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The News Air - Breaking News - JNU Protest: UGC नियमों पर SC के फैसले के खिलाफ विरोध, फूंका पुतला

JNU Protest: UGC नियमों पर SC के फैसले के खिलाफ विरोध, फूंका पुतला

सुप्रीम कोर्ट ने UGC 2026 नियमों पर लगाई रोक, 2012 के पुराने नियम लागू रहेंगे, छात्रों ने इक्विटी कमेटी की स्वतंत्रता की मांग की।

The News Air Team by The News Air Team
शुक्रवार, 30 जनवरी 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, नौकरी, राष्ट्रीय
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JNU Protest
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UGC Guidelines Supreme Court : दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) में यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हंगामा मचा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इन नियमों को लागू होने से रोक दिया है, यानी 2012 वाले पुराने नियम ही चलेंगे। इस फैसले के खिलाफ JNU कैंपस के साबरमती हॉस्टल के बाहर छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने ब्राह्मणवाद का प्रतीकात्मक पुतला जलाया और जोरदार नारेबाजी की।

छात्रों ने फूंका ब्राह्मणवाद का पुतला

छात्रों का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला ब्राह्मणवाद और मनुवाद को समर्थन देता है और जातिगत भेदभाव रोकने की कोशिश को कमजोर करता है। इस विरोध प्रदर्शन में करीब 50 छात्र शामिल हुए।

साबरमती हॉस्टल के बाहर हुए इस प्रदर्शन में छात्रों ने यूजीसी के नए नियमों के समर्थन में नारे लगाए। उनका कहना था कि ये नियम सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए जरूरी थे।

छात्रों ने आरोप लगाया कि पुराने नियमों में वंचित वर्गों के खिलाफ भेदभाव रोकने के लिए पर्याप्त प्रावधान नहीं हैं।

UGC के नए नियम 2026 में क्या था?

यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन ने उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के लिए नियम 2026 लागू किया था। इस नियम का उद्देश्य था कि विश्वविद्यालयों में जाति, लिंग और विकलांगता के आधार पर भेदभाव को रोका जाए और प्रत्येक छात्र को समान अवसर मिले।

यूजीसी के नए नियम के अनुसार हर विश्वविद्यालय और कॉलेजों में इक्विटी कमेटी बनानी थी। यह कमेटी एससी, एसटी, ओबीसी या किसी भी वंचित वर्ग के छात्रों और शिक्षकों के खिलाफ भेदभाव की शिकायतों का निपटारा करेगी।

नियम में यह भी कहा गया था कि शिकायतों का निपटारा समयबद्ध तरीके से होना चाहिए। यूजीसी का तर्क था कि इससे विश्वविद्यालय में समानता और न्याय सुनिश्चित होगा।

जनरल कैटेगरी के छात्रों ने किया था विरोध

लेकिन नियमों पर देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए। कई जनरल कैटेगरी के छात्रों ने इसका विरोध किया था। उनका आरोप था कि नए नियम का दुरुपयोग किया जा सकता है और इससे कुछ वर्गों के अधिकार पर असर पड़ सकता है।

विरोधियों का कहना था कि नए नियम अस्पष्ट हैं और इससे कई गलतफहमियां पैदा हो सकती हैं। इसका गलत उपयोग हो सकता है।

मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और जनरल कैटेगरी के कुछ छात्रों ने याचिका दायर की।

सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

29 जनवरी को जब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई तो मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस फैसले पर रोक लगा दी। कोर्ट ने फैसला दिया कि नए नियम फिलहाल लागू नहीं होंगे और पुराने 2012 वाले नियम ही लागू रहेंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नियम स्पष्ट नहीं हैं और लागू होने पर गलत उपयोग की संभावना है। कोर्ट ने इस मामले में विस्तृत सुनवाई के लिए समय मांगा।

अदालत ने कहा कि जब तक पूरी सुनवाई नहीं हो जाती, तब तक पुरानी व्यवस्था ही चलेगी।

छात्रों की मांग: इक्विटी कमेटी को मिले स्वतंत्रता

इसी को लेकर JNU में छात्रों ने साबरमती हॉस्टल के बाहर प्रदर्शन किया। छात्रों ने नारेबाजी की और सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना की।

प्रदर्शन में छात्रों ने जोर दिया कि यूजीसी के नए नियम में इक्विटी कमेटी को पूर्ण स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि कमेटी स्वतंत्र रहेगी तो विश्वविद्यालय में भेदभाव रोकने में मदद मिलेगी।

छात्रों का यह भी कहना था कि न्यायपूर्ण फैसलों के लिए नियमों में किसी प्रकार का राजनीतिक या सामाजिक दबाव नहीं होना चाहिए।

क्या कहते हैं विरोधी छात्र?

