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The News Air - Breaking News - Brothers Home South Korea: Real Squid Game से भी भयावह साउथ कोरिया का काला सच

Brothers Home South Korea: Real Squid Game से भी भयावह साउथ कोरिया का काला सच

सोशल प्यूरिफिकेशन के नाम पर 16,000 लोगों को बंधक बनाकर यातनाएं, जबरन मज़दूरी और हत्याएं, यह है साउथ कोरिया का वो काला अध्याय जो इतिहास में दफन रहा

अभिनव कश्यप by अभिनव कश्यप
शनिवार, 7 मार्च 2026
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Squid Game
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Brothers Home South Korea Dark History वो सच है जिसे साउथ कोरिया की चमकती तरक्की के पीछे दशकों तक दबाकर रखा गया। 1981 से 1987 के बीच “सोशल प्यूरिफिकेशन प्रोजेक्ट” के नाम पर साउथ कोरिया में 16,000 से ज़्यादा निर्दोष लोगों को उनके घरों से, सड़कों से और स्कूल के रास्तों से उठाकर 30 फीट ऊंची दीवारों के पीछे कैद कर दिया गया। वहाँ उन्हें नाम नहीं, नंबर दिए गए। उनसे बिना एक पैसा दिए जबरन मज़दूरी कराई गई और विरोध करने पर मौत के घाट उतार दिया गया। यह Squid Game नहीं, असली ज़िंदगी की सबसे भयावह कहानी है।


‘1981: जब सफाई अभियान बन गया जुल्म का हथियार’

साल 1981 में साउथ कोरिया में एक फॉर्मर मिलिट्री जनरल चुन डू-ह्वान ने सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया था। उन्होंने अपने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा जिसमें आदेश था कि सियोल और बुसान जैसे बड़े शहरों में भीख माँगने वालों, बेघरों और आवारा लोगों को सड़कों से साफ किया जाए।

इस आदेश के पीछे असली वजह थी 1986 के एशियन गेम्स और 1988 के सियोल ओलंपिक की तैयारी। दुनिया के सामने साउथ कोरिया की एक चमकदार छवि पेश करनी थी। इसी मकसद से शुरू हुआ वो तथाकथित सोशल प्यूरिफिकेशन प्रोजेक्ट, जो कागज़ पर एक वेलफेयर कार्यक्रम था लेकिन असलियत में एक राष्ट्रव्यापी क्रूरता का अभियान था।

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’36 वेलफेयर सेंटर, और उनमें से एक था Brothers Home’

सरकार ने कागज़ पर लिखा था कि उठाए गए लोगों को वेलफेयर कैंप्स में ट्रेनिंग और शिक्षा दी जाएगी और एक साल बाद उनके परिवारों के पास भेज दिया जाएगा। इसी बहाने पूरे साउथ कोरिया में 36 फैसिलिटीज बनाई गईं, जिनमें से कुछ सरकारी थीं और कुछ निजी। इन्हीं में से एक थी Brothers Home।

Brothers Home का मालिक था पार्क इन-कन और उसका भाई-बहनोई लिम। इन दोनों को सरकार और पुलिस का पूरा समर्थन हासिल था। पुलिस के लिए एक रिवॉर्ड सिस्टम बनाया गया था जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को सड़क से उठाकर फैसिलिटी में पहुँचाने पर पैसे मिलते थे। इस लालच में पुलिस ने न सिर्फ बेघर लोगों को, बल्कि बच्चों, दिव्यांगों, बिना आईडी कार्ड वालों और बिल्कुल निर्दोष लोगों को भी उठाना शुरू कर दिया।


‘हान जोंगसन: वो बच्चा जो अपने पिता का इंतज़ार कर रहा था’

1984 में सियोल में एक पुलिस सब-स्टेशन के बाहर हान जोंगसन और उसकी छोटी बहन खड़े थे। उनके पिता थोड़ी देर के लिए उन्हें वहाँ छोड़कर किसी काम से गए थे। तभी एक बस आई, उसमें से पुलिसवाले उतरे और दोनों बच्चों को जबरदस्ती बस में बिठाने लगे। जब हान ने विरोध किया और उसकी बहन रोने लगी, तो उन्हें बस के अंदर ही बुरी तरह पीटा गया ताकि वे चुप हो जाएं। वो बस सीधे Brothers Home पहुँची और उन दोनों बच्चों को अगले तीन साल के लिए वहाँ बंद कर दिया गया।

न वे बेघर थे, न भिखारी, न बेरोज़गार। बस एक लापरवाह पल में उनकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल गई।


’13 साल का चोई: आधी रोटी ने छीन लिए पाँच साल’

