Critic Review: Mohenjo Daro

हाल के दिनों में, फिल्मकार आशुतोष गोवारिकर ऐतिहासिक फिल्में और असल जीवन से भी बड़े परिदृश्य पर बने साफ़ सरीखे सेट के पर्याय बन गए हैं । जोधा अकबर, स्वदेश और लगान जैसी फ़िल्में इस बात का प्रमाण हैं । इस हफ़्ते बॉक्सऑफ़िस पर रिलीज हुई आशुतोष गोवारीकर के पिटारे से एक और पीरियड फिल्म मोहेंजो दारो ।  क्या मोहेंजो दारो बॉक्सऑफ़िस पर ऐतिहासिक दौड़ लगाएगी या धराशाही होगी, आइए विश्लेषण करते हैं ।

फ़िल्म उत्तर पश्चिम क्षेत्र में 2016 ईसा पूर्व के युग के साथ शुरूआत होती है, जो प्रागैतिहासिक भारत में होने वाला है । फिल्म की कहानी उस समय पर आधारित है जब सिंधु घाटी सभ्यता के अन्तर्गत लोग रहा करते थे । फ़िल्म की कहानी धीरे-धीरे एक छोटे से गांव आमरी के सरमन (ह्रितिक रोशन) और एक शिकारी मगरमच्छ के साथ उसकी विजयी लड़ाई के परिचय के साथ आगे बढ़ती है । एक तरफ़ तो गांव वाले सरमन की इस जीत पर उसका अभिनंदन करते हैं वहीं दूसरी तरफ़ सरमन मोहेंजो दारो का दौरा करने के लिए जिद करता है , लेकिन सरमन के चाचा (नितिश भारद्दाज) और चाची किसी कारण की वजह से जो सिर्फ़ वही जानते हैं, सरमन को वहां भेजने के इच्छुक नहीं दिखते हैं । एक दिन, बहुत अनिच्छा के बाद, सरमन के चाचा और चाची सरमन की मोहेंजो दारो घूमने की मांग पर अनुमति दे देते हैं लेकिन साथ ही उसे एक पहचान सिक्का सौंप देते हैं । जब सरमन, मोहेंजो दारो पहुंचता है, तो कई अन्य चीजों के बीच वह खूबसूरत सिंधु पुत्री चानी (पूजा हेगड़े) को देखता है, जो कि धार्मिक पंडित (मनीष चौधरी) की बेटी होती है ।  सरमन और चानी, दोनों के लिए ये पहली नजर वाला अनकहा प्यार बन जाता है । एक दिन, जिज्ञासु सरमन, चानी की तलाश में ऊपरी शहर का मुआयना करने निकल जाता है । और यहां आकर सरमन भव्य दृश्यों और स्थानों को देखकर दंग रहने के अलावा,  बुराई के शासक महम (कबीर बेदी), जो कुछ समय पहले हड़प्पा से निर्वासित कर दिया गया था, के अधीन असमानता भरे शासन का गवाह बनता है । महम,अपनी शक्तियों की वजह से बलपूर्वक सबके ऊपर राज करने की कोशिश करता है ,जिसमें उसके बेटे मूंजा (अरुणोदय सिंह) का भी बड़ा हाथ होता है । कुछ ही समय में, सरमन जन प्रतिनिधि बन जाता है और महम के अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाता है । इन सबके बीच, पंडित सरमन को एक रहस्य बताता है जो न केवल सरमन को हैरान करता है बल्कि उसे पूरी तरह से झकझोर कर रख देता है । ऐसा क्या राज था जिसके बारें में सरमन को पता चला, मोहेंजो दारो शहर से उसका क्या नाता था, और क्या चानी और सरमन का प्यार परवान चढ़ेगा… ये सब बाकी की कहानी में पता चलेगा जो कि फ़िल्म देखने के बाद ही पता चलती है ।

फिल्म के विशालकाय चित्रफलक के बावजूद, इस फिल्म की कहानी और पटकथा (आशुतोष गोवारिकर) प्रमुखरूप से निराशाजनक है और जो दर्शकों को बहुत निराश करती है । इस समय ऐसी फ़िल्मों का स्क्रीनप्ले लिखने के दौरान ये सुनिश्चित करना पड़ेगा कि दर्शकों और उनकी समझदारी को कम नहीं आंका जा सकता ।  दुखद बात यह है कि आशुतोष गोवारिकर इस मोर्चे पर विफल रहे ।

