Bangladesh Crisis : 2024 में बांग्लादेश एक बार फिर अस्थिरता के ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां लिया गया हर फैसला पूरे देश और पूरे क्षेत्र की दिशा तय करेगा। अगस्त 2024 में सत्ता परिवर्तन के बाद ढाका से लेकर नई दिल्ली तक राजनीतिक और रणनीतिक हलचल तेज हो गई है।

15 साल की स्थिरता टूटी, संतुलन बिगड़ा
पिछले डेढ़ दशक से बांग्लादेश की राजनीति एक ही धुरी पर घूम रही थी—आवामी लीग की सत्ता और शेख हसीना का नेतृत्व। यही स्थिरता भारत के लिए भी राहत थी, क्योंकि इससे भारत की पूर्वी सीमा और क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूती मिली। लेकिन 2024 में यह पूरी व्यवस्था अचानक ढह गई और देश एक संवैधानिक व राजनीतिक शून्य में चला गया।
इंटरिम सरकार और बढ़ता विवाद
सत्ता परिवर्तन के बाद नोबेल पुरस्कार विजेता Muhammad Yunus के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। लेकिन सहमति और समावेश के रास्ते पर चलने के बजाय, इस व्यवस्था ने बड़ा और विवादित फैसला लिया—आवामी लीग पर राजनीतिक गतिविधियों का प्रतिबंध और फरवरी 2026 के चुनाव में उसकी गैर-भागीदारी। इस कदम ने समाज और राजनीति में ध्रुवीकरण को और गहरा कर दिया।

सड़कों की ताकत और कमजोर संस्थाएं
बांग्लादेश में संस्थाएं ऐतिहासिक रूप से कमजोर रही हैं और सड़क पर उतरी भीड़ की भूमिका हमेशा निर्णायक रही है। सत्ता परिवर्तन के बाद प्रदर्शन, विरोध और विचारधारात्मक टकराव तेज हो गए हैं। ऐसे माहौल में चुनावों की विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
माइनॉरिटीज पर बढ़ता दबाव
सिस्टम कमजोर होते ही सबसे पहले असर कमजोर समुदायों पर पड़ता है। 2024 के बाद से हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले, संपत्ति को नुकसान और डराने-धमकाने की घटनाओं की रिपोर्ट सामने आई हैं। भारत के लिए यह सिर्फ मानवीय चिंता नहीं, बल्कि सीधा रणनीतिक और कूटनीतिक दबाव भी है।
पुराने खिलाड़ी, नई सक्रियता
राजनीतिक खालीपन में पुराने और नए खिलाड़ी फिर से उभर आए हैं।
Bangladesh Nationalist Party (BNP) की वापसी ने विपक्ष को नई ऊर्जा दी है। 17 साल के निर्वासन के बाद खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान की सक्रियता को कई लोग ‘डेमोक्रेटिक चॉइस’ की वापसी मान रहे हैं, तो कुछ इसे अतीत की अस्थिरता की याद के तौर पर देख रहे हैं।
जमात-ए-इस्लामी और वैचारिक शिफ्ट
शेख हसीना के दौर में प्रतिबंधित रही Jamaat-e-Islami की राजनीति में वापसी को सिर्फ चुनावी गणित नहीं माना जा रहा। शरिया आधारित शासन की खुली पैरवी इसे एक गंभीर वैचारिक बदलाव का संकेत बनाती है, जिसका असर लंबे समय तक दिख सकता है।

नई पार्टियां, नई पहचान
छात्र आंदोलनों से निकली नेशनल सिटिजन पार्टी और हाल ही में बनी बांग्लादेश माइनॉरिटी जनता पार्टी जैसे प्रयोग यह दिखाते हैं कि देश की राजनीति सिर्फ सत्ता हस्तांतरण नहीं, बल्कि नई राजनीतिक पहचानों और वोट बैंक के समीकरणों की परीक्षा से गुजर रही है।
भारत की चिंता क्यों गहरी है
भारत और बांग्लादेश के बीच 4000 किलोमीटर से ज्यादा लंबी सीमा है और 50 से अधिक नदियां दोनों देशों को जोड़ती हैं। बांग्लादेश भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ का अहम आधार है और उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए सबसे आसान ट्रांजिट मार्ग भी।
2001 से 2006 के BNP-जमात दौर को भारत आज भी एक रेड फ्लैग के तौर पर देखता है, जब बांग्लादेशी जमीन का इस्तेमाल भारत-विरोधी उग्रवादी संगठनों के लिए हुआ था। 2004 का चिटागोंग आर्म्स हॉल इसी चिंता की सबसे ठोस मिसाल माना जाता है।
आर्थिक और कूटनीतिक दांव
आने वाली सरकार के सामने गारमेंट-आधारित निर्यात अर्थव्यवस्था को संभालना और निवेशकों का भरोसा लौटाना बड़ी चुनौती होगी। साथ ही, भारत और चीन के बीच संतुलन साधना भी आसान नहीं होगा। इन फैसलों का असर न्यायपालिका की स्वतंत्रता, प्रेस की आज़ादी और भ्रष्टाचार विरोधी सुधारों पर भी पड़ेगा।
भारत के आम नागरिक पर असर
अगर बांग्लादेश अस्थिर रहता है, तो भारत को माइग्रेशन प्रेशर, सीमा तनाव और सुरक्षा जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, एक स्थिर और आत्मविश्वासी बांग्लादेश भारत की सुरक्षा को मजबूत करता है और व्यापारिक संभावनाओं को बढ़ाता है।

जानें पूरा मामला
बांग्लादेश तीन ओर से लगभग भारत से घिरा है और उत्तर-पूर्व भारत को बंगाल की खाड़ी से जोड़ने वाला भौगोलिक सेतु है। यही वजह है कि यहां की राजनीति में हर उतार-चढ़ाव भारत की सुरक्षा, स्थिरता और क्षेत्रीय संतुलन को सीधे प्रभावित करता है।
मुख्य बातें (Key Points)
- 2024 में शेख हसीना का पतन बांग्लादेश की 15 साल की राजनीतिक स्थिरता का अंत है।
- अंतरिम सरकार के फैसलों ने ध्रुवीकरण और अनिश्चितता बढ़ाई।
- माइनॉरिटीज पर बढ़ता दबाव भारत के लिए रणनीतिक चिंता है।
- BNP और जमात की वापसी से भारत की सुरक्षा आशंकाएं फिर उभरीं।
- आने वाले चुनाव बांग्लादेश ही नहीं, भारत के ईस्टर्न फ्रंटियर का भविष्य तय करेंगे।








