India Stand on Iran Attack: ईरान पर अमेरिका और इसराइल के भीषण हमले के बाद पूरी दुनिया अपना-अपना स्टैंड ले रही है — लेकिन भारत का स्टैंड क्या है, यह सवाल अब देश और दुनिया दोनों में गूंज रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान पर हमले के बाद सऊदी अरब, बहरेन, यूएई और इसराइल के नेताओं को फोन किया, लेकिन ईरान को नहीं। ईरान के सुप्रीम लीडर आयातुल्ला खामेनई की हत्या पर न तो निंदा की, न शोक जताया — लेकिन जब ईरान ने खाड़ी देशों पर जवाबी हमला किया तो यूएई पर हमले की निंदा तुरंत कर दी।
बिना कहे भारत ने जवाब दे दिया है कि वह किसके साथ खड़ा है — और यही बात आज भारत की कूटनीति, नैतिकता और “विश्वगुरु” के दावों पर सबसे बड़ा सवालिया निशान बन गई है।
बिना कहे भारत ने चुन लिया पक्ष: जो नहीं कहा वही सबसे बड़ा बयान
28 फरवरी को ईरान पर हमला हुआ। प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ नहीं कहा। खामेनई की हत्या हो गई — संवेदना नहीं जताई। लेकिन जैसे ही ईरान ने जवाबी कार्रवाई में खाड़ी देशों पर हमला किया, प्रधानमंत्री मोदी फोन करने लगे और चिंता जताने लगे।
मोदी के दो ट्वीट इस पूरी तस्वीर को साफ कर देते हैं। एक ट्वीट में वे बेंजामिन नेतन्याहू से बात करके नागरिकों की सुरक्षा की चिंता जता रहे हैं और तनाव कम करने की बात कर रहे हैं — लेकिन हमला तो इसराइल ने किया, ईरान ने पहले नहीं। दूसरे ट्वीट में उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात पर हमले की निंदा की — मगर उसमें ईरान का नाम तक नहीं लिया। ईरान पर इसराइल और अमेरिका हमला कर रहे हैं — उसकी निंदा नहीं। लेकिन ईरान का बिना नाम लिए यूएई पर हमले की निंदा कर दी।
बेशक इन खाड़ी देशों में भारतीय रहते हैं और उनकी सुरक्षा जरूरी है — लेकिन भारतीय तो ईरान में भी रहते हैं और भारत का ईरान से सदियों पुराना सभ्यतागत रिश्ता रहा है। चाबहार बंदरगाह में भारत के हजारों करोड़ का निवेश है। मध्यपूर्वी देश अमेरिका के साथ हो गए हैं, यानी ईरान के खिलाफ — और प्रधानमंत्री मोदी का इन्हीं देशों के साथ खड़े रहने का एक ही मतलब निकलता है कि भारत ने ईरान का सवाल छोड़ दिया है।
कनाडा का सहारा लेकर शांति की अपील: बिना नाम लिए किससे कह रहे हैं?
तीन दिन बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के साथ एक संयुक्त बयान में शांति की अपील की। उन्होंने कहा — “पश्चिम एशिया की वर्तमान स्थिति हमारे लिए गहरी चिंता का विषय है। भारत डायलॉग और डिप्लोमेसी के माध्यम से सभी विवादों के समाधान का समर्थन करता है। जब दो लोकतंत्र साथ खड़े होते हैं तो शांति की आवाज और भी सशक्त हो जाती है।”
लेकिन इस बयान में कई बातें गायब हैं। पहला — खामेनई की हत्या पर एक शब्द नहीं। दूसरा — ईरान पर हमले का जिक्र नहीं। तीसरा — अमेरिका और इसराइल का नाम नहीं लिया गया। शांति की अपील तो हवा में की जा रही है — जिससे अपील की जा रही है उसका नाम क्यों नहीं लिया जा रहा? चौथा — कनाडा के प्रधानमंत्री कार्नी ने खुद ईरान पर हमले का समर्थन किया है, फिर उनके साथ खड़े होकर शांति की बात करने का क्या मतलब?
