India Foreign Aid Budget: 1 फरवरी 2026 को पेश हुए बजट 2026-27 में भारत ने पड़ोसी देशों को दी जाने वाली मदद की तस्वीर चुपचाप लेकिन बड़े बदलाव के साथ बदल दी। सबसे बड़ा झटका बांग्लादेश को लगा, जिसकी फाइनेंशियल ऐड आधी कर दी गई, और ईरान के Chabahar Port प्रोजेक्ट के लिए इस बार एक रुपये का भी प्रावधान नहीं रखा गया। इसके उलट, कुल “Aid to Countries” का आउटले बढ़ाया गया और भूटान, नेपाल, श्रीलंका जैसे देशों के लिए फंड में बढ़ोतरी की गई।
देश की वित्त मंत्री Nirmala Sitharaman द्वारा पेश किए गए इस बजट में यह साफ दिखा कि किस पड़ोसी के साथ रिश्ता गर्मजोशी भरा रहेगा और किसके साथ दूरी बढ़ती दिख रही है। बांग्लादेश के लिए 50% की कटौती और छाबहार पोर्ट पर फंडिंग को “जीरो” कर देना, दोनों फैसले एक साथ मिलकर भारत की पड़ोस नीति के बदले हुए मूड की ओर इशारा करते हैं।
आम पाठक के लिए सीधे शब्दों में कहें तो इस बजट की लाइनों के बीच यह तय होता दिख रहा है कि आने वाले समय में भारत किन पड़ोसियों पर ज्यादा भरोसा करेगा और किनके साथ रिश्ते संभलकर चलाएगा।
बांग्लादेश की मदद आधी, रिश्तों में आई ठंडक साफ दिखाई दी
बजट 2026-27 में बांग्लादेश के लिए दी जाने वाली मदद पर सीधी कैंची चली है। पिछले साल के बजट अनुमान में बांग्लादेश के लिए 120 करोड़ रुपये रखे गए थे, जिन्हें अब घटाकर सिर्फ 60 करोड़ रुपये कर दिया गया है। यानी एक झटके में 50% की कटौती।
नई दिल्ली और ढाका के रिश्ते, जो कभी बेहद करीबी और भरोसे पर टिका साझेदारी मॉडल माने जाते थे, अगस्त 2024 के बाद से बदलते दिखे। उस समय मोहम्मद यूनुस की अगुआई में वहां अंतरिम सरकार बनी और शेख हसीना के बांग्लादेश छोड़ने के बाद सियासी समीकरण पूरी तरह बदल गए।
बांग्लादेश के साथ इस वक्त “तनावपूर्ण माहौल” चल रहा है और रिश्ते तनावपूर्ण हैं। ऐसे माहौल में मदद को आधा कर देना सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी बनकर उभरता है कि भारत अब ढाका के साथ अपने कार्ड सावधानी से खेलना चाहता है।
कुल Aid to Countries बढ़ा, लेकिन पुराने स्तर से अभी नीचे
एक तरफ बांग्लादेश पर कटौती हुई, लेकिन “Aid to Countries” के नाम से चलने वाले कुल आउटले को बढ़ाया गया है। यह मद अब बढ़कर 5,686 करोड़ रुपये कर दिया गया है, जो पिछले साल के बजट अनुमान 5,483 करोड़ रुपये से करीब 4% ज्यादा है।
हालांकि, यह रकम 2025-26 के रिवाइज्ड एस्टीमेट 5,785 करोड़ रुपये से अभी भी कम है। यानी कुल लिफाफा थोड़ा मोटा जरूर हुआ है, लेकिन अभी भी पिछले साल संशोधित रूप में जो खर्च दिखा था, उससे थोड़ा पीछे है।
आम आदमी की भाषा में कहें तो विदेश मदद के लिए सरकार ने थोड़ा ज्यादा पैसा तो रखा है, लेकिन उसे सभी देशों में बराबर नहीं बांटा, बल्कि अपने हिसाब से कुछ पड़ोसियों पर फोकस बढ़ाया और कुछ पर ब्रेक लगाया है।
छाबहार पोर्ट फंडिंग अचानक जीरो, जबकि समझौता 10 साल का
