Blue Light Filter Glasses – क्या आप भी स्क्रीन देखते वक्त ब्लू लाइट फिल्टर ग्लासेस पहनते हैं? कहीं आप एक बड़े मार्केटिंग स्कैम का शिकार तो नहीं हो रहे? अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थाल्मोलॉजी (AAO) का साफ कहना है कि ब्लू लाइट ग्लासेस जरूरी नहीं हैं और स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट से परमानेंट आई डैमेज का कोई प्रूफ नहीं है। 500 से 5000 रुपये तक के ये चश्मे कंपनियां बेचती हैं, लेकिन साइंटिफिक रिसर्च इनके दावों को सपोर्ट नहीं करती। आज हम बात करेंगे सिर्फ लॉजिक और साइंस की, बिना किसी हाइप के।
मार्केटिंग के शोर में अक्सर सच दब जाता है। कंपनियां दावा करती हैं कि ब्लू लाइट फिल्टर ग्लासेस आपकी आंखों को स्क्रीन की ब्लू लाइट से बचाएंगे, आई स्ट्रेन कम करेंगे, नींद बेहतर होगी और सिरदर्द तो होगा ही नहीं। लेकिन सच क्या है? क्या ये मार्केटिंग गिमिक है या रियल सॉल्यूशन? आइए साइंस की भाषा में समझते हैं।
ब्लू लाइट सच में क्या है?
ब्लू लाइट एक हाई एनर्जी विजिबल लाइट है। यह नेचुरल सनलाइट में भी होती है और डिजिटल स्क्रीन से भी निकलती है। कुछ लोग क्लेम करते हैं कि स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट आंखों को डैमेज करती है। लेकिन साइंस क्या कहती है?
आई डॉक्टर्स और रिसर्चर्स के हिसाब से, स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट इतनी कमजोर है कि वो रेटिना को हार्मफुल डैमेज नहीं करती। सूरज की रोशनी में ब्लू लाइट की मात्रा स्क्रीन से कहीं ज्यादा होती है। फिर भी हम रोज धूप में निकलते हैं और हमारी आंखें ठीक रहती हैं।
अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थाल्मोलॉजी का स्टैंड
अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थाल्मोलॉजी (AAO) भी कहती है कि ब्लू लाइट ग्लासेस नेसेसरी नहीं हैं और स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट से परमानेंट आई डैमेज का प्रूफ नहीं है। यह सच है कि लॉन्ग टर्म आई डिजीज जैसे कैटरैक्ट या रेटिनल डीजनरेशन का रिस्क स्क्रीन से ब्लू लाइट की वजह से बढ़ता हुआ नहीं दिख रहा है।
AAO का मानना है कि स्क्रीन के लंबे समय तक इस्तेमाल के बाद होने वाली असुविधा ब्लू लाइट की वजह से नहीं, बल्कि स्क्रीन के इस्तेमाल के तरीके की वजह से होती है। जैसे कम पलक झपकना, एक जगह घंटों तक फोकस करना और खराब पोश्चर।
आई स्ट्रेन कम होता है? साइंस कहती है – नहीं!
एक और बड़ा क्लेम किया जाता है कि ब्लू लाइट ग्लासेस से आई स्ट्रेन कम होता है। डिजिटल आई स्ट्रेन में डिस्कंफर्ट, ड्राई आइज, ब्लर्ड विजन और सिरदर्द शामिल हैं। लेकिन यह ब्लू लाइट की वजह से नहीं होता।
रियल कारण क्या हैं? एक जगह घंटों तक फोकस करना, पलक कम झपकना, खराब पोश्चर, स्क्रीन ग्लेयर और ब्राइटनेस इमबैलेंस। अगस्त 2023 में प्रकाशित एक व्यापक कोक्रेन सिस्टमेटिक रिव्यू ने 17 रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल्स का विश्लेषण किया। निष्कर्ष? ब्लू लाइट फिल्टर ग्लासेस पहनने से विजुअल फटीग या आई स्ट्रेन में कोई सिग्निफिकेंट इंप्रूवमेंट नहीं दिखा।
नींद इंप्रूव होती है? मिक्स्ड एविडेंस
अगला बड़ा क्लेम है कि ब्लू लाइट ग्लासेस से नींद बेहतर होती है। यह सच है कि ब्लू लाइट मेलाटोनिन हार्मोन को सप्रेस करके स्लीप-वेक साइकिल को अफेक्ट कर सकती है। लेकिन मोस्ट रिसर्च शोज़ कि ब्लू लाइट ग्लासेस का स्लीप क्वालिटी पर कंसिस्टेंट बेनिफिट जीरो से भी नेगलिजिबल है।
कोक्रेन रिव्यू ने निष्कर्ष निकाला कि यह स्पष्ट नहीं है कि ये लेंस नींद से संबंधित परिणामों को प्रभावित करते हैं या नहीं। कुछ स्टडीज में सुधार दिखा, तो कुछ में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं मिला। सोने से दो-तीन घंटे पहले स्क्रीन बंद करना या डार्क नाइट मोड यूज करना ज्यादा इफेक्टिव है।
बिलियन डॉलर की मार्केटिंग इंडस्ट्री
ब्लू लाइट ग्लासेस की मार्केट बिलियंस ऑफ डॉलर्स की है। एड्स और मार्केटिंग क्लेम्स को बड़ा-बड़ा दिखाते हैं। कंपनियां ब्लू लाइट को कैंसर, मैक्युलर डीजनरेशन और कैटरैक्ट जैसी गंभीर बीमारियों से जोड़ती हैं, जिसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
सच क्या है? कई ग्लासेस केवल ब्लू लाइट का एक छोटा सा हिस्सा ही ब्लॉक करते हैं। साइंटिफिक एविडेंस उनके क्लेम्स को सपोर्ट नहीं करता। ऑप्थाल्मोलॉजिस्ट अक्सर इन्हें मार्केटिंग टैक्टिक्स कहते हैं, मेडिकल सॉल्यूशन नहीं।
क्या ये हार्मफुल हैं?