अगर जनरल तरीके से बातचीत का सुझाव ही देना था तो इसके लिए विदेश मंत्री या प्रधानमंत्री की क्या जरूरत — यह काम तो कोई भी कर सकता है।
पाकिस्तान-अफगानिस्तान पर निंदा, ईरान पर चुप्पी: दोहरापन साफ दिखा
भारत के इस रवैये का दोहरापन सबसे साफ तब दिखता है जब आप 21 फरवरी और 28 फरवरी की तुलना करें। 21 फरवरी की रात जब पाकिस्तान ने अफगानिस्तान पर हमला किया, तब भारत ने तुरंत कड़ी निंदा जारी की और कहा — “रमजान के महीने में किए गए इस हमले में आम नागरिकों, महिलाओं और बच्चों की मौत हुई है। भारत अफगानिस्तान की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और स्वतंत्रता के प्रति अपना समर्थन प्रकट करता है।”
लेकिन ठीक उसी रमजान के महीने में जब ईरान पर अमेरिका और इसराइल ने हमला किया, आम नागरिक मारे गए, स्कूल पर बम गिरे, सुप्रीम लीडर की हत्या हुई — तब भारत की निंदा कहां है? संप्रभुता का समर्थन कहां है?
पाकिस्तान अफगानिस्तान पर हमला करे तो भारत निंदा कर देता है। लेकिन इसराइल ईरान पर हमला करे तो भारत निंदा क्यों नहीं कर पाता? यह सवाल आज पूरे देश में उठ रहा है।
2024 में रईसी पर शोक, 2026 में खामेनई पर चुप्पी — क्या बदल गया?
2024 में जब हेलीकॉप्टर हादसे में ईरान के तत्कालीन राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की मौत हुई, तब भारत ने एक दिन के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की थी। लेकिन इस बार जब ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनई की हत्या अमेरिकी-इसराइली बमबारी में हुई — तो भारत ने शोक तो दूर, संवेदना तक व्यक्त नहीं की।
इतना ही नहीं, ईरान के पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद की भी इन हमलों में हत्या की खबर आई — उस पर भी भारत की चुप्पी नोट की जा रही है।
एक साल पहले तक भारत का विदेश मंत्रालय कह रहा था — “भारत दोनों देशों (ईरान और इसराइल) से करीबी और दोस्ताना रिश्ते रखता है।” लेकिन इस बार यह भी नहीं कहा जा रहा। एक साल पहले ईरान को “दोस्त” कह रहे थे, अब दोस्त भी नहीं कह पा रहे।
स्पेन ने दिखाया कैसे लिया जाता है स्टैंड
जो लोग कहते हैं कि इस तरह के मामलों में साफ स्टैंड लेना मुश्किल है, उन्हें स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज का बयान देखना चाहिए। सांचेज ने एक ही बयान में दो बातें कहीं — पहला, ईरान में हजारों प्रदर्शनकारियों की हत्या की कड़ी निंदा की। दूसरा, एक संप्रभु देश पर बिना अमेरिकी कांग्रेस या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी के हमले को भी अनुचित बताया।
सांचेज ने साफ कहा — “आप ईरान जैसी दमनकारी सरकार का विरोध कर सकते हैं, पूरा स्पेन इसका विरोध करता है। लेकिन इसी के साथ आप अंतरराष्ट्रीय कानूनों के दायरे से बाहर जाकर की गई खतरनाक सैनिक कार्रवाई का भी विरोध कर सकते हैं। युद्ध का विनाश एकमात्र रास्ता नहीं। बातचीत से समाधान निकल सकता है।”
स्पेन के प्रधानमंत्री ने अपने बयान में गांधी, बुद्ध या वसुधैव कुटुंबकम का जिक्र नहीं किया। अपनी परंपरा के देवी-देवताओं और मिथकों का सहारा नहीं लिया। बस साफ स्टैंड लिया। स्पेन विश्वगुरु बनने की दौड़ में नहीं है, फिर भी उसने दिखा दिया कि जब दुनिया पर विनाश मंडरा रहा हो, तब कैसे स्टैंड लिया जाता है।
‘युद्ध नहीं बुद्ध’ की लाइन अब कहां गई?
