India Rejects Nepal Objection Lipulekh Pass को लेकर कल देर रात भारत सरकार ने एक सख्त बयान जारी किया है। भारत और चीन ने मिलकर जून 2026 से कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर से शुरू करने का निर्णय लिया है। लेकिन नेपाल को इस पर आपत्ति है। नेपाल का कहना है कि अगर भारत और चीन ऐसा कोई भी निर्णय लेते हैं तो उन्हें नेपाल से भी परामर्श करना चाहिए क्योंकि Lipulekh Pass का इलाका विवादित है। लेकिन भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने नेपाल के इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया है। भारत ने इसे “unilateral artificial enlargement” करार देते हुए कहा है कि यह दावा “untenable” यानी अस्वीकार्य है। नए प्रधानमंत्री बालेन शाह के नेतृत्व वाली नेपाल सरकार ने इस मामले पर सख्त रुख अपनाया है। यह विवाद सिर्फ एक यात्रा मार्ग का नहीं, बल्कि 1816 की Sugauli Treaty, काली नदी के उद्गम और ऐतिहासिक सीमा विवाद का है जो पिछले 200 साल से चल रहा है।
देखा जाए तो कैलाश मानसरोवर यात्रा मूल रूप से दो रास्तों से होती है। पहला रास्ता काफी लंबा है जो भूटान से सटे Nathu La Pass से होकर जाता है। दूसरा रास्ता अपेक्षाकृत छोटा लेकिन कठिन है जो Lipulekh Pass से होकर गुजरता है। यह रास्ता कैलाश मानसरोवर के काफी नजदीक पड़ता है इसलिए यात्रियों के लिए सुविधाजनक है। लेकिन यह बहुत ही कठिन terrain है और यहां से यात्रा करना चुनौतीपूर्ण होता है। नेपाल ने विशेष रूप से इसी Lipulekh Pass वाले रास्ते पर आपत्ति जताई है।
कैलाश मानसरोवर यात्रा में दो मुख्य गंतव्य हैं। पहला है Mount Kailash जो लगभग 6,500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। दूसरा है Lake Manasarovar जो 4,500 मीटर की ऊंचाई पर है। यह दोनों स्थान हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म में अत्यंत पवित्र माने जाते हैं। भारत इस यात्रा का आयोजन करता है और चीन access प्रदान करता है क्योंकि यह इलाका तिब्बत में आता है जो वर्तमान में चीन के नियंत्रण में है। इसीलिए इस यात्रा में भारत-चीन का समन्वय बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। समझने वाली बात यह है कि नेपाल इस पूरे समीकरण में कहां से आ रहा है? नेपाल ने sovereignty का दावा Lipulekh Pass वाले इलाके पर किया है। नेपाल की आधिकारिक स्थिति यह है कि Lipulekh Pass जहां से यह यात्रा गुजरती है, वह नेपाल के क्षेत्र में आता है।
अगर आप नक्शे को ध्यान से देखें तो वर्तमान स्थिति यह है कि Lipulekh Pass, Kalapani और Limpiyadhura – ये तीनों इलाके विवादित हैं। भारत-नेपाल की जो मौजूदा सीमा है वह एक तरफ है, लेकिन नेपाल का दावा है कि Kalapani, Lipulekh और Limpiyadhura का पूरा इलाका (जो orange color में दिखाया गया है नक्शों में) उसका होना चाहिए। नेपाल का कहना है कि यह पूरा क्षेत्र उसकी सीमा में आना चाहिए। और क्योंकि यहां से यात्रा निकल रही है और भारत-चीन मिलकर यह निर्णय ले रहे हैं, इसलिए नेपाल की भी भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। नेपाल का यह कहना है कि भारत और चीन उसकी सहमति के बिना यहां से यात्रा नहीं निकाल सकते।
दिलचस्प बात यह है कि यह territorial dispute है इसलिए मामला अलग है। नेपाल ने भारत और चीन दोनों के साथ diplomatic protest दर्ज कराया है। सिर्फ भारत को लेकर नहीं, बल्कि चीन के साथ भी नेपाल ने यह विरोध जताया है। नेपाल ने इसे unilateral decision बताया है जो सीधे तौर पर उसके क्षेत्र को प्रभावित करता है। यहां तीन महत्वपूर्ण भौगोलिक बिंदु समझने होंगे – पहला Lipulekh Pass जो एक पहाड़ी दर्रा है और भारत तथा तिब्बत को जोड़ता है। दूसरा Kalapani जहां भारतीय सुरक्षा बल तैनात हैं। तीसरा Limpiyadhura जिसके बारे में नेपाल का दावा है कि यहां से काली नदी का उद्गम होता है। और यहीं से पूरा मामला जटिल हो जाता है।