आशुतोष गोवारिकर, जिसने ऐतिहासिक और पीरियड फ़िल्में बनाकर हमेशा पुरस्कार जीते हैं, इस बार एक निर्देशक के रूप में मोहेंजो दारो के साथ बुरी तरह विफ़ल रहे । यह कहना गलत नहीं होगा कि, सिनेमाई स्वतंत्रता के नाम पर आशुतोष गोवारिकर दर्शकों की भावना और धैर्य को कम आंकते हैं । फ़िल्म का फ़र्स्ट हाफ़ बहुत धीमा है, और मध्यांतर के बाद फ़िल्म बुरी तरह से खींची गई है । मध्यांतर के बाद फ़िल्म एक नए ट्रेक पर चल पड़ती है । फ़िल्म का क्लामेक्स फ़िल्म को बदतर बना देता है । आशुतोष गोवारिकर, अपने दर्शकों को मोहनजोदड़ो सभ्यता समझाने में विफ़ल रहते हैं  । हर कोई ये समझने में असफ़ल होता है कि आशुतोष गोवारिकर, जो शानदार फ़िल्में बनाने के लिए जाने जाते हैं , मोहेंजो दारो के साथ गलत कर सकते हैं  ।

अभिनय की बात करें तो, ये फिल्म स्पष्ट रूप से अत्यंत बहुमुखी अभिनेता ह्रितिक रोशन की फ़िल्म है, जो इस वक्त ऐसी भूमिका के लिए सबसे पसंदीदा व्यक्ति बन चुके हैं । अपने ग्रीक गॉड लुक और  शारीरिक कद के साथ, ह्रितिक रोशन अपने सरल-सादा, आडंबरहीन किसान से एक रक्षक बनने की भूमिका के साथ पूरी तरह से न्याय करते हैं । ह्रितिक ने अपने मंत्रमुग्ध कर देने वाले अभिनय और लचीले एक्शन से फ़िल्म में चार चांद लगा दिए हैं । ह्रितिक फ़िल्म में हर जगह जंचे हैं । पूरी फ़िल्म ह्रितिक के कंधों पर चलने के बावजूद फ़िल्म की पटाकथा बेहद कमजोर साबित हुई है । फ़िल्म की अभिनेत्री पूजा हेगड़े ने दक्षिण में कई फ़िल्में करने के बाद मोहेंजो दारो से अपना बॉलीवुड डेब्यू किया । पिछले अनुभव के बावजूद, पूजा इस फ़िल्म में औसत लगी हैं । दिग्गज अभिनेता कबीर बेदी महम की भूमिका में श्रेष्ठ लगे हैं ।  कबीर बेदी को जो खास बनाता है वो है उनका लुक और उनकी मध्यम आवाज़, दोनों को ही आशुतोष गोवारिकर ने बहुत ही खूबसूरती के साथ इस्तेमाल किया है । इसके अलावा अरुणोदय सिंह, सुहासिनी मुले, नीतिश भारद्दाज़ फ़िल्म को आगे बढ़ाने में भरपूर साथ देते हैं ।

हम फिल्म की वेशभूषा (नीता लुल्ला) के लिए एक विशेष रूप से उल्लेख करना चाहेंगे, फिल्म के वीएफएक्स अनाड़ी और औसत के बीच झूलते हैं । इस फिल्म के संगीत (ए आर रहमान) में असाधारण जैसा कुछ भी नहीं है , जैसा कि आम तौर पर संगीत के जादूगर से उम्मीद की जाती है । फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर शालीन है, लेकिन कई जगह बहुत शोर-शराबे वाला लगा ।

फिल्म का छायांकन (सी.के. मुरलीधरन) औसत से ऊपर है ।  फिल्म का संपादन (संदीप फ्रांसिस) फिल्म की कमियों में से एक है ।

कुल मिलाकर, मोहेंजो दारो, एक भव्य ऐतिहासिक काल्पनिक कहानी है जो केवल कुछ हिस्सों में आकर्षित लगती है । ये फ़िल्म बांधकर नहीं रखती है और हद से ज्यादा ड्रामा फ़िल्म के कथानक को बिगाड़ देता है । बॉक्स ऑफिस के नजरिए से, रुस्तम से मुकाबला और महत्वपूर्ण कथा की कमी फ़िल्म के लिए एक बड़ी अड़चन साबित होगी ।

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