1980 के दशक में ही एक और दिल दहला देने वाला किस्सा है 13 साल के चोई सो-बू का। वो स्कूल से घर लौट रहा था। रास्ते में पुलिस का ट्रक आकर रुका। पुलिसवालों ने उसके बैग की तलाशी ली और टिफिन बॉक्स में स्कूल के लंच की बची हुई आधी रोटी देखकर यह कहना शुरू किया कि उसने यह चोरी की है। चोई ने बार-बार कहा कि यह उसकी माँ ने दिया हुआ लंच है, लेकिन पुलिसवालों ने उसे तब तक टॉर्चर किया जब तक उसने यह नहीं कह दिया कि उसने चोरी की। इसके दस मिनट के अंदर उसे Brothers Home पहुँचा दिया गया जहाँ उसकी अगले पाँच साल की कैद शुरू हो गई।


‘Brothers Home का खौफनाक सिस्टम: नाम नहीं, नंबर’

Brothers Home एक मिलिट्री कैंप की तरह चलता था। अंदर आते ही हर इनमेट का नाम मिटा दिया जाता था और उसे एक नंबर दिया जाता था। 10 साल की उम्र में Brothers Home लाया गया ली डोंग-जिन बताता है कि उसकी पहचान सिर्फ नंबर 110 थी।

सभी इनमेट्स को प्लाटूनों में बाँटा गया था। हर प्लाटून का एक लीडर होता था जो इन्हीं इनमेट्स में से चुना जाता था। उस लीडर को धमकी दी जाती थी कि अगर उसने अपने प्लाटून को काबू में नहीं रखा, तो उसे खुद सज़ा मिलेगी। इसीलिए वे लीडर अपने ही साथियों पर अत्याचार करते थे, उन्हें मारते थे। बाद में जब एक प्रोफेसर पार्क सु-क्यून ने इन घटनाओं की जाँच की, तो एक प्लाटून लीडर ने रोते हुए बताया कि वह मजबूर था, क्योंकि अगर वह ऐसा नहीं करता तो उसे खुद सज़ा मिलती।


‘रात का अंधेरा: जब दिन का डर रात में बन जाता था नरक’

जो दिन में होता था वो काफी था, लेकिन रात को लाइट बंद होते ही Brothers Home में एक और नरक शुरू होता था। बलात्कार, हिंसा और टॉर्चर रात के अंधेरे में अपने चरम पर पहुँच जाते थे। 13 साल की उम्र में Brothers Home पहुँचे ली ने बताया कि हर रात बस यही डर रहता था कि अब क्या होगा। यौन शोषण यहाँ एक रूटीन बन गया था। चोई ने बताया कि उसने अपने सामने एक साथी को सिर्फ इसलिए मरते देखा क्योंकि उसने यह पूछा था कि हमें यहाँ क्यों रखा गया है।


‘मनी मेकिंग मशीन: ज़िंदगियाँ सस्ती, मुनाफा भारी’

Brothers Home सिर्फ यातना का केंद्र नहीं था, यह एक विशाल मुनाफा कमाने की मशीन थी। यहाँ बंद 16,000 लोगों से साउथ कोरिया के खिलौने, जूते और औद्योगिक सामान बनवाए जाते थे। लेबर कॉस्ट शून्य थी क्योंकि एक भी पैसा किसी को नहीं दिया जाता था। मना करने पर मार पड़ती थी। बाहर बिकने वाला माल सीधे मालिकों की जेब भरता था। पार्क और लिम इस नरक से ताबड़तोड़ पैसा कमा रहे थे।


‘1986: जब टूटने लगी चुप्पी की दीवार’

1986 में कुछ प्राइवेट इन्वेस्टिगेटर्स और एक लोकल प्रॉसिक्यूटर की नज़र Brothers Home पर पड़ी। उन्होंने चुपचाप जाँच शुरू की। परिवारों की शिकायतें आने लगी थीं कि उनके लोग सालों से वापस नहीं आए। आखिरकार अधिकारियों तक मामला पहुँचा और Brothers Home पर छापा पड़ा। 1987 की एक रिपोर्ट ने खुलासा किया कि अंदर बंद 90% लोग वो थे जो वास्तव में बेघर या ज़रूरतमंद नहीं थे। सिर्फ 10% ऐसे थे जिनके लिए यह प्रोजेक्ट कागज़ पर बनाया गया था।

ऑफिशियल रिकॉर्ड में 1981 से 1986 के बीच 513 मौतें दर्ज हैं, लेकिन सर्वाइवर्स कहते हैं कि यह संख्या हज़ारों में है। उनमें से एक ने बताया कि उसने अकेले अपने सामने 50 लोगों को मरते देखा।


‘ज़िंदगी लौटी, लेकिन ज़िंदगी लौटी नहीं’