बजट के ‘फाइन प्रिंट’ में सबसे बड़ा सरप्राइज ईरान के छाबहार पोर्ट को लेकर सामने आया। बजट दस्तावेज के मुताबिक 2026-27 में छाबहार प्रोजेक्ट के लिए कोई एलोकेशन नहीं रखा गया है।
यही छाबहार प्रोजेक्ट है, जिस पर 2024-25 में भारत ने 400 करोड़ रुपये खर्च किए थे। 2025-26 के लिए शुरू में 100 करोड़ रुपये बजट में रखे गए थे, जिन्हें बाद में रिवाइज्ड एस्टीमेट में बढ़ाकर फिर 400 करोड़ रुपये कर दिया गया। अब उसी प्रोजेक्ट के लिए 2026-27 में राशि सीधे शून्य पर ला दी गई है।
यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है, जब 2024 में भारत ने ईरान के साथ 10 साल का समझौता किया था, जिसके तहत छाबहार के Shahid Beheshti Terminal को ऑपरेट किया जाना है। यानी जिस टर्मिनल को भारत खुद चलाने पर सहमत हुआ, उस पर अभी के लिए बजट की धारा रोक दी गई है।
रणनीतिक लिहाज़ से यह प्रोजेक्ट इसलिए अहम माना गया है क्योंकि इसके जरिए भारत को पाकिस्तान को बायपास करके अफगानिस्तान और Central Asia तक कनेक्टिविटी मिलती है। यही वजह है कि छाबहार को सिर्फ एक पोर्ट नहीं, बल्कि भारत की पूरी क्षेत्रीय रणनीति की कुंजी के तौर पर देखा जाता रहा है।
यूएस का 25% टैरिफ, ईरान-रूस पर कड़ा रूख और उसका साया
इसी साल अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने तेहरान के साथ ट्रेड करने वाले देशों पर 25% टैरिफ लगाने का ऐलान किया था। यानी जो देश ईरान की राजधानी तेहरान के साथ व्यापार करेंगे, उन पर अतिरिक्त 25% शुल्क का बोझ डाला जा सकता है।
याद रहे कि ट्रंप लगातार चेतावनियां देते रहे हैं कि जो भी देश रूस और ईरान जैसे “उनके दुश्मन देशों” के साथ व्यापार, डील या पार्टनरशिप करेगा, उस पर उनकी सख्त नज़र रहेगी।
इसी पृष्ठभूमि में जब भारत के बजट में छाबहार पोर्ट के लिए फंडिंग अचानक जीरो कर दी जाती है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह सिर्फ एक साल की “पॉज” है या फिर ईरान के साथ प्रोजेक्ट के स्केल और स्पीड पर दोबारा सोचने का संकेत है।
भूटान सबसे बड़ा लाभार्थी, नेपाल-श्रीलंका की झोली भी भरी
जहां बांग्लादेश और छाबहार पर ब्रेक लगा, वहीं कुछ पड़ोसी देशों के लिए बजट में खुलकर जेब ढीली की गई।
सबसे ज्यादा मदद पाने वाला देश भूटान ही बना हुआ है। भूटान के लिए एलोकेशन में करीब 6% की बढ़ोतरी कर इसे लगभग 288.55 करोड़ रुपये के आसपास पहुंचाया गया है।
नेपाल को मिलने वाली मदद में करीब 14% की बढ़ोतरी हुई है और अब नेपाल को 800 करोड़ रुपये मिलेंगे। श्रीलंका के लिए 400 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जो पहले के मुकाबले लगभग एक-तिहाई (1/3) ज्यादा है।
इन तीनों देशों के लिए बढ़ा हुआ बजट यह दिखाता है कि भारत अभी भी हिमालयी और हिंद महासागर के कुछ अहम पड़ोसियों के साथ इंफ्रास्ट्रक्चर, कनेक्टिविटी और भरोसे के रिश्तों को मजबूती देने की कोशिश में है – कम से कम बजट की भाषा तो यही कह रही है।