काली नदी विवाद – असली समस्या की जड़
बुनियादी तौर पर जिस नदी की हम बात कर रहे हैं वह है Kali River (काली नदी)। नेपाल का दावा है कि काली नदी Limpiyadhura से originate होती है। इसलिए इस पूरे इलाके पर उसका अधिकार होना चाहिए। सरल शब्दों में समझें तो अगर नदी Kalapani से originate होगी तो boundary वैसी ही होगी जैसी आप अभी देख रहे हैं। लेकिन अगर काली नदी का उद्गम Limpiyadhura से होता है तो उस स्थिति में यह पूरा क्षेत्र नेपाल का हो जाएगा जैसा नेपाल claim कर रहा है। भारत का कहना है कि Kalapani से नदी का उद्गम होता है इसलिए यह क्षेत्र भारत का है। यहां ध्यान देने वाली बात है कि इस विवाद की जड़ें ऐतिहासिक हैं।
1816 की Sugauli Treaty – विवाद की शुरुआत
इस विवाद को समझने के लिए हमें 200 साल पीछे जाना होगा। Treaty of Sugauli ब्रिटिश भारत और नेपाल के बीच हुई थी। 1814 से 1816 के बीच Anglo-Nepal War चला था। इस युद्ध के बाद सीमा का मामला सामने आया। इस संधि में कहा गया कि “Territory east of Kali River” यानी काली नदी के पूर्व का क्षेत्र नेपाल को belong करेगा।
अब समझिए – अगर हम मानें कि काली नदी यहां से (Limpiyadhura से) originate हो रही है, तो इसके east यानी पूर्व में जो पूरा क्षेत्र है वह नेपाल का होना चाहिए। और अगर काली नदी यहां से (Kalapani से) originate हो रही है तो वर्तमान boundary सही है जो आज हमें देखने को मिलती है।
समस्या यह है कि Sugauli Treaty में exactly define नहीं किया गया कि काली नदी का source क्या है। क्या Limpiyadhura source है या Kalapani? अगर यह clearly define होता तो आज का यह विवाद होता ही नहीं। यही सबसे बड़ी खामी थी उस संधि में जो आज तक विवाद का कारण बनी हुई है।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है 1860 में British Cartographic Changes। 1860 में ब्रिटिश नक्शों में यह दिखाया गया कि Kalapani ब्रिटिश इंडिया के अंदर आता है। आजादी के बाद 1947 में जब अंग्रेज चले गए तो भारत ने इसी को adopt कर लिया। भारत ने कहा कि जो क्षेत्र ब्रिटिश इंडिया के under था, वह स्वाभाविक रूप से स्वतंत्र भारत के under आना चाहिए।
1954 में पंडित नेहरू के समय भारत-चीन के बीच एक trade agreement हुआ जिसमें Lipulekh Route को recognize किया गया था। लेकिन 1962 में Sino-Indian War हो गया और यह रास्ता फिर sensitive हो गया। लेकिन 1992 के बाद से इस route को फिर से खोल दिया गया। यहां से trade और pilgrimage फिर से शुरू हो गए।
दोनों पक्षों के तर्क
नेपाल का तर्क: Sugauli Treaty के अनुसार काली नदी Limpiyadhura से start होती है। इसलिए Kalapani, Lipulekh और Limpiyadhura – यह पूरा क्षेत्र नेपाल का होना चाहिए। 2020 में तत्कालीन प्रधानमंत्री KP Oli ने एक नया official map जारी किया था और संविधान संशोधन भी किए गए थे इस disputed territory को लेकर। अभी KP Oli जेल में हैं लेकिन उन्होंने जो मुद्दा उठाया था वह अब भी बना हुआ है।
भारत का तर्क: काली नदी Kalapani से start होती है। भारत का historical administrative control इस क्षेत्र पर रहा है। यहां military presence है, infrastructure है। इसलिए यह क्षेत्र भारत का ही होना चाहिए।
2020 का टर्निंग पॉइंट – सड़क निर्माण
2020 में एक बड़ा मोड़ आया जब भारत ने Lipulekh तक एक सड़क बना दी। क्योंकि यह बहुत ही tough terrain है, इसलिए भारत ने सोचा कि pilgrims को आसानी हो इसलिए Lipulekh तक सड़क बनाई जाए। यह लगभग 80 किमी लंबी Dharchula-Lipulekh road थी। नेपाल ने इस पर बहुत strongly react किया। नेपाल का कहना था कि हम यह कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे, आपने सड़क कैसे बना ली।