नहीं। ब्लू लाइट फिल्टर ग्लासेस जनरली सेफ होते हैं। अगर आपको पहनने से कंफर्ट फील होता है, तो कोई हर्ज नहीं है। लेकिन यह सोचना कि यह आई हेल्थ की मेडिकल नेसेसिटी है, वो साइंटिफिकली जस्टिफाइड नहीं है।
अगर आपको साइकोलॉजिकल कंफर्ट मिलता है और आप अफोर्ड कर सकते हैं, तो आप पहन सकते हैं। जस्ट डोंट एक्सपेक्ट मिरेकल्स। ये आपकी आंखों को परमानेंट डैमेज से नहीं बचाएंगे और न ही आई स्ट्रेन का जादुई इलाज हैं।
तो फिर क्या करें? 20-20-20 रूल है असली सॉल्यूशन
अगर ब्लू लाइट ग्लासेस काम नहीं करते, तो आंखों को बचाने का सही तरीका क्या है? यहां कुछ साइंटिफिकली प्रूवन तरीके हैं:
20-20-20 रूल: हर 20 मिनट में 20 फीट दूर किसी चीज को 20 सेकंड तक देखें। यह आंखों को रिलैक्स करने में मदद करता है और फोकल स्ट्रेन कम करता है।
फ्रीक्वेंट ब्लिंकिंग: बिना पलक झपकाए घूरते मत रहिए। ड्राई आइज होती हैं। कॉन्शसली ज्यादा पलक झपकाएं।
प्रॉपर लाइटिंग और स्क्रीन सेटिंग्स: ब्राइटनेस और कंट्रास्ट बैलेंस रखिए। स्क्रीन की चमक कमरे की रोशनी से बहुत ज्यादा या बहुत कम नहीं होनी चाहिए।
स्क्रीन ब्रेक्स और पोश्चर: सही डिस्टेंस और एर्गोनॉमिक सेटअप से स्ट्रेन कम होता है। स्क्रीन आंखों के लेवल से थोड़ा नीचे होनी चाहिए।
सोने से पहले स्क्रीन टाइम कम करें: नींद बेहतर करने के लिए सोने से 2-3 घंटे पहले स्क्रीन बंद कर दें या नाइट मोड यूज करें।
साइंस vs मार्केटिंग: फैसला आपका
ब्लू लाइट फिल्टर ग्लासेस मोस्टली एक मार्केटिंग ट्रेंड हैं, मेडिकल नेसेसिटी नहीं। साइंटिफिक कम्युनिटी का कंसेंसस यही है कि ये आई स्ट्रेन कम करने या नींद बेहतर करने में कोई सिग्निफिकेंट प्रूवन बेनिफिट नहीं देते।
कंपनियां अपने प्रोडक्ट्स बेचने के लिए डर और भ्रम फैलाती हैं। वे ब्लू लाइट को खतरनाक बताती हैं, जबकि साइंस कहती है कि स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट आंखों को परमानेंट नुकसान नहीं पहुंचाती।
मुख्य बातें (Key Points)
- अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थाल्मोलॉजी का कहना है कि ब्लू लाइट ग्लासेस जरूरी नहीं हैं
- स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट से परमानेंट आई डैमेज का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं
- कोक्रेन सिस्टमेटिक रिव्यू में पाया गया कि ब्लू लाइट ग्लासेस से आई स्ट्रेन में कोई सुधार नहीं
- नींद की क्वालिटी पर इनका प्रभाव मिक्स्ड और नेगलिजिबल है
- 20-20-20 रूल, फ्रीक्वेंट ब्लिंकिंग और स्क्रीन ब्रेक्स ज्यादा इफेक्टिव हैं
- ब्लू लाइट ग्लासेस मोस्टली मार्केटिंग ट्रेंड हैं, मेडिकल नेसेसिटी नहीं








