Sukhbir Singh Badal Defamation Case: आठ साल पुराने मानहानि मामले में शनिवार को बड़ा घटनाक्रम सामने आया। Sukhbir Singh Badal चंडीगढ़ जिला कोर्ट में पेश हुए, जहां कोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी। इससे पहले लगातार पेशी पर अनुपस्थित रहने के कारण उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया गया था। यह मामला Chandigarh की अदालत में चल रहा है और लंबे समय से राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है।

कोर्ट में पेशी क्यों बनी मजबूरी
चंडीगढ़ जिला कोर्ट ने इससे पहले पेशी पर गैरहाजिर रहने को गंभीरता से लेते हुए सुखबीर बादल की जमानत रद्द कर दी थी। इसके बाद उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया गया। सख्त कानूनी कार्रवाई की आशंका के चलते शनिवार को उन्हें अदालत में पेश होना पड़ा, जहां उन्होंने जमानत के लिए अर्जी दाखिल की।
2017 का है मानहानि मामला
यह केस वर्ष 2017 का है। अखंड कीर्तनी जत्था के प्रवक्ता और मोहाली निवासी Rajinder Pal Singh ने सुखबीर सिंह बादल के खिलाफ चंडीगढ़ जिला कोर्ट में मानहानि की शिकायत दर्ज करवाई थी। शिकायत भारतीय दंड संहिता की धारा 499 के तहत दायर की गई थी।
कोर्ट के आदेश की अनदेखी पर सख्ती
कोर्ट के आदेश के बावजूद 17 दिसंबर 2025 को सुखबीर बादल पेश नहीं हुए थे। इसके बाद अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट Rahul Garg की अदालत ने उनकी जमानत रद्द कर दी और गैर-जमानती वारंट जारी कर दिए। इसी के बाद मामला फिर से सुर्खियों में आ गया।
हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत
सुखबीर बादल ने इस केस को रद्द करवाने के लिए Punjab and Haryana High Court में याचिका दायर की थी। हालांकि हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद मामला चंडीगढ़ जिला कोर्ट में ही आगे बढ़ता रहा।

क्या है विवाद की जड़
मामले की शुरुआत 4 जनवरी 2017 की एक घटना से जुड़ी है। उस समय Arvind Kejriwal दिल्ली में राजिंदर पाल सिंह के आवास पर गए थे। इसके बाद सुखबीर सिंह बादल ने मीडिया को दिए बयान में अखंड कीर्तनी जत्था को प्रतिबंधित आतंकी संगठन बब्बर खालसा इंटरनेशनल का राजनीतिक फ्रंट बताया था। इसी बयान को शिकायतकर्ता ने अपनी संस्था की छवि को नुकसान पहुंचाने वाला बताया।
शिकायतकर्ता का आरोप
राजिंदर पाल सिंह का कहना है कि इस बयान से उनके संगठन की प्रतिष्ठा को गंभीर ठेस पहुंची। इसी आधार पर उन्होंने अदालत का रुख किया और मानहानि का मामला दर्ज कराया, जो अब तक अदालत में विचाराधीन है।
आम लोगों पर असर
इस तरह के मामलों से यह संदेश जाता है कि सार्वजनिक मंच पर दिए गए राजनीतिक बयानों की कानूनी जिम्मेदारी तय हो सकती है। आम लोगों के लिए यह मामला अभिव्यक्ति की सीमा और कानून के दायरे को समझने का उदाहरण बनता है।
विश्लेषण (Analysis)
सुखबीर सिंह बादल को जमानत मिलना भले ही तात्कालिक राहत हो, लेकिन गैर-जमानती वारंट तक पहुंचा यह मामला दिखाता है कि अदालतें लंबे समय से लंबित मामलों में अब सख्त रुख अपना रही हैं। यह केस पंजाब की राजनीति में बयानबाजी और उसकी कानूनी कीमत पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है। आगे की सुनवाई में यह तय होगा कि यह मामला केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहता है या कानूनी रूप से कोई नई दिशा लेता है।
जानें पूरा मामला
2017 में दिए गए एक बयान को लेकर अखंड कीर्तनी जत्था के प्रवक्ता ने सुखबीर सिंह बादल पर मानहानि का आरोप लगाया। पेशी से गैरहाजिरी के कारण कोर्ट ने उनकी जमानत रद्द कर गैर-जमानती वारंट जारी किया था। शनिवार को चंडीगढ़ जिला कोर्ट में पेश होने के बाद उन्हें जमानत मिल गई।
मुख्य बातें (Key Points)
- 8 साल पुराने मानहानि केस में सुखबीर बादल को जमानत मिली।
- पेशी पर गैरहाजिरी के चलते पहले जारी हुआ था गैर-जमानती वारंट।
- मामला IPC की धारा 499 के तहत दर्ज है।
- हाईकोर्ट से राहत न मिलने के बाद केस जिला कोर्ट में जारी है।








