Antimicrobial Resistance गोरखपुर से एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आई है जो पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए चेतावनी की घंटी है। एम्स और बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर में चल रहे Anti Microbial Resistance (AMR) अध्ययन के परिणाम दिखा रहे हैं कि 70 से 90 प्रतिशत मरीजों में सामान्य एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोध विकसित हो चुका है। यह स्थिति न केवल इलाज की लागत बढ़ा रही है बल्कि मरीजों की जान के लिए भी खतरा बन रही है।
गंभीर आंकड़े सामने आए
गोरखपुर के दोनों प्रमुख चिकित्सा संस्थानों में एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस पर चल रहा यह अध्ययन एक गहरी समस्या को उजागर करता है। अस्पतालों के विभिन्न विभागों – OPD, ICU और वार्डों में भर्ती मरीजों के नमूनों की जांच के बाद पाया गया कि अधिकांश मरीजों में पारंपरिक एंटीबायोटिक्स बेअसर हो चुकी हैं।
यह स्थिति इतनी गंभीर है कि जो दवाएं पहले 100 से 500 रुपए में असरदार होती थीं, अब वही दवाएं पूरी तरह बेकार हो चुकी हैं। डॉक्टरों को मजबूरी में 5000 से 10,000 रुपए तक के महंगे इंजेक्शन का सहारा लेना पड़ रहा है।
कैसे बनी यह गंभीर स्थिति?
विशेषज्ञों के अनुसार, यह समस्या एंटीबायोटिक दवाओं के अंधाधुंध और गलत तरीके से इस्तेमाल की वजह से पैदा हुई है। लोगों ने बिना डॉक्टर की सलाह के दवाएं लीं, पूरा कोर्स नहीं किया और छोटी-छोटी बीमारियों में भी तेज दवाओं का उपयोग किया। इसके परिणामस्वरूप बैक्टीरिया ने खुद को इतना मजबूत बना लिया है कि अब सामान्य दवाएं कोई असर नहीं कर रहीं।
कौन सी दवाएं हो गई हैं बेअसर?
अध्ययन में सामने आया है कि फ्लोरोक्विनोलिन, पेनिसिलिन, सेफालोस्पोरिन, कार्बपेनम और मैक्रोलाइड्स जैसी आम दवाओं के प्रति प्रतिरोध विकसित हो चुका है। कई मामलों में तो कार्बपेनम जैसी मजबूत दवाएं भी बेअसर हो रही हैं।
इसके बाद डॉक्टरों को कोलिस्टिन, लाइनज़ोलिड और टाइगेसाइक्लिन जैसी बेहद महंगी दवाओं का सहारा लेना पड़ता है, जिनकी एक दिन की खुराक ही हजारों रुपए में पड़ती है। यह न केवल मरीजों की जेब पर भारी पड़ता है बल्कि इलाज की सफलता की संभावनाएं भी कम कर देता है।
राष्ट्रीय अध्ययन का हिस्सा
यह महत्वपूर्ण अध्ययन Indian Council of Medical Research (ICMR) के प्रोजेक्ट के तहत देश के 40 बड़े चिकित्सा संस्थानों में चल रहा है। इस व्यापक अध्ययन की शुरुआत अप्रैल 2025 में हुई थी और यह तीन साल तक चलेगा ताकि पूरे देश के आंकड़ों के आधार पर एक मजबूत राष्ट्रीय नीति तैयार की जा सके।
गोरखपुर में केवल एक साल के अंदर ही बीआरडी मेडिकल कॉलेज में 2300 और एम्स में करीब 3000 मरीजों की जांच की गई है। इन जांचों में खून, पेशाब और पस जैसे नमूनों का विस्तृत अध्ययन शामिल था।
विशेषज्ञों की राय
एम्स के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के प्रभारी डॉ. अतुल आर के अनुसार, कई प्रकार के जीवाणुओं में आम एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोध विकसित हो चुका है, जो अत्यंत चिंता की बात है।
बीआरडी कॉलेज के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. अमरीश सिंह ने स्पष्ट किया है कि लोगों का अपनी मर्जी से दवा लेना, पूरा कोर्स न करना और अनावश्यक दवाओं का उपयोग करना ही इस स्थिति की सबसे बड़ी वजह है। इसका सीधा असर मरीजों पर पड़ रहा है क्योंकि अब बीमारी भी बढ़ रही है और इलाज का खर्च भी कई गुना हो गया है।
समाधान की दिशा में प्रयास
इस गंभीर खतरे से निपटने के लिए एम्स और बीआरडी मेडिकल कॉलेज में एंटी माइक्रोबियल स्टीवर्डशिप कमिटी का गठन किया गया है। यह कमिटी सुनिश्चित करने के लिए काम करती है कि मरीजों को सही समय पर, सही दवा, सही मात्रा में और तय अवधि तक दी जाए।
साथ ही अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण व्यवस्था भी मजबूत की जा रही है। इन उपायों का मुख्य उद्देश्य यह है कि एंटीबायोटिक्स का सही और समझदारी से इस्तेमाल हो।
आम जनता पर प्रभाव
यह रिपोर्ट आम लोगों के लिए एक गंभीर चेतावनी है। AMR के कारण healthcare expenditure में बढ़ोतरी होने से सामान्य परिवारों की आर्थिक स्थिति पर गहरा असर पड़ता है। एक साधारण इन्फेक्शन का इलाज भी अब हजारों रुपए में पड़ने लगा है।
भविष्य की चुनौती
विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2050 तक AMR के कारण वैश्विक स्तर पर सालाना 10 मिलियन मौतें हो सकती हैं। भारत में स्थिति और भी गंभीर है क्योंकि India ranks first among all countries of the world in total consumption of antibiotics for human use।
मुख्य बातें (Key Points)
• गोरखपुर के एम्स और बीआरडी में 70-90% मरीजों में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस विकसित
• सामान्य दवाओं की जगह 5000-10,000 रुपए के महंगे इंजेक्शन की जरूरत
• ICMR के राष्ट्रीय प्रोजेक्ट के तहत 3 साल तक चलेगा अध्ययन
• एंटीबायोटिक का गलत इस्तेमाल मुख्य कारण, जागरूकता की जरूरत








