Trump Gaza Peace Deal : दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान जब अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने गाजा में स्थायी शांति के नाम पर नए वैश्विक मंच ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का ऐलान किया, तब भारत की गैर-मौजूदगी सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बन गई। प्रधानमंत्री Narendra Modi को व्यक्तिगत रूप से आमंत्रित किए जाने के बावजूद भारत ने इस मंच से दूरी बनाए रखने का फैसला किया। यह फैसला 24 जनवरी 2026 को सामने आया और इसे भारत की सोची-समझी कूटनीतिक रणनीति माना जा रहा है।
दावोस की बर्फीली वादियों में हुए इस समारोह में कई देशों ने भागीदारी दिखाई, लेकिन भारत न तो मंच पर नजर आया और न ही किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करता दिखा। यह दूरी किसी अनदेखी का परिणाम नहीं, बल्कि गंभीर रणनीतिक और कूटनीतिक चिंताओं से जुड़ा निर्णय बताया जा रहा है।
क्या है ‘बोर्ड ऑफ पीस’ और क्यों उठा विवाद
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मंच से ट्रंप द्वारा घोषित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ को शुरुआत में गाजा युद्धविराम और पुनर्निर्माण से जोड़कर पेश किया गया था। लेकिन इसके चार्टर में गाजा का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। इसके बजाय इस बोर्ड को दुनिया भर के संघर्षों में हस्तक्षेप का व्यापक अधिकार दिया गया है। यही बिंदु भारत सहित कई देशों के लिए चिंता का कारण बना।
भारत को किन बातों पर है आपत्ति
भारत उन करीब 60 देशों में शामिल था जिन्हें इस बोर्ड में शामिल होने का न्योता दिया गया था। विदेश मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, भारत का मानना है कि यह प्रस्ताव अत्यंत संवेदनशील है और इसके दीर्घकालिक प्रभावों का गहन अध्ययन जरूरी है। भारत की प्रमुख चिंताओं में सबसे पहले संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय संस्थानों की भूमिका कमजोर होने की आशंका है। भारत को डर है कि यह नया मंच भविष्य में United Nations को दरकिनार कर सकता है।
ट्रंप का आजीवन अध्यक्ष बनना बना बड़ा सवाल
‘बोर्ड ऑफ पीस’ को लेकर सबसे बड़ा विवाद इसके नेतृत्व को लेकर है। इस बोर्ड के आजीवन अध्यक्ष खुद डोनाल्ड ट्रंप होंगे। भारत को आशंका है कि ट्रंप की व्यक्तिगत राजनीतिक शैली और उनके पुराने बयानों को देखते हुए यह मंच निष्पक्ष वैश्विक संस्था के बजाय अमेरिकी प्रभाव का उपकरण बन सकता है। भारत पहले ही ट्रंप के उस दावे को खारिज कर चुका है जिसमें उन्होंने भारत-पाकिस्तान सैन्य तनाव खत्म कराने का श्रेय खुद को दिया था।
दो-राज्य समाधान से हटने की आशंका
भारत लंबे समय से इजराइल-फिलिस्तीन मुद्दे पर दो-राज्य समाधान का समर्थक रहा है। लेकिन बोर्ड से जुड़े प्रस्तावों और योजनाओं में फिलिस्तीनी राज्य का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। ऐसे में भारत को यह मंच अपने पारंपरिक रुख से विचलन जैसा लगता है।
पाकिस्तान की मौजूदगी भी बनी संवेदनशील मुद्दा
इस समारोह में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif और सेना प्रमुख Asim Munir की मौजूदगी भी भारत के लिए एक अहम कारण रही। भारत लंबे समय से पाकिस्तान पर आतंकवाद को संरक्षण देने के आरोप लगाता रहा है। ऐसे में एक ही मंच साझा करना भारत की वैश्विक कूटनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकता था।
भारत अकेला नहीं, कई बड़े देश भी दूर
भारत इस फैसले में अकेला नहीं है। अमेरिका को छोड़कर न तो G7 देशों का कोई सदस्य और न ही यूएनएससी का कोई स्थायी सदस्य इस पहल का हिस्सा बना। फ्रांस, ब्रिटेन और चीन जैसे बड़े देशों की गैर-मौजूदगी यह संकेत देती है कि ट्रंप की इस पहल को लेकर वैश्विक स्तर पर संदेह बना हुआ है।
कौन-कौन हुआ बोर्ड में शामिल
करीब 35 देशों ने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ को जॉइन किया है। इनमें पाकिस्तान के अलावा अर्जेंटीना, अर्मेनिया, अज़रबैजान, बहरीन, बेलारूस, मिस्र, हंगरी, कजाकिस्तान, मोरक्को, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और वियतनाम जैसे देश शामिल हैं। बोर्ड के चार्टर के मुताबिक, स्थायी सदस्यों को इसमें शामिल होने के लिए एक अरब डॉलर का भुगतान करना होगा।
भारत की ‘वेट एंड वॉच’ रणनीति
भारत ने फिलहाल किसी जल्दबाजी में फैसला लेने के बजाय ‘वेट एंड वॉच’ की नीति अपनाई है। भारत का मानना है कि शांति जरूरी है, लेकिन किसी भी कीमत पर नहीं। यह फैसला वैश्विक शक्ति संतुलन, बहुपक्षीय व्यवस्था और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों से जुड़ा हुआ है।
विश्लेषण
भारत की गैर-मौजूदगी यह साफ संकेत देती है कि नई वैश्विक पहलों में शामिल होने से पहले वह नेतृत्व की निष्पक्षता, संस्थागत संतुलन और अपने मूल कूटनीतिक सिद्धांतों से समझौता नहीं करेगा। ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’ शांति की पहल से ज्यादा शक्ति संतुलन का नया प्रयोग बन सकता है, और भारत फिलहाल इसमें फंसने को तैयार नहीं दिखता।
मुख्य बातें (Key Points)
- Trump ने दावोस में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ लॉन्च किया
- PM Modi को न्योता मिला, फिर भी भारत ने दूरी बनाई
- UN की भूमिका कमजोर होने की आशंका
- पाकिस्तान की मौजूदगी भारत के लिए संवेदनशील
- भारत ने ‘वेट एंड वॉच’ नीति अपनाई