दूसरी तरफ, जो छात्र नए नियमों का विरोध कर रहे थे, उनका कहना है कि ये नियम अस्पष्ट हैं। इनमें यह साफ नहीं है कि “भेदभाव” की परिभाषा क्या होगी।

उनका डर है कि कोई भी छात्र किसी भी बात को लेकर भेदभाव का आरोप लगा सकता है। इससे निर्दोष छात्रों और शिक्षकों पर गलत आरोप लग सकते हैं।

विरोधी छात्रों का यह भी कहना है कि ऐसी कमेटियां राजनीतिक औजार बन सकती हैं।

JNU में क्यों हुआ विरोध?

JNU में परंपरागत रूप से सामाजिक न्याय और वंचित वर्गों के अधिकारों को लेकर सक्रियता रही है। छात्र संगठन यहां बहुत सक्रिय हैं।

यही कारण है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगाई तो JNU के छात्रों ने तुरंत विरोध किया। उनका मानना है कि यह फैसला सामाजिक न्याय की लड़ाई को कमजोर करता है।

JNU के कई छात्र संगठन SC, ST और OBC समुदायों से आते हैं। उनके लिए यह व्यक्तिगत मुद्दा भी है।

2012 के नियम में क्या है?

2012 के यूजीसी नियमों में भी भेदभाव के खिलाफ प्रावधान हैं, लेकिन वे उतने विस्तृत नहीं हैं जितने 2026 के नए नियम थे।

पुराने नियमों में एंटी-डिस्क्रिमिनेशन सेल का प्रावधान है, लेकिन इक्विटी कमेटी की तरह इसकी शक्तियां परिभाषित नहीं हैं।

छात्रों का आरोप है कि पुराने नियमों के तहत शिकायतों का निपटारा ठीक से नहीं होता और कई मामले लटके रहते हैं।

19 मार्च को अगली सुनवाई

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में 19 मार्च 2026 को सुनवाई होनी है। अब देखना होगा कि 19 मार्च को सुप्रीम कोर्ट क्या फैसला देता है।

दोनों पक्ष अपनी-अपनी दलीलें पेश करेंगे। कोर्ट को यह तय करना होगा कि नए नियम संवैधानिक हैं या नहीं और क्या इनका दुरुपयोग हो सकता है।

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जब तक कोर्ट का अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक पुराने 2012 के नियम ही लागू रहेंगे।

देशभर के विश्वविद्यालयों पर असर

यह मामला सिर्फ JNU तक सीमित नहीं है। देशभर के सभी विश्वविद्यालयों में यूजीसी के इन नियमों को लागू करना था।

अब सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद कोई भी विश्वविद्यालय नई इक्विटी कमेटी नहीं बना सकता। कोर्ट के अंतिम फैसले का इंतजार करना होगा।

यह मुद्दा उच्च शिक्षा में सामाजिक न्याय और समानता के बड़े सवाल से जुड़ा है। कोर्ट का फैसला दूरगामी प्रभाव डालेगा।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं

इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों ने भी अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं। कुछ दल नए नियमों के समर्थन में हैं तो कुछ विरोध में।

दलित और आदिवासी समुदायों के संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना की है। उनका कहना है कि यह फैसला सामाजिक न्याय के खिलाफ है।

दूसरी तरफ, कुछ संगठनों ने कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि नए नियम अस्पष्ट थे और इनका दुरुपयोग हो सकता था।


मुख्य बातें (Key Points)
  • JNU में UGC के नए नियमों पर SC के फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन
  • छात्रों ने ब्राह्मणवाद का प्रतीकात्मक पुतला जलाया
  • सुप्रीम कोर्ट ने UGC 2026 नियमों पर रोक लगाई
  • 2012 के पुराने नियम ही लागू रहेंगे
  • 19 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई होगी
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