Why India Has Large Population Geography: भारत आज दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है। लगभग 147 करोड़ लोग यहां रहते हैं, जो दुनिया की कुल आबादी का 18% है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी आबादी के पास रहने के लिए दुनिया की सिर्फ 2% जमीन है। अक्सर इसके लिए गरीबी, अशिक्षा या उत्तर प्रदेश-बिहार जैसे राज्यों को दोष दिया जाता है, लेकिन असली कारण कुछ और ही है – भूगोल।
जब भी भारत की आबादी की बात होती है, लोग शिक्षा की कमी, गरीबी या स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी को जिम्मेदार ठहराते हैं। कुछ लोग तो सीधे उत्तर प्रदेश और बिहार पर पूरा दोष मढ़ देते हैं। यह सच है कि अगर ये दोनों राज्य अलग देश होते तो 37 करोड़ की आबादी के साथ दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश होते – अमेरिका और इंडोनेशिया से भी बड़ा।
लेकिन इतनी बड़ी आबादी के पीछे इन राज्यों के लोगों की कोई गलती नहीं है। असली कारण वह है जो लोगों के नियंत्रण से बाहर है – भूगोल।
हजारों साल से भारत की आबादी रही है सबसे ज्यादा
इतिहास में देखें तो एक साफ पैटर्न दिखता है। भारत की आबादी हमेशा से ही ज्यादा रही है – आज से 1000 साल पहले भी, 2000 साल पहले भी, यहां तक कि 4000 साल पहले भी।
ब्रिटिश अर्थशास्त्री एंगस मेडिसन के अनुसार, साल 1 ईस्वी से लेकर 1000 ईस्वी तक भारत की आबादी दुनिया की कुल आबादी का लगभग 30% थी। यानी उस समय दुनिया का हर तीसरा इंसान भारतीय था। आज सिर्फ हर छठा इंसान भारतीय है।
तो सच तो यह है कि अनुपात के हिसाब से भारत की आबादी पहले और भी ज्यादा थी।
इंडो-गंगा का मैदान: दुनिया की सबसे बड़ी उपजाऊ भूमि
आबादी सबसे ज्यादा भूगोल पर निर्भर करती है। जहां नदियां होती हैं, उपजाऊ जमीन होती है, वहीं मानव सभ्यताएं बसती हैं। दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताएं भी नदियों के किनारे ही बनीं – मेसोपोटामिया टाइग्रिस और यूफ्रेटीज के किनारे, मिस्र नील नदी के किनारे, चीन में पीली नदी के पास।
भारत को हजारों सालों से दुनिया का सबसे बड़ा लगातार उपजाऊ मैदान मिला हुआ है – इंडो-गंगा का मैदान। यह पाकिस्तान के सिंध से शुरू होकर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार से होते हुए बांग्लादेश के सुंदरबन तक जाता है।
इसका कुल क्षेत्रफल 7 लाख वर्ग किलोमीटर से ज्यादा है, जिसमें दुनिया की 11% आबादी रहती है।
हिमालय ने कैसे बनाया यह चमत्कार
इस मैदान के बनने की कहानी लगभग 5 करोड़ साल पहले शुरू हुई जब भारतीय टेक्टोनिक प्लेट गोंडवाना से अलग होकर यूरेशियन प्लेट से टकराई। इस टक्कर से हिमालय पर्वत श्रृंखला बनी और उसके नीचे एक गहरा गड्ढा बन गया।
वैज्ञानिकों के अनुसार, हिमालय और दक्कन की नदियों ने लगभग 17 लाख साल पहले से इस गड्ढे में मिट्टी और पत्थर के टुकड़े भरने शुरू कर दिए थे। इससे यहां धीरे-धीरे बेहद उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी (एल्युवियम) जमा होती रही।
पहाड़ियां इतनी ऊंची बनीं कि उन पर बर्फ भी बहुत ज्यादा जमी, जिसके पिघलने से कई नदियां बनीं। इतने छोटे क्षेत्र में इतनी सारी नदियों का संकेंद्रण दुनिया में कहीं नहीं मिलता।