मालदीव-म्यांमार पर कट, मॉरीशियस स्थिर, अफगानिस्तान के लिए ह्यूमैनिटेरियन फंड
एक तरफ कुछ देशों की मदद बढ़ाई गई, तो दूसरी तरफ कुछ पर सीधी कटौती भी दिखी।
Maldives को दी जाने वाली मदद में करीब 8% की कटौती की गई है और अब उसे 50 करोड़ रुपये मिलेंगे। Myanmar के लिए एलोकेशन में करीब 14% की कटौती कर इसे 300 करोड़ रुपये कर दिया गया है।
इसके उलट, Mauritius के लिए 10% की बढ़ोतरी के बाद भी 550 करोड़ रुपये के ही एलोकेशन रखे गए हैं। यानी इस छोटे लेकिन रणनीतिक रूप से अहम द्वीपीय देश के साथ भारत सहायता स्तर स्थिर लेकिन मजबूत रखना चाहता है।
अफगानिस्तान के लिए एड सपोर्ट 150 करोड़ रुपये पर ही स्थिर रखा गया है। वीडियो के अनुसार यह मदद ज्यादातर ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस से जुड़ी है, यानी वहां की मानवीय स्थिति को ध्यान में रखकर दी जा रही सहायता।
एक नज़र में कौन-सा देश कितना, पूरी लिस्ट
अगर दी गई रकमों को एक जगह रखकर देखें तो तस्वीर कुछ यूं बनती है:
- भूटान – लगभग 288.55 करोड़ रुपये
- अफगानिस्तान – 150 करोड़ रुपये
- बांग्लादेश – 60 करोड़ रुपये
- नेपाल – 800 करोड़ रुपये
- श्रीलंका – 400 करोड़ रुपये
- म्यांमार – 300 करोड़ रुपये
- Mongolia – 25 करोड़ रुपये
- मॉरीशियस – 550 करोड़ रुपये
- Seychelles – 19 करोड़ रुपये
मालदीव के लिए पहले 8% कटौती के बाद 50 करोड़ रुपये का जिक्र किया गया है, जबकि बाद की सूची में 550 करोड़ रुपये लिखे होने से एक विरोधाभास दिखता है। खबर की सटीकता के लिहाज से यहां वही आंकड़े लिए गए हैं, जिनके साथ कटौती और प्रतिशत का संदर्भ साफ-साफ जुड़ा हुआ है।
ये आंकड़े सिर्फ नंबर नहीं हैं; इनसे यह भी झलकता है कि भारत किस पड़ोसी के साथ किस स्तर पर जुड़ाव बनाए रखना चाहता है और कहां सावधानी या दूरी बढ़ रही है।
आम आदमी के लिए मायने: कूटनीति, सीमा और क्षेत्रीय माहौल पर असर
आम पाठक के लिए यह सवाल स्वाभाविक है कि पड़ोसी देशों को जा रही इस मदद का उसके जीवन से क्या संबंध है।
सरल भाषा में कहें तो इन पैसों के जरिए भारत अपने पड़ोस में भरोसे, राजनीतिक स्थिरता और संवाद की ज़मीन तैयार करता है। जब किसी पड़ोसी देश की अर्थव्यवस्था संकट में होती है, तो वहां अस्थिरता, शरणार्थी संकट या सुरक्षा चुनौतियां भी बढ़ सकती हैं। ऐसे में मदद के जरिए रिश्तों को संभालना भारत के अपने हित में भी होता है।
दूसरी तरफ, जब किसी देश की मदद घटती है या किसी अहम प्रोजेक्ट की फंडिंग अचानक शून्य पर चली जाती है, तो वह भी एक संदेश होता है, जिसे वहां की सरकारें और दुनिया भर के राजनयिक बड़े ध्यान से पढ़ते हैं।
तनावपूर्ण दिल्ली-ढाका रिश्तों के बीच कड़ा आर्थिक संदेश
बांग्लादेश के संदर्भ में यह बजट साफ तौर पर एक “कड़ा आर्थिक संदेश” भेजता दिख रहा है। वीडियो में साफ कहा गया है कि बांग्लादेश के साथ इस वक्त रिश्ते तनावपूर्ण हैं और माहौल बदला हुआ है।