प्रधानमंत्री मोदी ने जुलाई 2024 में ऑस्ट्रिया में कहा था — “हमने युद्ध नहीं दिए, हम सीना तानकर दुनिया को कह सकते हैं कि हिंदुस्तान ने युद्ध नहीं, बुद्ध दिए हैं। भारत ने हमेशा पीस और प्रोस्पेरिटी दी है। 21वीं सदी में भी भारत इस भूमिका को सशक्त करने वाला है। जब दुनिया भारत को विश्वबंधु के रूप में देखती है तो यह गर्व की बात है।”
सितंबर 2022 में समरकंद में शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति पुतिन के सामने कह दिया था — “आज का युग युद्ध का नहीं है।” यह हिस्सा पूरी दुनिया में वायरल हुआ था और ग्लोबल मंच पर मोदी की स्पष्टता के गुण गाए गए।
दिसंबर 2025 में पुतिन के भारत दौरे पर कहा — “भारत न्यूट्रल नहीं है, भारत का पक्ष शांति का है।” लेकिन ठीक 4 दिन पहले संयुक्त राष्ट्र में रूस-यूक्रेन सीजफायर के प्रस्ताव पर भारत ने मतदान में हिस्सा ही नहीं लिया — जबकि 107 देश सीजफायर के पक्ष में वोट कर रहे थे।
अब सवाल यह है — क्या प्रधानमंत्री मोदी ने उसी तरह नेतन्याहू और ट्रंप से भी फोन पर कहा कि “युद्ध का युग नहीं है, मत कीजिए”? अगर कहा तो क्यों नहीं बताया? और अगर नहीं कहा तो फिर वो नैतिक स्टैंड किसके लिए है — सिर्फ उन देशों के लिए जिनसे भारत को डर नहीं लगता?
कांग्रेस ने लिया साफ स्टैंड: ‘खामेनई की हत्या की कड़ी निंदा’
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने पार्टी का विस्तृत बयान जारी कर साफ स्टैंड लिया। कांग्रेस ने कहा — “भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ईरान के सर्वोच्च नेता अली हुसैनी खामेनई की हत्या की कड़ी निंदा करती है, जो बिना औपचारिक युद्ध की घोषणा के किया गया। कांग्रेस इस गहन शोक की घड़ी में सर्वोच्च नेता के परिवार, ईरान के लोगों और विश्वभर के शिया समुदाय के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करती है।”
कांग्रेस ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 51 का हवाला दिया और कहा कि भारत की विदेश नीति संवाद, शांतिपूर्ण निपटारे और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान पर आधारित है। कांग्रेस ने कहा — “एक स्वतंत्र संप्रभु देश के नेतृत्व और शासन प्रणाली को बल से अस्थिर करना — चाहे वह ईरान में हो या वेनेजुएला में — जबरन शासन परिवर्तन है। यह संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन है। एक राष्ट्राध्यक्ष की सुनियोजित हत्या अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन है। संप्रभुता बिना शर्त होती है।”
कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने ट्वीट किया — “अमेरिकी कठपुतली पाकिस्तान के जोकर प्रधानमंत्री तक ने ईरान के लिए संवेदना के शब्द कहे और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन की निंदा की। लेकिन नरेंद्र मोदी एक शब्द तक नहीं कह पाए। अमेरिका से आपका यह डर मेरे देश पर कलंक है।”
कांग्रेस का स्टैंड साफ है — अगर-मगर से भरा नहीं है। बता रहा है कि इस वक्त भी स्टैंड लिया जा सकता है। इतना मुश्किल नहीं है हमले की निंदा करना।
इसराइल दौरे की टाइमिंग पर गहराते सवाल
प्रधानमंत्री मोदी 25-26 फरवरी को इसराइल में थे — हमले से ठीक दो दिन पहले। नेतन्याहू के साथ डिनर कर रहे थे, इसराइली संसद (नेसेट) में भाषण दे रहे थे। अब इसराइल के रक्षा अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया कि यह हमला हफ्तों पहले प्लान हो चुका था। यह भी कहा जा रहा है कि अमेरिका और इसराइल एक सप्ताह पहले ही हमला करना चाहते थे लेकिन खुफिया कारणों से एक सप्ताह टाला गया।
द हिंदू की वरिष्ठ पत्रकार सुहासिनी हैदर ने लिखा — “अगर ऐसा हुआ तो कूटनीतिक मर्यादाओं का हनन किया गया है। क्या इसराइल ने प्रधानमंत्री मोदी को कवर के रूप में इस्तेमाल किया? उन्हें बुलाया ताकि ईरान उस दौरान हमला न करे और इसराइल-अमेरिका को तैयारी का मौका मिल जाए।”
सवाल यह उठ रहा है — क्या प्रधानमंत्री मोदी को इसराइल में रहते हुए इस हमले की जानकारी दी गई? क्या इसराइल ने भारत से हमले की योजना साझा की? और अगर नहीं, तो क्या नेतन्याहू ने भारत के प्रधानमंत्री को अंधेरे में रखा?
