Election Commission Electoral Reforms को लेकर एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में तीनों आयुक्तों की बैठक में 9 महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं, जो देश की चुनावी व्यवस्था में एक नया अध्याय साबित हो सकते हैं। यह कदम Indian Express की खोजी पत्रकारिता रिपोर्ट के बाद उठाया गया है, जिसमें आयोग की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े किए गए थे।
देखा जाए तो, यह पहली बार है जब निर्वाचन आयोग ने अपनी आंतरिक कार्यप्रणाली को इतने विस्तार से सार्वजनिक किया है। बीते 10 महीनों में निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 14 बार आपत्तियां दर्ज कीं। इन आपत्तियों में फॉर्म 6, ECI Net प्लेटफॉर्म, IT संबंधी निर्णय और गोवा के 97 मतदाताओं का मामला प्रमुख था।
विवाद की पृष्ठभूमि: क्यों उठे सवाल
Election Commission of India एक त्रि-सदस्यीय संवैधानिक निकाय है। इसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त के साथ-साथ दो अन्य निर्वाचन आयुक्त होते हैं। लेकिन अब तक इसकी कार्यप्रणाली में कोई स्पष्ट नियम-कायदे नहीं थे।
समझने वाली बात है कि बैठकें कब होंगी, एजेंडा क्या होगा, निर्णय कैसे लिए जाएंगे – इन सभी बातों का कोई लिखित प्रोटोकॉल नहीं था। Indian Express की रिपोर्ट में यही मुद्दा उठाया गया कि क्या मुख्य निर्वाचन आयुक्त अकेले ही फैसले ले रहे हैं?
इसी दबाव में सोमवार को तीनों आयुक्तों की बैठक हुई। और जो तस्वीरें जारी की गईं, उनमें एकता दिखाने की कोशिश साफ नजर आई। निर्वाचन आयोग का कहना है कि SIR (Summary Revision of Electoral Rolls) से जुड़े सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे।
पहला बड़ा बदलाव: घर बैठे मिलेगी सुविधा
अगर गौर करें तो सबसे बड़ी राहत आम मतदाताओं को मिली है। अब तक SIR नोटिस मिलने पर लोगों को खुद Electoral Registration Officer (ERO) के सामने पेश होना पड़ता था। दस्तावेज लेकर जाना पड़ता था।
लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।
अब Booth Level Officer (BLO) खुद आपके घर आएगा। आपके दस्तावेज लेगा। उन्हें ऑनलाइन अपलोड करेगा। और फाइनल निर्णय ERO लेगा।
यहां ध्यान देने वाली बात है कि बुजुर्ग, दिव्यांग और गरीब मतदाताओं के लिए यह बेहद जरूरी कदम था। उनके लिए शारीरिक रूप से कहीं जाना मुश्किल होता है। हालांकि कुछ अपवाद मामलों में व्यक्तिगत सुनवाई जरूरी होगी, लेकिन वह भी ऑनलाइन ही कराई जाएगी।
हेल्प डेस्क और विशेष शिविर लगेंगे
दूसरा महत्वपूर्ण निर्णय यह लिया गया कि जिला निर्वाचन अधिकारियों को अनिवार्य रूप से हेल्प डेस्क और विशेष शिविर लगाने होंगे।
दिलचस्प बात यह है कि बहुत से लोग दिन में काम करने जाते हैं। रात्रि आश्रय गृहों में रहने वाले, मजदूर वर्ग, बेघर लोग – इन्हें सहायता नहीं मिल पाती। न ही उन्हें जानकारी होती है कि क्या करना है।
इसलिए अब SIR प्रक्रिया के दौरान इन वर्गों के लिए विशेष शिविर आयोजित किए जाएंगे। शिकायतें दर्ज कराने के लिए हेल्प डेस्क की व्यवस्था होगी।
बाहर हुए मतदाता फिर से दर्ज करा सकेंगे नाम
तीसरा बड़ा बदलाव – विशेष नामांकन अभियान।
निर्वाचन आयोग का स्पष्टीकरण है कि SIR से बाहर होने का मतलब यह नहीं कि आप कभी मतदाता सूची में नहीं आ सकते। जो लोग SIR के दौरान छूट गए हैं, वे फॉर्म 6 भरकर फिर से अपना नाम चढ़वा सकते हैं।
देश भर में विशेष नामांकन अभियान चलाया जाएगा। क्योंकि SIR में लाखों-करोड़ों नामों को हटाया गया है। लेकिन जिन्हें लगता है कि गलती से उनका नाम हटा है, वे फिर से वोटर आईडी के लिए आवेदन कर सकते हैं।
गोवा विवाद: 97 मतदाताओं का मामला
यहां एक बड़ा विवाद हुआ था। गोवा में 97 मतदाताओं के नाम SIR से बाहर नहीं होने चाहिए थे। ERO ने खुद शिकायत की कि सॉफ्टवेयर में नाम नहीं चढ़ पा रहा।
अब निर्वाचन आयोग ने सफाई दी है कि 97 में से 81 मतदाताओं ने फॉर्म 6 भर दिया है। बाकी भी जब भरेंगे तो नाम आसानी से चढ़ जाएगा।
लेकिन सवाल यही उठता है – यह समस्या आई ही क्यों?