अगस्त 2024 के बाद, जब मोहम्मद यूनुस की अगुआई में अंतरिम सरकार बनी और शेख हसीना देश छोड़कर चली गईं, तब से नई दिल्ली और ढाका के बीच जो भरोसे वाला पुराना समीकरण था, उसमें दरार आई।
ऐसे समय में मदद को आधा कर देना सिर्फ फाइनेंशियल डिसीजन नहीं, बल्कि यह बताता है कि भारत अब बांग्लादेश की नई सत्ता संरचना को लेकर इंतजार और निगरानी की नीति पर चल रहा है।
छाबहार पर पॉज या नई लाइन? संदेश दो तरफ जाता दिख रहा है
छाबहार पोर्ट के लिए फंडिंग अचानक जीरो होने से दो तरह के संदेश एक साथ जाते हैं।
पहला, भारत ने फिलहाल बजट में इस प्रोजेक्ट पर ब्रेक लगाया है, जबकि यह पोर्ट अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया तक भारत की पहुंच के लिए बेहद अहम माना जाता है।
दूसरा, उसी वक्त अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ व्यापार पर 25% टैरिफ का ऐलान और रूस-ईरान के साथ पार्टनरशिप करने वालों के खिलाफ लगातार चेतावनियां, भारत जैसे देशों पर अतिरिक्त दबाव भी बनाती हैं।
इन दोनों फैक्टर्स के बीच चाबहार पर “जीरो फंडिंग” का फैसला यह दिखाता है कि भारत अभी इस मोर्चे पर बहुत सतर्क चाल चल रहा है।
जानें पूरा मामला
सार में, बजट 2026-27 के जरिए भारत ने अपनी पड़ोस नीति के कई पेंच एक साथ कस दिए हैं। कुल “Aid to Countries” को बढ़ाकर 5,686 करोड़ रुपये किया गया, लेकिन इस बढ़ोतरी का फायदा समान रूप से नहीं बांटा गया।
भूटान, नेपाल, श्रीलंका, मॉरीशियस जैसे देशों को ज्यादा या स्थिर मदद देकर भारत ने अपने भरोसेमंद साझेदारों को मजबूत मैसेज दिया। वहीं बांग्लादेश की सहायता आधी कर दी गई और छाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट के लिए फंडिंग जीरो पर ले जाकर, ईरान और बांग्लादेश – दोनों मोर्चों पर भारत ने अपने विकल्प खुले रखते हुए सावधानी भरा रुख अपनाया है।
यही कारण है कि यह बजट केवल आंकड़ों की लिस्ट नहीं, बल्कि भारत की बदलती क्षेत्रीय प्राथमिकताओं का दस्तावेज भी बनकर सामने आया है।
मुख्य बातें (Key Points)
- बांग्लादेश की फाइनेंशियल मदद 120 करोड़ से घटाकर 60 करोड़ रुपये कर दी गई, यानी 50% कटौती।
- कुल “Aid to Countries” का आउटले बढ़कर 5,686 करोड़ रुपये हुआ, लेकिन यह पिछले साल के रिवाइज्ड एस्टीमेट 5,785 करोड़ से कम है।
- ईरान के छाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट के लिए 2026-27 में कोई फंडिंग नहीं रखी गई, जबकि 2024-25 और 2025-26 में 400-400 करोड़ रुपये तक खर्च/प्रावधान था।
- भूटान, नेपाल, श्रीलंका, मॉरीशियस जैसे देशों की मदद बढ़ी या मजबूत रही; मालदीव और म्यांमार की सहायता में कटौती की गई।
- अफगानिस्तान के लिए 150 करोड़ रुपये की ह्यूमैनिटेरियन मदद बरकरार रखी गई, जो वहां की मानवीय स्थिति को देखते हुए दी जा रही है।