तीन महान नदियां: गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु
इंडो-गंगा मैदान का नाम दो नदियों – सिंधु और गंगा – पर रखा गया है, लेकिन यहां तीन मुख्य नदियां हैं:
- गंगा जो दक्षिण की ओर बहती है
- ब्रह्मपुत्र जो पूर्व की ओर बहती है
- सिंधु जो कश्मीर और लद्दाख से होते हुए पाकिस्तान की ओर जाती है
सिंधु नदी के किनारे ही सिंधु घाटी सभ्यता की शुरुआत हुई थी। इतिहासकार टिम डायसन के अनुसार, अपने चरम पर सिंधु घाटी सभ्यता की आबादी 40 से 60 लाख थी – अपने समय की किसी भी सभ्यता से ज्यादा।
दुनिया भर में दिखता है यही पैटर्न
यही पैटर्न दुनिया के कोने-कोने में दिखता है – जहां उपजाऊ जमीन, वहां ज्यादा आबादी।
चीन का नॉर्थ चाइना प्लेन तीन नदियों से बना है और यहां लगभग 40 करोड़ लोग रहते हैं। नीदरलैंड्स यूरोप का सबसे घनी आबादी वाला देश है – प्रति वर्ग किलोमीटर 531 लोग, जबकि भारत में औसतन 484 लोग।
नीदरलैंड्स इतना छोटा है कि महाराष्ट्र के आधे से भी कम है, लेकिन दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कृषि निर्यातक है। यह उपजाऊ जमीन की क्षमता दर्शाता है।
भारत को तीन बड़े फायदे मिले
इंडो-गंगा मैदान को तीन अनोखे फायदे मिले जो दुनिया में कहीं नहीं:
1. मानसून का मौसम: हिमालय की पहाड़ियां दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाओं के लिए बाधा का काम करती हैं। ये हवाएं तिब्बत की ओर नहीं जा पातीं और भारत में ही रुक जाती हैं, जिससे भारी बारिश होती है।
2. ठंड से बचाव: ये पहाड़ियां मध्य एशिया से आने वाली ठंडी-सूखी हवाओं को रोक देती हैं, जिससे फसलें उग पाती हैं।
3. पानी के कई स्रोत: मिस्र में सिर्फ नील नदी है पानी का स्रोत। भारत में कई नदियां और मानसून दोनों हैं।
इसी वजह से यहां साल में दो से तीन फसलें उगाई जा सकती हैं, जो अन्य जगहों पर संभव नहीं।
इतिहास गवाह है: 2300 साल पुराना दस्तावेज
324 ईसा पूर्व के आसपास सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में यूनानी राजदूत मेगस्थनीज आया था। वापस जाकर उसने ‘इंडिका’ नामक किताब लिखी, जो प्राचीन विश्व में भारत पर सबसे विस्तृत किताब थी।
मेगस्थनीज ने लिखा: “भारत में साल में दो फसलें होती हैं। भारत में कभी अकाल नहीं पड़ता और न ही कभी खाने की कमी होती है क्योंकि यहां गेहूं और धान दोनों उगते हैं – अगर एक खराब हो जाए तो दूसरी बचा लेती है।”
ब्रिटिश राज: एक दर्दनाक विसंगति
भारत के हजारों साल के इतिहास में ब्रिटिश काल एक भयानक विसंगति था। ब्रिटिश शासन के तहत भारत में 25 बड़े अकाल पड़े।
1770 से 1947 के बीच इन अकालों में 3 से 3.5 करोड़ भारतीय मारे गए – प्रथम विश्व युद्ध में मरने वालों (85 लाख) से चार गुना ज्यादा।
- 1770 का बंगाल अकाल: बंगाल की एक-तिहाई आबादी खत्म, 1 करोड़ मौतें
- 1876-78 का महा अकाल: 70-80 लाख मौतें
- 1943 का बंगाल अकाल: 30 लाख मौतें
1943 का अकाल इसलिए हुआ क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने द्वितीय विश्व युद्ध के लिए अनाज का भंडारण शुरू कर दिया और भारत से बाहर भेज दिया।