1988 में साउथ कोरियाई सरकार ने सभी वेलफेयर सेंटर बंद किए। पार्क और लिम को गिरफ्तार किया गया लेकिन उन पर बेहद मामूली आरोप लगाए गए और दोनों महज दो साल जेल में रहे। जेल से निकलकर लिम अपने परिवार के साथ ऑस्ट्रेलिया चला गया और वहाँ एक चर्च के ज़रिए परमानेंट रेज़िडेंसी ले ली। पार्क भी बाद में ऑस्ट्रेलिया पहुँचा और दोनों ने सिडनी में एक चर्च खोला और “जॉब टाउन” नाम का एक नया प्रोजेक्ट शुरू किया जो Brothers Home का ही दूसरा रूप लगता था।

हान और उसकी बहन जब Brothers Home से निकले तो उनका बचपन पूरी तरह छिन चुका था। सालों तक मेंटल इंस्टिट्यूशन में रहना पड़ा। चोई ने बताया कि उसका दोस्त 2009 में इसी ट्रॉमा के बोझ तले आत्महत्या कर गया। चोई खुद कहता है कि आज भी समाज उसे उसी नज़र से देखता है जिस नज़र से उसे उठाया गया था।


‘Brothers Home और Squid Game: असलियत सीरीज से कहीं ज़्यादा दर्दनाक’

Squid Game एक काल्पनिक सीरीज है जहाँ एक जीतने वाले को इनाम मिलता है। लेकिन Brothers Home में न कोई विजेता था, न कोई इनाम। यहाँ इनमेट्स को प्लाटूनों में बाँटा जाता था, ठीक Squid Game की तरह। यहाँ लोगों को लोगों के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता था, ठीक Squid Game की तरह। लेकिन Squid Game में वयस्क थे, यहाँ ज़्यादातर 10 से 20 साल के बच्चे और किशोर थे। और सबसे बड़ा फ़र्क: Squid Game में एक्टिंग होती थी, यहाँ सब हकीकत थी।


‘मुख्य बातें (Key Points)’
  • 1981 में साउथ कोरिया की सरकार ने Asian Games और Seoul Olympics की तैयारी के लिए Social Purification Project शुरू किया जिसके तहत 36 वेलफेयर फैसिलिटीज बनाई गईं।
  • Brothers Home में 16,000 से ज़्यादा लोगों को बंद किया गया, उनके नाम छीनकर नंबर दिए गए, जबरन मज़दूरी कराई गई और यौन शोषण व हत्याएं रोज़ की बात थीं।
  • ऑफिशियल रिकॉर्ड में 513 मौतें दर्ज हैं लेकिन सर्वाइवर्स के अनुसार असली संख्या हज़ारों में है।
  • Brothers Home के मालिक पार्क और लिम को महज दो साल जेल मिली, जिसके बाद वे ऑस्ट्रेलिया जाकर फिर से इसी तरह की गतिविधियों में लग गए।
  • यह मामला Squid Game से कहीं ज़्यादा भयावह है क्योंकि यह असली है और इसमें ज़्यादातर पीड़ित बच्चे थे।

FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: Brothers Home क्या था और यह कहाँ था?

Brothers Home साउथ कोरिया में एक निजी वेलफेयर फैसिलिटी थी जो सरकार के Social Purification Project के तहत चलती थी। यह बाहर से एक रिहैबिलिटेशन सेंटर दिखती थी लेकिन अंदर यह एक यातना शिविर था जहाँ हज़ारों लोगों को जबरन कैद रखा गया।

प्रश्न 2: Brothers Home में कितने लोग बंद थे और कितनों की मौत हुई?

1986 तक Brothers Home में अकेले 16,000 से ज़्यादा लोग बंद थे। सरकारी रिकॉर्ड में 513 मौतें दर्ज हैं लेकिन सर्वाइवर्स का कहना है कि हज़ारों लोग मारे गए।

प्रश्न 3: Brothers Home के मालिकों को क्या सज़ा मिली?

Brothers Home के मालिक पार्क इन-कन और लिम को गिरफ्तार किया गया लेकिन उन पर बेहद हल्के आरोप लगाए गए। दोनों महज दो साल जेल में रहे। इसके बाद लिम ऑस्ट्रेलिया चला गया और पार्क भी वहीं पहुँचा, जहाँ दोनों ने सिडनी में एक चर्च और नया बिज़नेस प्रोजेक्ट शुरू किया।

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अभिनव कश्यप

अभिनव कश्यप 'The News Air' के संस्थापक और मुख्य संपादक (Chief Editor) हैं। डिजिटल मीडिया में उनके अनुभव में ग्राउंड रिपोर्टिंग, न्यूज़ डेस्क ऑपरेशन और एडिटोरियल लीडरशिप शामिल है। वे हर खबर की फैक्ट-चेकिंग और संपादन की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करते हैं। राजनीति, चुनाव विश्लेषण, सामाजिक मुद्दे और डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स उनकी विशेषज्ञता के प्रमुख क्षेत्र हैं। अभिनव का संपादकीय सिद्धांत है "सनसनी नहीं, सच्चाई; तेज़ी नहीं, तथ्य।"

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