इसी के बाद नेपाल ने एक नया political map जारी कर दिया जिसमें इस क्षेत्र को नेपाल के अंदर दिखाया गया। यह वही KP Oli की सरकार थी। अगर गौर करें तो यह मामला जो revive किया गया, वह काफी हद तक KP Oli ने अपने political benefit के लिए किया था। यही होता है – अगर देश में कोई ऐसा मुद्दा उठा दो तो वह फिर जिन्न की तरह बाहर आ जाता है और वापस अंदर नहीं जाता।
सवाल उठता है कि अब कौन सी political party नेपाल में यह कहेगी कि नहीं, यह भारत का ही है, हमारा नहीं? यह मुश्किल हो जाता है। इसलिए यह सबसे बड़ी दिक्कत है कि एक dormant issue को nationalist dispute में transform कर दिया गया।
वर्तमान स्थिति – भारत का सख्त रुख
Immediate trigger यही है कि भारत ने Lipulekh Pass के through यात्रा की घोषणा की, चीन ने इसे agree कर दिया, लेकिन नेपाल ने आपत्ति जताई कि हमसे भी consult करो। कल देर रात भारत सरकार ने एक press note जारी किया जिसमें कहा गया:
“India’s position in this regard has been consistent. The Lipulekh Pass is part of a long-standing route for the Kailash Manasarovar Yatra since 1954. This pilgrimage has been going on for decades. This is not a new development.”
भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि जहां तक territorial claim का सवाल है, भारत ने हमेशा यह maintain किया है कि इस तरह के दावे कभी भी justified नहीं हो सकते। India remains open to constructive interaction यानी भारत ने कहा कि देखो, नेपाल के साथ अगर कोई बातचीत करनी है तो हम constructive तरीके से कर सकते हैं। लेकिन यह कहना कि यह territory हमारी है या वहां से route नहीं जा सकता – यह गलत है। यही भारत का objection था।
राजनयिक और रणनीतिक प्रभाव
यहां ध्यान देने वाली बात है कि इस विवाद का diplomatic impact भी होगा क्योंकि भारत-नेपाल का रिश्ता काफी करीबी रहा है। Open border है, cultural ties हैं, economic dependence है। काफी हद तक integrated रिश्ता है। लेकिन हाल ही में कई developments हो रहे हैं।
आपको याद होगा कुछ दिन पहले नेपाल में काफी protest हो रहा था especially border areas में कि अगर भारत से ₹100 का भी सामान ले जा रहे हो तो tax देना पड़ेगा, custom duty pay करनी पड़ेगी। यह नियम तो पहले से था लेकिन इतनी strictly implement नहीं किया जाता था। अब नए प्रधानमंत्री Balen Shah के नेतृत्व में कई चीजें की जा रही हैं और यह भी एक बड़ा कदम था।
चिंता का विषय यह है कि ऐतिहासिक रूप से मजबूत India-Nepal relations में यह territorial dispute एक बड़ी बाधा बन सकता है। Lipulekh Pass का यह मामला केवल एक यात्रा मार्ग का नहीं है – यह सीमा, संप्रभुता, ऐतिहासिक संधियों की व्याख्या और दोनों देशों के बीच विश्वास का मामला है।
देखना होगा कि आगे इस मामले में क्या होता है। लेकिन भारत ने अपनी स्थिति बिल्कुल स्पष्ट कर दी है कि Lipulekh Pass भारत के क्षेत्र में आता है, यह route 1954 से use हो रहा है और Kailash Manasarovar Yatra जारी रहेगी।
मुख्य बातें (Key Points):
• India Rejects Nepal Objection Lipulekh Pass – भारत ने नेपाल की आपत्ति को “unilateral artificial enlargement” कहते हुए खारिज किया
• Lipulekh Pass 1954 से Kailash Manasarovar Yatra का हिस्सा रहा है, यह कोई नया development नहीं
• विवाद की जड़ – 1816 की Sugauli Treaty में काली नदी के source को clearly define नहीं किया गया था
• नेपाल का दावा – काली नदी Limpiyadhura से originate होती है इसलिए Kalapani, Lipulekh पूरा क्षेत्र नेपाल का है
• 2020 में भारत द्वारा 80 km Dharchula-Lipulekh road बनाने से विवाद और बढ़ा, KP Oli ने नया map जारी किया













