Delhi Excise Policy CBI Case Verdict: दिल्ली शराब नीति मामले में राउज एवेन्यू कोर्ट के स्पेशल जज जितेंद्र सिंह ने 600 पन्नों का ऐतिहासिक आदेश लिखकर सीबीआई (CBI) की पूरी जांच को खारिज कर दिया है। अदालत ने अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया समेत सभी 23 आरोपियों को डिस्चार्ज करते हुए कहा कि इस मामले में इतना भी सबूत नहीं है कि मुकदमा चलाया जा सके। सबसे बड़ी बात — जज ने इस केस में शामिल रहे सीबीआई अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच के आदेश भी दिए हैं।
600 पन्नों में जज ने क्या-क्या लिखा — फैसले के सबसे अहम अंश
स्पेशल जज जितेंद्र सिंह का 600 पन्नों का फैसला सीबीआई की जांच की धज्जियां उड़ाने वाला है। अदालत ने एक-एक आरोप को बारीकी से परखा और हर जगह सबूतों की कमी पाई।
जज ने कहा कि सीबीआई की चार्जशीट भले ही हजारों पन्नों की है, लेकिन उसमें “ऐसे कई गैप हैं जो किसी भी गवाही या बयान से समझाए ही नहीं जा सकते।” अदालत ने साफ लिखा कि मनीष सिसोदिया के खिलाफ प्रथम दृष्टया (Prima Facie) केस तक सीबीआई पेश नहीं कर पाई और अरविंद केजरीवाल को “बिना किसी स्पष्ट सबूत के फंसाया गया।”
चार्जशीट में “भ्रमित करने वाले आरोप” हैं — यह शब्द खुद जज ने इस्तेमाल किए। इसका मतलब साफ है कि अदालत ने माना कि सीबीआई ने जानबूझकर ऐसी चार्जशीट तैयार की जो भ्रम पैदा करे।
मुख्य आरोपी पर जज ने जताई हैरानी — “इन्हें आरोपी कैसे बनाया?”
फैसले का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा तब सामने आया जब जज ने मुख्य आरोपी कुलदीप सिंह को डिस्चार्ज करते हुए कहा कि वह “हैरान हैं कि इन्हें मुख्य आरोपी कैसे बनाया गया, जबकि इनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है।”
जब मुख्य आरोपी के खिलाफ ही सबूत नहीं, तो बाकी 22 आरोपियों के खिलाफ क्या होगा — यह सवाल अपने आप में जवाब है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि इस केस में ट्रायल तक शुरू नहीं की जा सकती — यानी मामला इतना खोखला है कि सुनवाई की भी जरूरत नहीं।
सबसे बड़ा आदेश — CBI अधिकारियों की होगी विभागीय जांच
इस फैसले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्पेशल जज जितेंद्र सिंह ने सिर्फ आरोपियों को बरी नहीं किया, बल्कि इस केस से जुड़े सीबीआई अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच के आदेश भी दिए हैं। जज ने लिखा कि ऐसा इसलिए जरूरी है “ताकि सिद्धांतों और संविधान की व्यवस्थाओं में लोगों का यकीन बना रहे।”
यह आदेश इसलिए ऐतिहासिक है क्योंकि अदालतें आमतौर पर जांच एजेंसियों के अधिकारियों की जांच के निर्देश नहीं देतीं। जब कोर्ट को लगा कि जांच में इतनी बड़ी गड़बड़ी हुई है कि अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए — तो यह बताता है कि जांच किस स्तर तक दूषित थी।
493 गवाह खड़े किए, फिर भी सबूत नहीं मिला
मनीष सिसोदिया के खिलाफ सीबीआई ने 493 गवाह खड़े किए थे। इतनी बड़ी संख्या में गवाह पेश करने के बावजूद एक भी ठोस सबूत सामने नहीं आया। यह सवाल गंभीर है — ये 493 गवाह आए कहां से? इन्हें किस आधार पर पेश किया गया? क्या ये गवाह बनाए गए थे?
पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि “जितने गवाह हैं, लगता नहीं भविष्य में ट्रायल शुरू हो पाएगा।” आज स्पेशल कोर्ट ने उसी बात को सच साबित कर दिया।
केजरीवाल-सिसोदिया हुए भावुक — “कट्टर ईमानदार साबित हुए”
फैसले की खबर सुनते ही अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया रोने लगे। भावनाओं पर काबू पाते हुए केजरीवाल ने कहा — “मैंने केवल अपनी जिंदगी में ईमानदारी कमाई है। इन्होंने झूठा केस लगाया और आज यह साबित हो गया। कोर्ट ने कहा है कि केजरीवाल कट्टर ईमानदार है, मनीष सिसोदिया कट्टर ईमानदार है, आम आदमी पार्टी कट्टर ईमानदार है।”
आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने गोदी मीडिया और बीजेपी प्रवक्ताओं को ललकारते हुए कहा — “हम बार-बार हाथ जोड़कर कह रहे थे कि कोई एक सबूत तो दिखाओ। कोई रुपया मिला हो, कोई प्लॉट मिला हो, कोई गहना मिला हो — कुछ तो दिखाओ। नहीं सुनी गई हमारी बात। खूब बदनाम किया गया। हजारों टीवी शो हुए, डिबेट्स हुईं।”
“आजाद भारत का सबसे बड़ा राजनीतिक षड्यंत्र” — AAP का सीधा आरोप
केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर सीधा हमला बोलते हुए कहा — “मोदी जी और अमित शाह जी ने मिलकर आजाद भारत का सबसे बड़ा राजनीतिक षड्यंत्र रचा। आम आदमी पार्टी को खत्म करने के लिए पार्टी के पांच सबसे बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया गया।”
उन्होंने कहा — “भारत के इतिहास में कभी ऐसा नहीं हुआ कि बैठे हुए मुख्यमंत्री को घर से घसीटकर जेल में डाला गया हो। मुझे छह महीने और मनीष सिसोदिया को लगभग दो साल तक सलाखों के पीछे रखा गया। पूरा का पूरा फर्जी केस था।”
संजय सिंह ने मोदी और शाह को चेतावनी दी — “आप इस देश को बर्बाद नहीं कर सकते। आपको इस देश को बर्बाद करने की छूट नहीं दी जाएगी। अरविंद केजरीवाल, आम आदमी पार्टी और मनीष सिसोदिया चट्टान की तरह आपकी तानाशाही के खिलाफ पहले भी खड़े थे और आगे भी खड़े होते रहेंगे।”
सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही दे दिए थे संकेत — “पिंजरे का तोता”
इस फैसले को समझने के लिए पीछे मुड़कर देखना जरूरी है। सितंबर 2024 में जब केजरीवाल को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली, तब कोर्ट ने सीबीआई को “पिंजरे में बंद तोता” की धारणा से बाहर आने के लिए कहा था।
उस बेंच में जस्टिस उज्जवल भुयान और जस्टिस सूर्यकांत (वर्तमान चीफ जस्टिस) थे। केजरीवाल की गिरफ्तारी को चैलेंज किया गया था और दोनों जजों की राय अलग-अलग थी। जस्टिस सूर्यकांत ने गिरफ्तारी को वैध माना, लेकिन जस्टिस भुयान ने इसे अवैध करार दिया।
जस्टिस भुयान ने कहा था — “22 महीनों तक केजरीवाल को गिरफ्तार नहीं किया गया। जब उन्हें रिहा किया जाना था, तभी गिरफ्तार क्यों किया गया? सीबीआई द्वारा केजरीवाल की गिरफ्तारी बस ईडी मामले में दी गई जमानत को निरर्थक बनाने के लिए थी।”