ECI Net का स्वतंत्र परीक्षण होगा
चौथा और सबसे विवादास्पद मुद्दा था ECI Net प्लेटफॉर्म।
Indian Express की रिपोर्ट में दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने इस मंच को लेकर असहमति जताई थी। उनका कहना था कि केंद्रीकरण की कोशिश हो रही है। अब तक ERO (जो आमतौर पर SDM होते हैं) के पास वैधानिक शक्ति थी कि किसका नाम मतदाता सूची में रहेगा।
लेकिन अब यह नियंत्रण केंद्रीय अथॉरिटी के पास जा रहा है।
इस पर निर्वाचन आयोग ने फैसला लिया है कि ECI Net का स्वतंत्र परीक्षण कराया जाएगा। इसके लिए एक समिति बनाई जा रही है जिसका नेतृत्व वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त करेंगे। इसमें IIT के स्वतंत्र विशेषज्ञ भी होंगे।
समिति का काम यह देखना होगा कि ECI Net प्लेटफॉर्म कानून और नियमों के अनुसार है या नहीं। रिपोर्ट आयोग को सौंपी जाएगी और उसके बाद निर्णय लिया जाएगा।
भविष्य में IT परिवर्तन के लिए समिति की मंजूरी जरूरी
पांचवां निर्णय भी तकनीकी मोर्चे पर है।
अब तक निर्वाचन आयोग ने ECI Net खुद ही लागू कर दिया था। लेकिन अब भविष्य में कोई भी नया IT मॉड्यूल आएगा तो वह Committee of Officers से गुजरेगा।
वे तय करेंगे कि क्या बदलाव करने हैं या नहीं। क्या वह नियमों के अनुसार है या नहीं। यह एक बड़ा प्रक्रियात्मक सुधार है।
फील्ड अधिकारियों को मिलेगी लचीलापन
छठा बदलाव – फील्ड स्तर के अधिकारियों को ज्यादा flexibility दी जाएगी।
ECI Net में समस्या यह हो रही थी कि फील्ड अधिकारी चीजें अपलोड नहीं कर पा रहे थे। बदलाव नहीं कर पा रहे थे। अब उन्हें थोड़ी लचीलापन दी जाएगी ताकि वे जरूरी बदलाव कर सकें।
बैठक से पहले एजेंडा साझा किया जाएगा
सातवां और बेहद महत्वपूर्ण निर्णय – आजादी के बाद से अब तक निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली में कोई स्पष्ट नियम नहीं थे।
अब तय किया गया है कि:
- हर बैठक से पहले एजेंडा साझा किया जाएगा
- सभी आयुक्तों को पता होगा कि क्या चर्चा होगी
- बैठक का मिनट्स तैयार किया जाएगा
- सभी चर्चाएं रिकॉर्ड में रहेंगी
कहने का मतलब साफ है – अब कोई गुप्त निर्णय नहीं होंगे। सब कुछ दस्तावेजी रूप में होगा।
देखा जाए तो एक सामान्य Listed Company में भी बोर्ड की बैठकों का रिकॉर्ड रखा जाता है। लेकिन निर्वाचन आयोग में अब तक ऐसा नहीं था।
विदेश यात्रा के लिए तीनों की मंजूरी जरूरी
आठवां निर्णय – अब तक अधिकारियों की विदेश यात्रा को आमतौर पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त approve कर देते थे।
लेकिन अब तीनों आयुक्तों की सहमति जरूरी होगी। यह भी एक पारदर्शिता का कदम है।
निर्देशों का संकलन अनिवार्य
नौवां निर्णय – तीनों आयुक्त निचले स्तर के अधिकारियों के लिए जो भी निर्देश देंगे, उनका proper compilation होगा।
