Amazon Forest Carbon Source: दक्षिण अमेरिका के अमेज़न वर्षावन, जिन्हें अब तक धरती के फेफड़े कहा जाता रहा है, अब कार्बन डाइऑक्साइड सोखने से ज्यादा उसे हवा में छोड़ने लगे हैं। करीब 15 साल के आंकड़ों में, भारी बारिश वाले दो साल छोड़ दें तो, इन जंगलों ने जितना कार्बन सोखा उससे कहीं ज्यादा छोड़ा है। हर साल लगभग 1.3 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड अमेज़न से हवा में जा रही है।
इसकी तात्कालिक वजह सुपर अल नीनो से पड़ा सूखा बताई गई है, जिसके बाद जंगलों में भारी आग लगी। इसके साथ बड़े पैमाने पर कटाई, पेड़ों की बढ़ती मौत और बदलती जलवायु भी इस संकट को गहरा कर रही हैं।
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कार्बन सिंक से कार्बन सोर्स: उल्टी हो गई कहानी
पहले समझ लें कि अमेज़न को इतना खास क्यों माना जाता है। यह प्राकृतिक रूप से कार्बन सिंक है, यानी ऐसा हिस्सा जो वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड सोख लेता है। यहां इतने घने पेड़ हैं कि जमीन तक सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती। इसे ट्रॉपिकल बायोम या रेनफॉरेस्ट बायोम कहा जाता है।
इस जंगल की कैनोपी चार परतों की है और वनस्पति इतनी ज्यादा है कि यह भारी मात्रा में कार्बन सोखता रहा है। पर अब यही प्रक्रिया उल्टी चल पड़ी है। जो जंगल कार्बन सोखता था, वही उसे उगलने लगा है।
| पहलू | आंकड़ा |
|---|---|
| अमेज़न से हर साल निकल रही CO2 | लगभग 1.3 अरब टन |
| अध्ययन में इस्तेमाल हुआ डेटा | करीब 15 साल |
| कुछ इलाकों में बारिश की कमी | 95% तक |
| अक्टूबर में आग की घटनाओं में बढ़त | 62% |
| जनवरी से अगस्त में जला इलाका | करीब 40 लाख एकड़ |
| स्थायी रूप से काटा जा चुका हिस्सा | करीब 20% |
सुपर अल नीनो और आग: तात्कालिक वजह
सुपर अल नीनो का मतलब है बारिश के पैटर्न का उलट जाना या औसत से कम बारिश होना। इसका नतीजा यह हुआ कि जंगल का बड़ा हिस्सा सूखने लगा। अमेज़न के कई इलाकों में तो 95% तक कम बारिश हुई।
सूखे जंगल की लकड़ियां आसानी से आग पकड़ लेती हैं। साथ ही ऐसे इलाकों पर कब्जा करना भी आसान हो जाता है, जिससे नुकसान स्थायी बन जाता है। जब पेड़ जलते हैं तो उनके अंदर जमा कार्बन डाइऑक्साइड फिर हवा में लौट आती है।
अक्टूबर में आग की घटनाओं में 62% तक की बढ़त दर्ज की गई। जनवरी से अगस्त के बीच करीब 40 लाख एकड़ इलाका जल चुका है।
मनौस शहर में हेल्थ इमरजेंसी
इस आग का असर सिर्फ जंगल तक नहीं रुका। अमेज़न के पास बसे मशहूर शहर मनौस में जंगल की आग का धुआं इतना घुस आया कि हेल्थ इमरजेंसी लगानी पड़ी। कई जगह स्कूल, कॉलेज और दफ्तर बंद कर दिए गए।
यह चिंता का विषय इसलिए है कि जंगल की आग अब इंसानी जिंदगी की रोजमर्रा की रफ्तार रोकने लगी है।
कटाई और अवैध खनन: 20% हिस्सा हमेशा के लिए गायब
सिर्फ आग ही कारण नहीं है। अमेज़न का करीब 20% हिस्सा लगभग स्थायी रूप से काटा जा चुका है। काटी गई लकड़ियां कहीं न कहीं सड़ती हैं या जलाई जाती हैं, और इस तरह उनका जमा किया हुआ कार्बन बाहर निकल जाता है।
जमीन साफ करने के पीछे अक्सर दो मकसद हैं। एक अवैध सोने की खनन, जिसमें पारे का इस्तेमाल होता है और वह नदी में छोड़ दिया जाता है। उस जहरीले पानी में मछलियां मर जाती हैं, जानवरों की जान जाती है और वहां रहने वाले जनजातीय लोगों की सेहत बिगड़ती है। दूसरा मकसद खेती या पशुपालन है, जिसके लिए पेड़ काटे जाते हैं।
गर्मी से मरते पेड़ और सवाना बनता जंगल
