी इंडस्ट्री टिकी हुई है। लेकिन इस क्षेत्र में भारत की स्थिति क्या होगी – यह सवाल अभी अनुत्तरित है।


पीयूष गोयल का किसानों पर हमला

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि वे हैबिचुअल लायर हैं यानी आदतन झूठे हैं।

गोयल ने कहा कि राहुल गांधी को किसानों और युवाओं की भलाई की कोई चिंता नहीं है। लेकिन विपक्ष इन आरोपों को खारिज करता है।


राहुल गांधी ट्रंप से लड़ रहे हैं?

पहली बार संसद के भीतर राहुल गांधी मोदी से नहीं बल्कि डोनाल्ड ट्रंप से लड़ते हुए नजर आए। वे उस अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क को उभारने की कोशिश में लगे रहे।

उनका मैसेज था कि भारत की मौजूदा राजनीतिक सत्ता वजीर नहीं बल्कि एक प्यादे में तब्दील हो गई है।

संसद में राहुल गांधी जिन फैक्ट्स एंड फिगर्स को सत्यापित करना चाहते थे उन्हें सत्यापित करने नहीं दिया गया। क्योंकि सारे डॉक्यूमेंट खुल जाते और सरकार फंस जाती।


वर्ल्ड बैंक और IMF की पॉलिसी

कांग्रेस का आरोप है कि भारत में बीते 10 वर्षों में जो भी निर्णय लिए गए उनकी पहुंच कहीं तीसरी जगह से निकलकर आई है।

वो वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ का प्लान भी हो सकता है। वो उन ताकतवर देशों के राष्ट्राध्यक्षों की परिस्थितियां भी हो सकती हैं जो एपस्टीन फाइल में दर्ज हैं।

डिसइन्वेस्टमेंट के नाम पर जो कुछ हुआ, प्राइवेटाइजेशन की जो दिशा तय की गई, मोनेटाइजेशन का जो जिक्र किया गया – इस सब के पीछे कौन सा नेटवर्क काम कर रहा था – यह सवाल अब खुलकर पूछा जा रहा है।


BJP सांसदों की चिंता

खलबली बीजेपी के उन सांसदों के पास भी है जो कैबिनेट मिनिस्टर नहीं हैं। वे सोच रहे हैं कि अब क्या होगा।

पहले जब कोई निर्णय होता था तो सांसद अपनी कॉन्स्टिट्यूएंसी में जाकर बताते थे कि प्रधानमंत्री मोदी ने क्या शानदार काम किया है। इसके बाद चुनाव जीत जाते थे।

इस बार मुसीबत यह है कि डील तो अमेरिका के साथ हो गई और हर उस क्षेत्र में डील हुई है जहां संकट गहरा रहा है। अब सांसद अपनी कॉन्स्टिट्यूएंसी में जाकर क्या कहेंगे – यह फैसला प्रधानमंत्री मोदी का है या अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का है?


सेवा तीर्थ – नई PMO बिल्डिंग

पीएमओ आज एक नई इमारत में शिफ्ट हो गया है जिसका नाम ‘सेवा तीर्थ’ रख दिया गया है।

जिक्र तो नागरिकों की सेवा का है। लेकिन सवाल यह है कि जब कॉर्पोरेट से होते-होते अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की दिशा में चीजें चली गईं तो फिर जनता के हित के लिए सरकार क्या काम करेगी।


तीन बड़े सवाल

पहला सवाल: क्या इस दौर में एक भी इस्तीफा प्रधानमंत्री की कुर्सी की नींव हिला देगा? इसीलिए कोई इस्तीफा कभी लिया ही नहीं गया।

दूसरा सवाल: जब सारे मंत्रालयों का प्रचार-प्रसार का बजट प्रधानमंत्री को प्रोजेक्ट करने में लग जाता है तो मंत्री क्या करें?

तीसरा सवाल: क्या अब चुनी हुई सरकार का हर निर्णय खुद को बनाए रखने के लिए उस पॉलिटिकल इकॉनमी पर टिक गया है जो तमाम पॉलिसीज तय कर रही है?


आम आदमी पर क्या असर?

अगर ये आरोप सच हैं तो इसका सीधा असर आम आदमी की जिंदगी पर पड़ेगा। किसानों को चिंता है कि एग्रीकल्चर प्रोडक्ट्स पर क्या असर होगा।

टेक्सटाइल सेक्टर के कामगार परेशान हैं। डायमंड सेक्टर में काम करने वाले चिंतित हैं। आईटी सेक्टर में नौकरियों पर खतरा मंडरा रहा है।

शेयर बाजार में 7 लाख करोड़ डूबने से मध्यम वर्ग को झटका लगा है।


मुख्य बातें (Key Points)
  • कांग्रेस का आरोप है कि 13 नवंबर 2014 को डिजिटल इंडिया की जानकारी एपस्टीन नेटवर्क को दे दी गई थी जबकि यह योजना जुलाई 2015 में लॉन्च हुई। हरदीप पुरी ने मुलाकात को मामूली बताया है।
  • इस्तीफे की मांग इसलिए नहीं मानी जा रही क्योंकि एक इस्तीफा हुआ तो कई और मंत्रियों की कुर्सी खतरे में आ जाएगी और बात प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच सकती है।
  • अमेरिका-भारत ट्रेड डील में एग्रीकल्चर, इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट्स और ऑयल सहित कई क्षेत्र शामिल हैं जिससे किसानों और कामगारों में चिंता है।
  • शेयर बाजार में आज निवेशकों के करीब 7 लाख करोड़ रुपये डूबे और आईटी सेक्टर में 50 बिलियन डॉलर की गिरावट आई।
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