मतलब यह रिकॉर्ड रहेगा कि आयुक्तों ने क्या कहा और अधिकारियों ने क्या किया। जवाबदेही तय होगी।
वार्षिक प्रदर्शन रिपोर्ट सार्वजनिक होगी
एक और अहम घोषणा – हर साल 31 दिसंबर तक Annual Performance Appraisal Report सार्वजनिक की जाएगी।
अब तक निर्वाचन आयुक्तों के निर्णयों का क्या प्रभाव पड़ा, इसकी कोई रिपोर्ट नहीं आती थी। लेकिन अब सालाना प्रदर्शन रिपोर्ट जारी होगी। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी।
फॉर्म 6 विवाद पर सफाई
आखिरी मुद्दा था फॉर्म 6। दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी कि फॉर्म 6 में अतिरिक्त प्रश्न जोड़े गए – जैसे माता-पिता का नाम पिछले SIR में था या नहीं।
निर्वाचन आयोग ने सफाई दी है कि फॉर्म 6 में नए प्रश्नों को सुप्रीम कोर्ट ने भी upheld किया है। यानी कानूनी तौर पर यह सही है।
क्या यह काफी है?
ये सभी निर्णय निश्चित रूप से सकारात्मक दिशा में कदम हैं। लेकिन कई सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं:
- अब तक ये नियम क्यों नहीं थे?
- Indian Express की रिपोर्ट के बाद ही यह कदम क्यों?
- पिछले 10 महीनों में 14 बार आपत्तियां उठने के बावजूद कार्रवाई अब क्यों?
- क्या वाकई सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे?
दिलचस्प बात यह है कि जो तस्वीरें जारी की गईं, उनमें तीनों आयुक्तों को एकजुट दिखाने की कोशिश की गई। लेकिन रिपोर्ट्स में जो आंतरिक मतभेद सामने आए हैं, वे गंभीर हैं।
आम मतदाता के लिए क्या मायने रखता है
सबसे अहम बात – इन बदलावों का असर आम मतदाता पर क्या होगा?
राहत की बात है कि:
- अब घर बैठे दस्तावेज जमा कर सकेंगे
- हेल्प डेस्क से मदद मिलेगी
- SIR से बाहर हुए लोग फिर से नाम चढ़वा सकेंगे
- प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी
लेकिन चिंता का विषय यह है कि:
- ECI Net जैसे प्लेटफॉर्म में अभी भी तकनीकी समस्याएं हैं
- फील्ड स्तर पर अधिकारियों की शक्तियां सीमित हो रही हैं
- केंद्रीकरण से स्थानीय समस्याओं का समाधान मुश्किल हो सकता है
निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता पर बहस
यहां ध्यान देने वाली बात है कि निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक निकाय है। इसकी स्वतंत्रता लोकतंत्र की बुनियाद है।
लेकिन जब आंतरिक मतभेद सार्वजनिक होते हैं, तो यह संस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है। 2012 की निर्भया घटना की तरह, यहां भी प्रणालीगत समस्याएं दिख रही हैं।
क्या तीन सदस्यीय निकाय में सिर्फ एक व्यक्ति फैसले ले सकता है? क्या बाकी दो सदस्य केवल औपचारिकता हैं? ये सवाल महत्वपूर्ण हैं।
| पहले की व्यवस्था | नई व्यवस्था |
|---|---|
| मतदाताओं को ERO के सामने पेश होना पड़ता था | BLO खुद घर आएगा |
| कोई हेल्प डेस्क नहीं थी | अनिवार्य हेल्प डेस्क और शिविर |