आज स्पेशल कोर्ट ने ठीक वही बात साबित कर दी जो जस्टिस भुयान ने कही थी — कोई सबूत नहीं, गिरफ्तारी राजनीतिक मकसद से थी।
सिसोदिया की जमानत का दर्दनाक इतिहास — 17 महीने जेल, पत्नी बीमार
मनीष सिसोदिया का मामला इस पूरे प्रकरण का सबसे दर्दनाक अध्याय है। उन्हें 17 महीने जेल में रखा गया। इस दौरान उनकी पत्नी गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं और सिसोदिया को अपनी पत्नी से मिलने के लिए एक-एक दिन की मोहलत मांगनी पड़ती थी।
जमानत का सफर देखें — 21 मई 2024 को हाईकोर्ट के जस्टिस स्वर्णकांता ने जमानत नहीं दी। 4 जून 2024 को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने भी जमानत खारिज कर दी।
आखिरकार 9 अगस्त 2024 को पूर्व चीफ जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने जमानत दी और ट्रायल कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट तक को सुना दिया। जस्टिस गवई ने कहा — “हमने महसूस किया है कि जमानत देने के मामलों में निचली अदालतें सेफ खेल रही हैं। समय आ गया है कि ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट समझें कि जमानत नियम है, जेल अपवाद।”
और अब स्पेशल जज कह रहे हैं — कोई सबूत ही नहीं था। तो फिर 17 महीने जेल में किस आधार पर रखा गया?
गिरफ्तारी का टाइमिंग — चुनाव से ठीक पहले क्यों?
यह सवाल बेहद अहम है। शराब घोटाले का मामला 22 महीने से चल रहा था। इतने लंबे समय तक केजरीवाल की गिरफ्तारी नहीं हुई। लेकिन जैसे ही 2024 का लोकसभा चुनाव करीब आया, मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट लागू होने के मात्र 5 दिन बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
156 दिनों तक जेल में रखा गया। बीच में लोकसभा चुनाव प्रचार के लिए जमानत मिली, लेकिन प्रभावी प्रचार नहीं हो पाया। दिल्ली की सातों लोकसभा सीटें बीजेपी ने जीतीं।
यह सवाल उठता है — अगर केजरीवाल बाहर होते तो क्या दिल्ली के नतीजे वही होते? क्या यह गिरफ्तारी चुनावी रणनीति का हिस्सा थी?
याद करें — रामलीला मैदान में इंडिया गठबंधन की रैली में दो कुर्सियां खाली छोड़ी गई थीं — एक केजरीवाल के लिए और एक हेमंत सोरेन के लिए। दोनों उस समय जेल में थे।
ईडी का खेल — जमानत मिली नहीं कि नया केस बना दिया
केजरीवाल के मामले में ईडी (ED) की कार्रवाई का एक प्रसंग इस पूरे मामले की तस्वीर साफ कर देता है। जब ईडी कोर्ट ने केजरीवाल को जमानत दी, तो ऑर्डर की कॉपी आने से पहले ही ईडी ने हाई कोर्ट जाकर जमानत पर रोक लगवा दी। न्यायपालिका के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि बिना ऑर्डर की कॉपी के रिहाई पर रोक लगाई गई।
इसके तुरंत बाद सीबीआई का नया मामला बना दिया गया ताकि केजरीवाल जेल में ही रहें। यानी एक एजेंसी ने छोड़ा तो दूसरी ने पकड़ लिया — मकसद सिर्फ एक था कि किसी भी कीमत पर जेल में रहना चाहिए।
कांग्रेस नेताओं की प्रतिक्रिया — “बीजेपी इच्छाधारी नाग है”
कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने कहा कि बीजेपी ने आम आदमी पार्टी से दिल्ली छीन ली और अब उसे पंजाब, गोवा, गुजरात में आप की जरूरत है ताकि कांग्रेस का उभार न हो।
कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने और तीखा हमला करते हुए कहा — “भाजपा कोई राजनीतिक दल नहीं, वह एक इच्छाधारी नाग है जिसके पास रूप बदलने की शक्ति है। उसका एक ही जुनूनी लक्ष्य है — कांग्रेस मुक्त भारत। 12 वर्षों तक तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ जहर उगला और अब मोदी स्वयं उसकी प्रशंसा कर रहे हैं — वह भी सम्मान के कारण नहीं, बल्कि कांग्रेस पर वार करने के लिए।”
खेड़ा ने यह भी कहा कि “चुनाव आ रहे हैं। पटकथा अनुमानित है — कांग्रेस नेताओं के मामलों में अचानक तेजी आएगी। पी. चिदंबरम को फिर से सुर्खियों में घसीटा जा रहा है क्योंकि तमिलनाडु में चुनाव होने वाले हैं। वहीं आम आदमी पार्टी के खिलाफ कार्रवाइयां गुजरात और पंजाब चुनावों के मद्देनजर चुपचाप ठंडी पड़ जाएंगी।”
मोदी के वो बयान जो आज शर्मिंदा करते हैं
प्रधानमंत्री मोदी ने इसी शराब घोटाले को लेकर चुनावी रैलियों में बार-बार भाषण दिए। उन्होंने कहा था — “केजरीवाल जी, अभी तो सिर्फ शराब घोटाले की जांच हुई है, सात घोटालों की जांच बाकी है। इनके जैसा निर्लज्ज व्यक्ति मैंने मेरे जीवन में नहीं देखा।”
संसद में प्रधानमंत्री ने कहा था — “मैंने एजेंसियों को भ्रष्टाचारियों पर कड़ी से कठोर कार्रवाई करने की खुली छूट दे रखी है। सरकार कहीं पर भी टांग नहीं अड़ाएगी। कोई भी भ्रष्टाचारी कानून से बचकर नहीं निकलेगा — यह मोदी की गारंटी है।”
आज जब 600 पन्नों के फैसले में कहा गया कि कोई सबूत ही नहीं था, तो यह सवाल उठता है कि प्रधानमंत्री किस आधार पर इतने बड़े-बड़े दावे कर रहे थे? क्या उन्हें पता नहीं था कि मामला खोखला है, या फिर जानते हुए भी जनता को गुमराह किया गया?
न्यायिक व्यवस्था पर भी उठते हैं सवाल
यह फैसला सीबीआई और ईडी को तो एक्सपोज करता ही है, लेकिन साथ ही न्यायिक व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। अक्टूबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट में पूर्व चीफ जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस एस.वी. भट्टी की बेंच ने ईडी और सीबीआई के पेश किए गए सबूतों के आधार पर मनीष सिसोदिया की जमानत खारिज कर दी थी और माना था कि “प्रथम दृष्टया मनी लॉन्ड्रिंग के पर्याप्त सबूत मौजूद हैं।”
आज स्पेशल कोर्ट कह रहा है कि सबूत ही नहीं मिले। तो क्या उस समय सुप्रीम कोर्ट को जो सबूत दिखाए गए, वे भी भ्रामक थे? इसके बाद 10 महीने तक मनीष सिसोदिया जेल में रहे — वह भी बिना किसी ठोस सबूत के।
जस्टिस विश्वनाथन ने जमानत सुनवाई के दौरान ईडी के वकील से एक बेहद अहम सवाल पूछा था — “आखिर सरकारी नीति और आपराधिकता के बीच कहां पर रेखा खींची जाए? क्या सिर्फ इसलिए आपराधिकता मानी जा सकती है कि नीति में बदलाव से कुछ शराब विक्रेताओं को लाभ पहुंचा?”