आजादी के बाद: हरित क्रांति का चमत्कार
आजादी मिलने के बाद भारत में कभी अकाल नहीं पड़ा। 1947 से 1981 तक आबादी दोगुनी हो गई और 2001 में 100 करोड़ पार कर गई।
1960 में हरित क्रांति शुरू हुई। 1968 में इतना गेहूं हुआ कि रखने की जगह कम पड़ गई और इसे स्कूलों और थिएटरों में रखना पड़ा।
अब स्थिर हो रही है आबादी
भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) अब 1.9 पर आ गई है, जो प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से नीचे है। इसका मतलब कुछ दशकों बाद आबादी घटनी शुरू हो जाएगी।
संयुक्त राष्ट्र की भविष्यवाणी के अनुसार, भारत की आबादी 2060 के आसपास चरम पर पहुंचेगी और फिर घटनी शुरू होगी।
36 में से 31 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर या उससे नीचे आ गई है। केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में तो यह 1.3 से 1.5 के बीच है – यूरोपीय देशों के बराबर।
जलवायु परिवर्तन: सबसे बड़ा खतरा
दुर्भाग्य से यह सब अब खतरे में है। जलवायु परिवर्तन की वजह से:
- 2010 से 2019 के बीच हिमालयी ग्लेशियर पिछले दशक की तुलना में 65% तेजी से पिघल रहे हैं
- बर्फबारी बहुत कम हो गई है
- उत्तराखंड में सर्दियों में जंगल की आग लग रही है
- हिमालय में बर्फ का टिकाव पिछले 23 सालों में सबसे कम है
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने चेतावनी दी है कि अगर हालात ऐसे ही रहे तो 21वीं सदी के अंत तक एक-तिहाई से आधी बर्फ गायब हो जाएगी।
ग्लेशियर पिघलने से सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों में पानी कम हो जाएगा। 2022 में चरम मौसमी घटनाओं से 50 लाख एकड़ फसल प्रभावित हुई।
आम आदमी पर असर
यह खबर हर भारतीय को प्रभावित करती है। अगर जलवायु परिवर्तन को नहीं रोका गया तो इंडो-गंगा का मैदान, जो भारत के लिए वरदान रहा है, करोड़ों लोगों के लिए अभिशाप बन सकता है। खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है और पानी की कमी गंभीर समस्या बन सकती है।
क्या है पृष्ठभूमि
भारत की बड़ी आबादी को अक्सर समस्या माना जाता है, लेकिन इसके पीछे भौगोलिक कारण हैं जो हजारों साल पुराने हैं। हिमालय पर्वत श्रृंखला, इसकी नदियां और इंडो-गंगा का मैदान मिलकर दुनिया का सबसे उपजाऊ क्षेत्र बनाते हैं। राष्ट्रगान की पंक्ति “विंध्य हिमाचल यमुना गंगा उच्छल जलधि तरंग” इसी भौगोलिक वरदान का वर्णन करती है। लेकिन जलवायु परिवर्तन इस वरदान को खतरे में डाल रहा है।
मुख्य बातें (Key Points)
- भौगोलिक वरदान: भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा लगातार उपजाऊ मैदान (7 लाख वर्ग किमी) है, जहां दुनिया की 11% आबादी रहती है।
- ऐतिहासिक तथ्य: 1 ईस्वी से 1000 ईस्वी तक दुनिया की 30% आबादी भारत में रहती थी – हर तीसरा इंसान भारतीय था।
- प्रजनन दर में गिरावट: भारत की TFR अब 1.9 है (प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से नीचे), आबादी 2060 के बाद घटनी शुरू होगी।
- जलवायु खतरा: हिमालयी ग्लेशियर 65% तेजी से पिघल रहे हैं, 21वीं सदी के अंत तक एक-तिहाई से आधी बर्फ गायब हो सकती है।








