Allahabad High Court Live In : उत्तर प्रदेश में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम और व्यापक असर डालने वाला फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि पश्चिमी विचारों और लिव-इन रिलेशनशिप की अवधारणा के प्रभाव में युवाओं में विवाह के बिना साथ रहने की प्रवृत्ति बढ़ रही है और जब ऐसे रिश्ते टूटते हैं, तो बड़ी संख्या में एफआईआर दर्ज कराई जाती हैं। अदालत ने इस सामाजिक बदलाव के कानूनी दुष्परिणामों पर गंभीर चिंता जताई है।
यह टिप्पणी जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस प्रशांत मिश्र प्रथम की खंडपीठ ने एक आपराधिक अपील पर सुनवाई के दौरान की। इस मामले में विशेष न्यायाधीश पॉक्सो एक्ट, महाराजगंज द्वारा चंद्रेश को दी गई उम्रकैद समेत दोषसिद्धि को हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया।
लिव-इन और कानून के टकराव पर टिप्पणी
खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि वर्तमान कानून मुख्य रूप से महिलाओं के संरक्षण के लिए बनाए गए थे, लेकिन जब लिव-इन रिलेशनशिप जैसे नए सामाजिक ढांचे सामने आते हैं, तो उन्हीं पुराने कानूनों के आधार पर पुरुषों को दोषी ठहरा दिया जाता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब ये कानून बनाए गए थे, तब लिव-इन रिलेशनशिप की अवधारणा समाज में मौजूद ही नहीं थी।
क्या था पूरा मामला
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि अपीलार्थी चंद्रेश शिकायतकर्ता की नाबालिग बेटी को शादी का झांसा देकर बहला-फुसलाकर पहले गोरखपुर और फिर बेंगलुरु ले गया, जहां उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। इस आधार पर उसे आईपीसी की धारा 363 (अपहरण), 366 (विवाह के लिए अपहरण), 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), पॉक्सो एक्ट की धारा 6 (गंभीर प्रवेशी यौन हमला) और एससी/एसटी अधिनियम की धारा 3(2)(5) के तहत दोषी ठहराया गया था और उम्रकैद की सजा दी गई थी।
उम्र और सबूतों पर अदालत की अहम टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़िता की उम्र को लेकर ट्रायल कोर्ट ने अस्थि परीक्षण रिपोर्ट पर सही तरीके से विचार नहीं किया। इस रिपोर्ट से पीड़िता की उम्र लगभग 20 वर्ष सिद्ध होती थी। इसके अलावा अभियोजन द्वारा प्रस्तुत विद्यालयी रिकॉर्ड किशोर न्याय नियमों के अनुसार वैध दस्तावेज के रूप में स्वीकार योग्य नहीं पाए गए।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि एफआईआर में मां ने पीड़िता की उम्र 18 वर्ष 6 माह बताई थी, जबकि अन्य बयानों में उम्र को लेकर विसंगतियां सामने आईं।
पीड़िता के आचरण पर भी विचार
खंडपीठ ने पीड़िता के आचरण को भी महत्वपूर्ण माना। अपने बयान में उसने स्वीकार किया था कि वह स्वेच्छा से घर छोड़कर अपीलार्थी के साथ पहले गोरखपुर और फिर बेंगलुरु गई थी। उसने सरकारी बस और ट्रेन से यात्रा की, लेकिन किसी भी स्तर पर आपत्ति नहीं जताई। वह छह महीने तक बेंगलुरु में अपीलार्थी के साथ रही और दोनों के बीच सहमति से शारीरिक संबंध बने। उसने परिवार से संपर्क तभी किया, जब अपीलार्थी उसे शिकारपुर क्रॉसिंग पर छोड़कर चला गया।
क्यों रद्द हुई दोषसिद्धि और सजा
हाईकोर्ट ने माना कि आईपीसी की धारा 363 और 366 के तहत दोषसिद्धि कानून के अनुरूप नहीं थी, क्योंकि पीड़िता अपनी मर्जी से गई थी। पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत दोषसिद्धि भी अनुचित मानी गई, क्योंकि पीड़िता बालिग पाई गई। इसी तरह आईपीसी की धारा 376 और 323 के तहत सजा को भी गलत ठहराया गया। इन सभी आधारों पर हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को रद्द करते हुए अपील स्वीकार कर ली।
यह फैसला समाज के उस बड़े वर्ग को प्रभावित करता है, जहां लिव-इन रिलेशनशिप टूटने के बाद आपराधिक मुकदमों का सहारा लिया जाता है। अदालत की यह टिप्पणी कानून, समाज और युवाओं के बदलते संबंधों के बीच संतुलन की जरूरत को रेखांकित करती है।
Background / Context
हाईकोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि लिव-इन रिलेशनशिप के बढ़ते मामलों के साथ आपराधिक कानूनों के दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने पहले भी माना है कि ऐसे मामलों में बिना समुचित जांच के दर्ज एफआईआर और दोषसिद्धियां न्याय के मूल सिद्धांतों को प्रभावित कर सकती हैं।
मुख्य बातें (Key Points)
- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप पर महत्वपूर्ण सामाजिक और कानूनी टिप्पणी की
- लिव-इन टूटने के बाद एफआईआर दर्ज करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताई
- पॉक्सो एक्ट और आईपीसी की धाराओं में दी गई उम्रकैद की सजा रद्द
- पीड़िता की उम्र, सहमति और आचरण को फैसले का अहम आधार माना गया








