Mobile Manufacturing Scheme India 2026 – एक समय था जब भारत ज्यादातर मोबाइल इंपोर्ट करता था और देश में लगभग कुछ भी नहीं बनता था। फिर सरकार ने PLI स्कीम लॉन्च की, जिससे भारत दुनिया के सबसे बड़े मोबाइल प्रोड्यूसर और मैन्युफैक्चरर में से एक बन गया। लेकिन असल मायने में अगर गौर करें तो हम सिर्फ असेंबली करते थे – ज्यादातर कॉम्पोनेंट्स चाइना से इंपोर्ट होते थे। अब सरकार ने दूसरा फेज लॉन्च किया है – ₹62,500 करोड़ की मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (MPMS) जहां लोकलाइजेशन पर ज्यादा फोकस होगा। इस स्कीम से अगले 5 साल में करीब ₹39 लाख करोड़ का मोबाइल मैन्युफैक्चर होने का अनुमान है।
हैरान करने वाली बात यह है कि यह ₹39 लाख करोड़ सरकार का खर्च नहीं है, बल्कि इस स्कीम के दौरान होने वाले कुल मोबाइल उत्पादन की एक्स्पेक्टेड वैल्यू है।
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PLI से MPMS तक का सफर
भारत अब असेंबली से आगे बढ़कर हायर डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन की ओर जा रहा है। सरकार ने मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (MPMS) लॉन्च की है, जिसका बजट ₹62,500 करोड़ है और यह अगले 5 साल के लिए होगा – 2026-27 से लेकर 2030-31 तक।
देखा जाए तो PLI स्कीम 31 मार्च 2026 को खत्म हो गई। अब इस नई स्कीम का फोकस सिर्फ स्केल नहीं, बल्कि लोकलाइजेशन + इंडियन ब्रांड्स + R&D है।
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PLI vs MPMS: क्या है अंतर?
| पहलू | PLI स्कीम | MPMS स्कीम |
|---|---|---|
| फोकस | स्केल (असेंबली) | लोकलाइजेशन + स्केल |
| टारगेट | इंक्रीमेंटल सेल्स | एलिजिबल सेल्स |
| प्राथमिकता | ग्लोबल ब्रांड्स | इंडियन ब्रांड्स |
| मुख्य उद्देश्य | एक्सपोर्ट + मैन्युफैक्चरिंग | डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन |
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि अब तक मोबाइल की असेंबली भारत में होती थी, लेकिन ज्यादातर कॉम्पोनेंट्स विदेश से आते थे। अब लक्ष्य है कि डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग, असेंबली और IP – सब कुछ भारत में हो।
असेंबली vs वैल्यू कैप्चर
मान लीजिए ₹50,000 का एक मोबाइल है:
- ₹1,000: भारत की सर्विस/कॉम्पोनेंट
- ₹30,000: चाइना से इंपोर्ट कॉम्पोनेंट्स
- ₹5,000: फॉरेन ओन्ड टेक्नोलॉजी
- ₹14,000: कॉस्ट और मार्जिन
तो क्या यह वाकई “Made in India” है? टेक्निकली हां, भारत में असेंबली हुई। लेकिन वैल्यू कैप्चर नहीं हुआ।
MPMS का लक्ष्य: मैन्युफैक्चरिंग लोकेशन के साथ-साथ वैल्यू कैप्चर भी भारत में हो।
समझने वाली बात है कि अब सिर्फ असेंबली नहीं, बल्कि पूरी वैल्यू चेन भारत में होनी चाहिए।
दो टारगेट सेगमेंट: किसको मिलेगा फायदा?
टारगेट सेगमेंट 1: कन्वेंशनल मैन्युफैक्चरर्स
यह उन कंपनियों के लिए है जो पहले से मोबाइल बना रही हैं:
- इंसेंटिव: 2.5% से 5% तक
- एलिजिबिलिटी: मिनिमम टर्नओवर ₹10,000 करोड़
- एक्जिस्टिंग ब्रांड्स: ₹5,000 करोड़ एनुअल थ्रेशहोल्ड
- लाभार्थी: Apple, Samsung जैसी बड़ी कंपनियां
अगर गौर करें तो यह स्कीम हाई स्केल अचीव करने वालों के लिए है।
टारगेट सेगमेंट 2: इंडियन ब्रांड्स (सबसे महत्वपूर्ण)
यह इंडियन मोबाइल ब्रांड्स को सपोर्ट करने के लिए है:
- बेसिक इंसेंटिव: 5%
- R&D + डिजाइन इंसेंटिव: अतिरिक्त 3%
- कुल: 8% इंसेंटिव
- 25% लोकलाइजेशन बोनस: अतिरिक्त 1.5%
देखा जाए तो सरकार का मुख्य फोकस Indian Own Technology Companies बनाना है जो ग्लोबली कम्पीट कर सकें।
इंडियन ब्रांड की डेफिनिशन
सिर्फ भारत में रजिस्ट्रेशन से कोई इंडियन ब्रांड नहीं बन जाता। सरकार ने स्पष्ट मापदंड दिए हैं:
✅ भारत में रजिस्ट्रेशन
✅ इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी भारत के पास
✅ ट्रेडमार्क भारत में
✅ मैनेजमेंट कंट्रोल इंडियन सिटीजन का
✅ 51% शेयरहोल्डिंग इंडियन सिटीजन के पास
✅ इन-हाउस R&D भारत में
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि IP ओनरशिप बहुत महत्वपूर्ण है। अगर डिजाइन, पेटेंट, सॉफ्टवेयर सब विदेश में डेवलप हो रहा है, तो वह इंडियन ब्रांड नहीं है।
25% लोकलाइजेशन का मतलब
अगर मोबाइल फोन के 25% कॉम्पोनेंट्स भारत में बने हैं और कंपनी इसे प्रूफ करती है, तो 1.5% अतिरिक्त इंसेंटिव मिलेगा।
यह इसलिए जरूरी है क्योंकि कई कंपनियां ट्रिक करती हैं – पूरा मोबाइल बाहर से इंपोर्ट करती हैं और भारत में सिर्फ छोटा सा स्पीकर या कनेक्टर लगाकर “Made in India” का टैग लगा देती हैं।
समझने वाली बात है कि 25% थ्रेशहोल्ड इस तरह की चालबाजी को रोकने के लिए है।
रोजगार सृजन
इस स्कीम से:
- 60,000 डायरेक्ट जॉब्स
- इनडायरेक्ट जॉब्स: अनगिनत (लॉजिस्टिक, वेयरहाउसिंग, पूरा इकोसिस्टम)
मुख्य बातें (Key Points)
- ₹62,500 करोड़ की मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग स्कीम
- 2026-27 से 2030-31 तक 5 साल के लिए
- ₹39 लाख करोड़ का मोबाइल उत्पादन अनुमान
- इंडियन ब्रांड्स को 5% + 3% = 8% इंसेंटिव
- 25% लोकलाइजेशन पर अतिरिक्त 1.5%
- 60,000 डायरेक्ट जॉब्स
- असेंबली से वैल्यू कैप्चर की ओर शिफ्ट
FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न












