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200 साल बाद 19 वर्षीय छात्र ने तोड़ा Record, किया Dandakram Parayan

डिजिटल युग में याददाश्त की मिसाल, देवव्रत ने 2000 कठिन मंत्रों को कंठस्थ कर रचा इतिहास, शंकराचार्य ने किया सम्मानित।

The News Air Team by The News Air Team
शनिवार, 13 दिसम्बर 2025
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Dandakram Parayan
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Devvrat Mahesh Rekhe Dandakram Parayan: आज के Digital दौर में जब हम अपनों का मोबाइल नंबर और घर का पता तक याद नहीं रख पाते, वहां 19 साल के एक लड़के ने याददाश्त का ऐसा चमत्कार दिखाया है कि दुनिया दंग रह गई है। महाराष्ट्र के देवव्रत ने पिछले 200 सालों का सूखा खत्म करते हुए वेदों के सबसे कठिन पाठ को पूरा कर एक नया इतिहास रच दिया है।

जिस उम्र में युवा Social Media और Reels की दुनिया में खोए रहते हैं, उस उम्र में देवव्रत महेश रेखे ने यजुर्वेद के 2000 श्लोकों को न सिर्फ कंठस्थ किया, बल्कि उन्हें एक बेहद जटिल विधि से सुनाकर सबको चौंका दिया। यह कहानी सिर्फ याददाश्त की नहीं, बल्कि उस भारतीय परंपरा की है जो AI और Computer को भी चुनौती देती है।

‘कौन हैं देवव्रत महेश रेखे?’

देवव्रत मूल रूप से महाराष्ट्र के अहिल्या नगर के रहने वाले हैं। वे एक प्रतिष्ठित वैदिक परिवार से आते हैं। उनके पिता वेद ब्रह्म श्री महेश चंद्रकांत रेखे खुद एक जाने-माने विद्वान हैं और उन्होंने ही देवव्रत को इस कठिन राह पर चलने के लिए तैयार किया है।

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वर्तमान में देवव्रत वाराणसी (काशी) के रामघाट स्थित वल्लभ राम शालिग्राम सांगवेद विद्यालय में पढ़ाई कर रहे हैं। महज 19 साल की उम्र में उन्होंने वह समर्पण दिखाया है जो बड़े-बड़े तपस्वी भी नहीं दिखा पाते। उन्होंने वेदों का ‘दंडक्रम पारायण’ (Dandakram Parayan) पूरा किया है, जिसे वैदिक पाठ का ‘मुकुट’ माना जाता है।

‘क्या है दंडक्रम पारायण?’

दंडक्रम पारायण वेदों को पढ़ने की सबसे जटिल विधियों में से एक है। ‘दंड’ का अर्थ है अनुशासन और ‘क्रम’ का अर्थ है क्रिया। यानी वैदिक कर्मों का अनुशासनबद्ध पाठ। इसमें मंत्रों को सीधा-सीधा नहीं पढ़ा जाता, बल्कि उन्हें एक विशेष गणितीय क्रम में आगे-पीछे करके (जैसे चोटी गूंथी जाती है) पढ़ा जाता है।

इस विधि का विकास ऋषियों ने इसलिए किया था ताकि वेदों के मूल स्वरूप में कोई बदलाव न आए और उच्चारण में कोई भी दोष (जैसे ‘बवाल’ शब्द का प्रचलन में आना) न आ सके। इसमें मंत्रों को बिना किसी किताब को देखे, पूरी शुद्धता और लय के साथ बोलना होता है। इस प्रक्रिया में 2000 मंत्रों का पाठ करते समय उनका लगभग 2 लाख बार दोहराव हो जाता है।

‘200 साल बाद हुआ ऐसा चमत्कार’

देवव्रत की यह उपलब्धि इसलिए ऐतिहासिक है क्योंकि पिछले 200 सालों में किसी ने भी दंडक्रम पारायण के इस कठिन स्वरूप को पूरा नहीं किया था। इससे लगभग दो सदी पहले नासिक के वेदमूर्ति नारायण शास्त्री देव ने यह कारनामा किया था, जिन्हें इसे पूरा करने में 100 दिन लगे थे।

लेकिन देवव्रत ने यह काम उनसे ठीक आधे समय यानी मात्र 50 दिनों में कर दिखाया। उन्होंने 2 अक्टूबर से 30 नवंबर 2025 तक लगातार बिना रुके यह अनुष्ठान किया। इस दौरान उन्होंने रोज सुबह 3 से 4 घंटे मंत्रों का पाठ किया।

‘डेढ़ साल में पूरी की 5 साल की पढ़ाई’

आमतौर पर दंडक्रम को सीखने और उसका अभ्यास करने में 5 से 7 साल का समय लगता है, लेकिन देवव्रत ने अपनी कड़ी मेहनत से इसे सिर्फ डेढ़ साल में पूरा कर लिया। इसके लिए उन्होंने 17 साल की उम्र से ही तैयारी शुरू कर दी थी और रोज 15 से 18 घंटे तक पढ़ाई (तपस्या) की।

इस ऐतिहासिक उपलब्धि के बाद 30 नवंबर को पूर्णाहुति पर उन्हें श्रृंगेरी के शंकराचार्य ने सम्मान स्वरूप सोने का कंगन और 11,116 रुपये भेंट किए। अब उन्हें ‘वेदमूर्ति’ की उपाधि से पहचाना जा रहा है।

‘AI को इंसान की चुनौती’

आज जब हम अपनी सारी याददाश्त Mobile और Google के भरोसे छोड़ चुके हैं, ऐसे में देवव्रत ने साबित किया है कि इंसानी दिमाग की क्षमता किसी भी मशीन से कहीं ज्यादा है। यह उपलब्धि बताती है कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल रटने की नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक विधि है जो मानसिक शक्ति का विस्तार करती है।

जानें पूरा मामला 

भारत में वेदों को ‘श्रुति’ और ‘स्मृति’ के माध्यम से ही संरक्षित रखा गया है। तक्षशिला और नालंदा जैसी जगहों पर किताबें जलने के बाद भी यह ज्ञान इसलिए बचा रहा क्योंकि यह लोगों को ‘याद’ था। ‘दंडक्रम’ जैसी विधियां इसी उद्देश्य से बनाई गई थीं कि मंत्रों में एक शब्द या मात्रा की भी मिलावट न हो सके। देवव्रत ने उसी लुप्त होती परंपरा को पुनर्जीवित किया है।

मुख्य बातें (Key Points)
  • 19 वर्षीय देवव्रत ने 200 साल बाद ‘दंडक्रम पारायण’ पूरा कर इतिहास रचा।

  • यजुर्वेद के 2000 मंत्रों को बिना देखे जटिल गणितीय विधि से सुनाया।

  • 50 दिनों तक चला अनुष्ठान, रोज 15-18 घंटे की कड़ी तपस्या की।

  • श्रृंगेरी शंकराचार्य ने सोने का कंगन और ‘वेदमूर्ति’ की उपाधि देकर सम्मानित किया।

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