| बैठक का कोई एजेंडा नहीं | पहले से एजेंडा साझा होगा |
| निर्णयों का कोई रिकॉर्ड नहीं | मिनट्स तैयार होंगे |
| CEC अकेले विदेश यात्रा approve करते थे | तीनों की मंजूरी जरूरी |
| कोई वार्षिक रिपोर्ट नहीं | 31 दिसंबर तक रिपोर्ट सार्वजनिक |
2024 के चुनावों पर असर
समझने वाली बात है कि 2024 में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन सुधारों का सीधा असर उन चुनावों की तैयारियों पर पड़ेगा।
खासतौर पर दिल्ली, बिहार और अन्य राज्यों में जहां SIR हाल ही में संपन्न हुआ है, वहां विशेष नामांकन अभियान चलाना होगा। लाखों लोगों को फिर से मतदाता सूची में शामिल करना एक बड़ी चुनौती होगी।
तकनीकी सुधार की दिशा
ECI Net का स्वतंत्र परीक्षण एक सही कदम है। लेकिन सवाल उठता है कि जब तक यह परीक्षण पूरा होगा, तब तक यह प्लेटफॉर्म काम करता रहेगा या रोका जाएगा?
IIT के विशेषज्ञों की समिति कितने दिन में रिपोर्ट देगी? क्या उसकी सिफारिशें बाध्यकारी होंगी? ये सब स्पष्ट नहीं है।
पृष्ठभूमि: मतदाता सूची विवाद का इतिहास
मतदाता सूची में नाम जोड़ने-घटाने का मामला नया नहीं है। लेकिन SIR को लेकर इस बार विवाद इसलिए बढ़ा क्योंकि:
- बिहार से शुरू हुई SIR पहल में तीव्र गति से नाम हटाए गए
- बाद में 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विस्तार
- 14 मई 2024 को दिल्ली सहित कई जगहों में SIR
- लेकिन प्रक्रियागत पारदर्शिता का अभाव
निर्वाचन आयोग का दावा है कि हर निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया। लेकिन Indian Express की रिपोर्ट कुछ और ही कहानी बयान करती है।
अंतिम शब्द
ये 9 निर्णय निश्चित रूप से स्वागत योग्य हैं। खासकर आम मतदाताओं को मिलने वाली सुविधाएं सराहनीय हैं। घर बैठे दस्तावेज जमा कराना, हेल्प डेस्क की सुविधा, और बैठकों में पारदर्शिता – ये सब जरूरी कदम थे।
लेकिन यह भी सच है कि ये कदम तभी उठाए गए जब मीडिया ने सवाल खड़े किए। प्रेस की स्वतंत्रता और जांच पत्रकारिता का महत्व यहां साबित होता है।
आने वाले समय में देखना होगा कि ये घोषणाएं सिर्फ कागजों पर ही रहती हैं या जमीन पर भी उतरती हैं। क्योंकि लोकतंत्र की मजबूती निष्पक्ष और पारदर्शी चुनावों पर ही टिकी है।
मुख्य बातें (Key Points)
• निर्वाचन आयोग ने Indian Express की रिपोर्ट के बाद चुनावी प्रक्रिया में 9 बड़े बदलाव किए हैं
• अब SIR नोटिस मिलने पर BLO खुद घर आएगा, मतदाता को कहीं जाने की जरूरत नहीं
• ECI Net प्लेटफॉर्म का IIT विशेषज्ञों द्वारा स्वतंत्र परीक्षण होगा
• बैठक से पहले एजेंडा साझा किया जाएगा और निर्णयों का रिकॉर्ड रखा जाएगा
• हर साल 31 दिसंबर तक वार्षिक प्रदर्शन रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी
• SIR से बाहर हुए मतदाता फॉर्म 6 भरकर फिर से नाम चढ़वा सकते हैं