चाबहार बंदरगाह: भारत के हजारों करोड़ खतरे में
ईरान के चाबहार बंदरगाह में भारत का हजारों करोड़ रुपये का निवेश है। यह बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है — अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच का यह भारत का एकमात्र रास्ता है जो पाकिस्तान से होकर नहीं गुजरता। चाबहार के आसपास के सैन्य ठिकानों पर पहले ही हमले हो चुके हैं। अगर युद्ध और बढ़ा तो हमला बंदरगाह पर भी हो सकता है।
सवाल यह है — क्या इसराइल ने भारत को गारंटी दी है कि भारत के हितों को देखते हुए चाबहार पर हमला नहीं करेगा? और अगर नहीं, तो भारत चुप क्यों है?
भारत में विरोध प्रदर्शन: ईरानी दूतावास ने शेयर किए वीडियो
भारत के कई शहरों में ईरान पर हमले और खामेनई की हत्या के विरोध में प्रचंड प्रदर्शन हो रहे हैं। कश्मीर, हैदराबाद, अमरोहा, अलीगढ़, लखनऊ — जिले-जिले में शिया और सुन्नी समुदाय के लोग सड़कों पर उतरकर विरोध कर रहे हैं। भारत में ईरानी दूतावास में शोक सभा का आयोजन हुआ और इन प्रदर्शनों के वीडियो ईरान के दूतावास के सोशल मीडिया हैंडल से ट्वीट किए जा रहे हैं।
ईरान एक तरह से यह संदेश दे रहा है कि भारत की जनता इस हमले के विरोध में है, मगर भारत की सरकार हमले की निंदा तक नहीं कर पाई। सुप्रीम लीडर की हत्या का विरोध तो दूर, शोक तक नहीं जताया गया।
‘नैतिकता से दुनिया नहीं चलती’ कहने वालों से सवाल
मोदी सरकार के समर्थन में सबसे बड़ी दलील यही दी जा रही है कि “कूटनीतिक संबंध जियोपॉलिटिकल वास्तविकता से चलते हैं, नैतिकता से नहीं।” लेकिन इस दलील को स्वीकार करने से पहले कुछ सवालों का जवाब जरूरी है।
अगर नैतिकता से दुनिया नहीं चलती, तो प्रधानमंत्री मोदी अपने भाषणों में बार-बार गांधी, बुद्ध और वसुधैव कुटुंबकम की बातें क्यों करते हैं? जब कहते हैं “भारत ने कभी किसी पर हमला नहीं किया” — तो क्या यह नैतिक स्टैंड नहीं? जब विश्वगुरु बनने का दावा करते हैं — तो क्या विश्वगुरु की कल्पना से नैतिकता निकाल दें तो उसमें क्या बचता है?
और सबसे बड़ा सवाल — अगर व्यवहारिकता के नाम पर ट्रंप और नेतन्याहू का साथ दे रहे हैं, तो बताइए — ट्रंप ने भारत पर टैरिफ लगाकर अपमानित किया, क्या भारत ने विरोध किया? ऑपरेशन सिंदूर के वक्त अमेरिका ने पाकिस्तान के खिलाफ भारत का साथ दिया? पाकिस्तान के सेना प्रमुख के साथ लंच करके ट्रंप क्या भारत का मजाक नहीं उड़ा रहे थे? चीन ने डोकलाम और गलवान में अतिक्रमण किया — क्या अमेरिका और इसराइल ने साथ दिया?
