Greenland US Plan : वेनेजुएला के बाद अब अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump की निगाह ग्रीनलैंड पर टिकी है। ताजा घटनाक्रम में वॉशिंगटन में इस बात पर आंतरिक चर्चा चल रही है कि ग्रीनलैंड के लोगों को डेनमार्क से अलग होकर अमेरिका के करीब आने के लिए प्रति व्यक्ति भारी रकम की पेशकश की जाए। यह बातचीत शुरुआती स्तर पर है, लेकिन इसके सामने आते ही यूरोप से लेकर उत्तरी अमेरिका तक राजनीतिक हलचल तेज हो गई है।
क्या है ट्रंप प्रशासन की योजना
सूत्रों के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ग्रीनलैंड के निवासियों को प्रति व्यक्ति एकमुश्त बड़ी राशि देने के विकल्प पर विचार कर रहा है। यह रकम डॉलर में तय करने की बात चल रही है, जिसे भारतीय मुद्रा में देखा जाए तो यह प्रति व्यक्ति करीब 90 लाख रुपये तक हो सकती है। हालांकि यह पैसा कब और किस प्रक्रिया से दिया जाएगा, इस पर अभी कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है।
कब और क्यों उठा ग्रीनलैंड का मुद्दा
ग्रीनलैंड को लेकर यह चर्चा हाल के दिनों में तेज हुई है। दरअसल, यह पहली बार नहीं है जब Donald Trump ने ग्रीनलैंड को लेकर रुचि दिखाई हो। पहले भी ग्रीनलैंड को “खरीदने” का विचार सामने आ चुका है, लेकिन इस बार इसे लेकर प्रशासनिक स्तर पर ज्यादा गंभीर बातचीत हो रही है।
अमेरिकी सरकार का आधिकारिक रुख
अमेरिका के विदेश मंत्री Marco Rubio ने सांसदों से कहा है कि ट्रंप ग्रीनलैंड पर जबरन कब्जा नहीं करना चाहते, बल्कि इसे खरीदने के विकल्प पर विचार कर रहे हैं। वहीं व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव Karoline Leavitt ने भी पुष्टि की है कि राष्ट्रीय सुरक्षा टीम संभावित खरीद के स्वरूप पर चर्चा कर रही है।
ग्रीनलैंड आखिर इतना अहम क्यों
ग्रीनलैंड यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बीच स्थित दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है। यह क्षेत्रफल में लगभग 21 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। फिलहाल यह Denmark का अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र है, जिसकी आबादी करीब 57 हजार है। यहां प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं, जो इसे वैश्विक ताकतों के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम बनाते हैं।

यूरोप का कड़ा विरोध
ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका के हालिया बयानों पर यूरोपीय देशों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। फ्रांस, पोलैंड, इटली, जर्मनी, ब्रिटेन, स्पेन और डेनमार्क ने संयुक्त बयान जारी कर साफ कहा कि ग्रीनलैंड के भविष्य पर फैसला केवल ग्रीनलैंड और डेनमार्क का अधिकार है। अमेरिकी हस्तक्षेप को उन्होंने अस्वीकार्य बताया।
ग्रीनलैंड सरकार का जवाब
ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री James Frederik Nielsen ने भी इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि अब बहुत हो गया और विलय को लेकर कोई कल्पना नहीं चलेगी। यह बयान ग्रीनलैंड में बढ़ते असंतोष को दर्शाता है।
आम लोगों पर क्या असर
अगर यह योजना आगे बढ़ती है, तो ग्रीनलैंड के नागरिकों के सामने एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक सवाल खड़ा होगा—पहचान, संप्रभुता और आर्थिक लालच के बीच चुनाव का। वहीं डेनमार्क और यूरोप के लिए यह मामला सीधे क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़ जाता है।
विश्लेषण (Analysis)
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप प्रशासन की यह रणनीति सिर्फ भू-राजनीति नहीं, बल्कि आर्थिक कूटनीति का भी उदाहरण है। प्रति व्यक्ति भुगतान का विचार बताता है कि अमेरिका इस द्वीप को रणनीतिक संसाधन और सैन्य स्थिति के नजरिये से देख रहा है। लेकिन यूरोपीय देशों का एकजुट विरोध और ग्रीनलैंड सरकार की सख्ती यह संकेत देती है कि यह राह अमेरिका के लिए आसान नहीं होगी।
क्या है पृष्ठभूमि
ग्रीनलैंड लंबे समय से वैश्विक शक्तियों के रडार पर रहा है। शीत युद्ध से लेकर मौजूदा दौर तक, इसकी भौगोलिक स्थिति और संसाधन इसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अहम मोहरा बनाते रहे हैं।
मुख्य बातें (Key Points)
- डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ग्रीनलैंडवासियों को प्रति व्यक्ति बड़ी रकम देने पर विचार कर रहा है।
- मकसद डेनमार्क से अलग कर अमेरिका के करीब लाना बताया जा रहा है।
- यूरोपीय देशों और डेनमार्क ने इस कदम का कड़ा विरोध किया।
- ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री ने विलय की किसी भी संभावना को खारिज किया।