तीसरी वजह वैज्ञानिक है और ज्यादा गहरी भी। तापमान बढ़ने से पेड़ों की मृत्यु दर बढ़ रही है। ज्यादा गर्मी में वाष्पीकरण तेज होता है और पत्तियों के क्लोरोफिल की क्षमता सीमित होने लगती है। बेहद ऊंचे तापमान पर क्लोरोफिल धीरे-धीरे नष्ट हो जाता है।
इससे प्रकाश संश्लेषण बाधित होता है और पेड़ कम समय में ही सूखकर मर जाते हैं। जो कार्बन वह लंबे समय तक अपने अंदर रखता, वह अब गायब हो जाता है।
एक और बदलाव धीरे-धीरे हो रहा है। जहां आज अमेज़न है, वहां कभी घास का मैदान था। बारिश का पैटर्न बदलने से यह वर्षावन धीरे-धीरे सवाना जैसी जलवायु की ओर बढ़ रहा है। घने पेड़ कम होंगे, वे सड़ेंगे और कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकलेगी। आकलन है कि कुछ दशक बाद यह इलाका पूरी तरह घास के मैदान में बदल सकता है।
ओजोन परत पर असर का दावा, पर आंकड़ों में भारी फर्क
एक और चिंता यह जताई गई है कि जंगल की आग से निकली कार्बन डाइऑक्साइड काफी ऊंचाई तक जाकर ओजोन परत के एक हिस्से को भी प्रभावित कर रही है। पर यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इससे जुड़े आंकड़ों में काफी विविधता है और कई जगह उन पर भरोसा करना मुश्किल है। इसलिए इसे पक्की जानकारी की जगह चिंता के तौर पर देखना बेहतर होगा।
उम्मीद की किरण: कोलंबिया का बड़ा फैसला
इस सबके बीच एक राहत की बात भी है। कोलंबिया के बड़े इलाके में अमेज़न के जंगल आते हैं। इस देश ने वहां किसी भी तरह की वनों की कटाई, खनन और ड्रिलिंग पर पूरी तरह रोक लगा दी है।
इसका मतलब है कि मौजूदा जंगल बचेंगे और आने वाले समय में इस इलाके में आग जैसी घटनाएं कम हो सकती हैं। किसी देश की तरफ से संरक्षण की यह सबसे बड़ी पहलों में से एक मानी गई है।
टिपिंग पॉइंट और आपके मानसून का रिश्ता
देखा जाए तो असली डर टिपिंग पॉइंट का है। यह वह मोड़ है जिसके आगे हुए बदलाव वापस नहीं लौटाए जा सकते। अगर अमेज़न इस मोड़ तक पहुंचा तो इसका असर आपके घर की नदी और आपके आंगन के पौधों तक पहुंच सकता है।
वजह समझने वाली है। आकलन है कि हमारे मानसून में आने वाली जलवाष्प का एक बड़ा हिस्सा अमेज़न के जंगलों से ही जुड़ता है। दुनिया में कहीं भी बारिश हो, उसके पीछे एक बड़ा कारण अमेज़न के वर्षावन से निकली जलवाष्प मानी गई है। अगर यह जलवाष्प न रहे, तो पूरी धरती का बारिश का पैटर्न बदल जाएगा।
आम आदमी के लिए इसका मतलब सीधा है। मानसून पर खेती और पानी निर्भर हैं, इसलिए हजारों किलोमीटर दूर के जंगल का हाल भी हमारी थाली और नल तक पहुंच सकता है।
क्या है पृष्ठभूमि
अमेज़न दक्षिण अमेरिका का घना वर्षावन है, जो प्राकृतिक रूप से कार्बन सिंक रहा है। सुपर अल नीनो से बारिश घटने के बाद वहां भीषण आग लगी। इसके साथ करीब 20% हिस्से की स्थायी कटाई, पेड़ों की बढ़ती मौत और जलवायु बदलाव भी जुड़े। मनौस में धुएं की वजह से हेल्थ इमरजेंसी लगी, जबकि कोलंबिया ने अपने हिस्से में कटाई, खनन और ड्रिलिंग पर पूरी रोक लगा दी।
मुख्य बातें (Key Points)
- अमेज़न के जंगल अब जितनी कार्बन डाइऑक्साइड सोख रहे हैं, उससे ज्यादा छोड़ रहे हैं। हर साल करीब 1.3 अरब टन CO2 हवा में जा रही है।
- वजहों में सुपर अल नीनो से पड़ा सूखा और आग, करीब 20% हिस्से की कटाई, गर्मी से पेड़ों की मौत और सवाना की तरफ बढ़ती जलवायु शामिल हैं।
- मनौस शहर में धुएं से हेल्थ इमरजेंसी लगी और कई जगह स्कूल, कॉलेज और दफ्तर बंद करने पड़े।
- कोलंबिया ने अपने अमेज़न इलाके में कटाई, खनन और ड्रिलिंग पर पूरी तरह रोक लगाई है।