तुर्की और ईरान एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी देश हैं, लेकिन तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगान ने किसी भी पक्ष के साथ खड़े होने से इनकार कर दिया और खामेनई की हत्या पर शोक जताया। अगर तुर्की जैसा देश स्वतंत्र स्टैंड ले सकता है, तो भारत क्यों नहीं?
विदेश मंत्रालय का बयान: चिंता जताना स्टैंड लेना नहीं है
28 फरवरी के हमले के बाद विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अरब देशों और ईरान के विदेश मंत्रियों से बात की। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने ट्वीट किया — “भारत ईरान और खाड़ी इलाके में हो रहे बदलावों से चिंतित है। हम सभी पक्षों से संयम बनाए रखने और टकराव से बचने की अपील करते हैं। सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान होना चाहिए।”
लेकिन इस बयान के बाद न विदेश मंत्रालय, न विदेश मंत्री, न प्रधानमंत्री का कोई ठोस बयान आया जो स्पष्ट रूप से इस हमले पर भारत की लाइन बताता। “चिंता जताना” स्टैंड लेना नहीं है। कितनी बार “बातचीत होनी चाहिए” कहेंगे — बातचीत तो ईरान कर ही रहा था, उसी बातचीत के बीच उस पर हमला किया गया। ओमान के विदेश मंत्री ने खुद सामने आकर कहा कि वे हताश हैं — अच्छी बातचीत चल रही थी, ईरान शर्तों पर सहमत हो रहा था, फिर भी हमला हुआ।
‘हमारी चुप्पी, हमारी कायरता भी इतिहास में दर्ज होगी’
माहे रमजान में आयातुल्ला खामेनई की शहादत इतिहास में दर्ज हो चुकी है। हर मजहब, हर धर्म शहादत और बलिदान को सर्वोच्च मानता है। ईसाई धर्म में प्रभु यीशु का सलीब पर चढ़ना, सिख धर्म में गुरु गोबिंद सिंह के चार साहिबजादों की शहादत, इस्लाम में हज़रत हुसैन की शहादत, हिंदू धर्म में भगवान कृष्ण का अर्जुन से कहना कि “युद्ध में मारे जाओगे तो स्वर्ग को प्राप्त करोगे” — हर परंपरा बलिदान को अमर मानती है।
खामेनई की शहादत इतिहास में दर्ज होगी ही — लेकिन उससे भी ज्यादा जो इतिहास में दर्ज होगी वह है भारत की चुप्पी। दुनिया में इतनी बड़ी घटना हो रही है और भारत न तो ईरान के लिए बोल पा रहा है, न खुलकर इसराइल के लिए खड़ा हो पा रहा है। 2014 से ग्लोबल लीडर और सुपर पावर बनने के न जाने कितने दावे किए गए — और आज भारत का स्टैंड क्या है, इसका जवाब किसी को नहीं मिल पा रहा।
मुख्य बातें (Key Points)
- प्रधानमंत्री मोदी ने सऊदी अरब, बहरेन, यूएई और इसराइल को फोन किया लेकिन ईरान को नहीं — खामेनई की हत्या पर न निंदा, न शोक, लेकिन यूएई पर हमले की निंदा तुरंत कर दी।
- स्पेन के प्रधानमंत्री सांचेज ने दिखाया कैसे लिया जाता है स्टैंड — ईरान की दमनकारी सरकार का विरोध भी किया और एक संप्रभु देश पर बिना मंजूरी के हमले का विरोध भी; भारत दोनों में से कुछ नहीं कर पाया।
- कांग्रेस ने साफ स्टैंड लिया — खामेनई की हत्या की कड़ी निंदा की, संविधान के अनुच्छेद 51 का हवाला दिया, बलपूर्वक शासन परिवर्तन को साम्राज्यवाद बताया।
- भारत का दोहरापन उजागर — पाकिस्तान के अफगानिस्तान पर हमले की रमजान में निंदा की, लेकिन उसी रमजान में ईरान पर हमले पर चुप; 2024 में रईसी पर शोक मनाया, 2026 में खामेनई पर चुप्पी।