आज उस सवाल का जवाब मिल गया — कोई आपराधिकता थी ही नहीं।
एजेंसियों का पैटर्न — एक मामले की पोल खुले, दूसरा तैयार
इस फैसले के बाद एक और पैटर्न साफ दिख रहा है। जैसे ही केजरीवाल-सिसोदिया मामले में पोल खुली, ठीक उसी समय कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का नया केस खोल दिया गया। चिदंबरम को पहले भी Aircel-Maxis और INX Media मामले में रात को गिरफ्तार किया गया था — सीबीआई के अफसर उनके घर की दीवारें फांदकर गए थे, जैसे कि चिदंबरम उसी रात विदेश भागने वाले हों। 106 दिन जेल में रहे।
एक मामले में पोल खुलती है, उसके पहले ही दूसरे मामले की तैयारी हो जाती है। आम जनता पर खबरों और घटनाओं का इतना विस्फोट किया जाता है कि लोग समझ ही नहीं पाते कि हो क्या रहा है — और थककर मान लेते हैं कि “कुछ तो गड़बड़ है तभी पकड़े जा रहे हैं।”
गोदी मीडिया की भूमिका — हजारों घंटे की फर्जी डिबेट
इस पूरे मामले में मीडिया की भूमिका पर भी सवाल खड़े होते हैं। केजरीवाल और सिसोदिया के बयानों में बार-बार “गोदी मीडिया” और टीवी डिबेट्स का जिक्र आया। 24 घंटे टीवी चैनलों पर “केजरीवाल भ्रष्ट है” का नैरेटिव चलाया गया। हजारों टीवी शो हुए, डिबेट्स हुईं — और अब निकला कि कोई सबूत ही नहीं था।
जिस मामले में कोर्ट को सबूत नहीं मिले, उस मामले में दिल्ली और देश की जनता को रोज डिबेट परोसा गया ताकि लोग “तंग आकर मान ही लें कि कुछ है तभी इतनी बहस है।” तरह-तरह के दावे किए गए, दावेदार खड़े किए गए — और बीजेपी के प्रवक्ताओं ने अनगिनत आरोप लगाए।
आज सवाल यह है कि जो मीडिया बिना सबूत के किसी को अपराधी साबित करने में जुटा रहा, वह अपनी करतूतों को कहां छिपाएगा?
यह फैसला सिर्फ केजरीवाल-सिसोदिया का नहीं — पूरे लोकतंत्र का है
स्पेशल कोर्ट का यह फैसला भारत के राजनीतिक इतिहास का बड़ा मोड़ है। यह सिर्फ दो नेताओं के बरी होने की कहानी नहीं है — यह उन सभी लोगों के लिए संदेश है जो फर्जी मुकदमों और छापों से डरकर चुपचाप बैठे रहते हैं।
इस फैसले ने कई बातें एक साथ साबित की हैं — सीबीआई और ईडी की स्वायत्तता का दावा खोखला है, एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के रूप में हो रहा है, विरोधी नेताओं को बिना सबूत के जेल भेजा जा सकता है और इस खेल में मीडिया से लेकर कई संस्थाएं शामिल हो जाती हैं।
लेकिन इसी के साथ एक उम्मीद भी जगी है — कि किसी न किसी कलम का ईमान जाग सकता है, किसी की स्याही से सच निकल सकता है। आज वही हुआ।
मुख्य बातें (Key Points)
- स्पेशल जज जितेंद्र सिंह ने 600 पन्नों के आदेश में लिखा कि सीबीआई की हजारों पन्नों की चार्जशीट में “ऐसे गैप हैं जो किसी गवाही से भी नहीं भरे जा सकते” — केजरीवाल को बिना सबूत के फंसाया गया और सिसोदिया के खिलाफ प्रथम दृष्टया केस तक नहीं बना।
- सबसे बड़ा आदेश — जज ने केस में शामिल सीबीआई अधिकारियों की विभागीय जांच के निर्देश दिए, ताकि संविधान और संस्थाओं में लोगों का विश्वास बना रहे।
- सिसोदिया के खिलाफ 493 गवाह पेश किए गए, फिर भी कोई सबूत नहीं मिला — सिसोदिया 17 महीने जेल में रहे जबकि उनकी पत्नी गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं।
- गिरफ्तारी का टाइमिंग सवालों में — 22 महीने तक गिरफ्तारी नहीं हुई, लोकसभा चुनाव से ठीक पहले मॉडल कोड लागू होने के 5 दिन बाद गिरफ्तार किया गया — जस्टिस उज्जवल भुयान ने इसे पहले ही अवैध करार दिया था।








