चीन की हथियार सप्लाई ने बदली जंग की तस्वीर
बीते 72 घंटों में जो खबरें सामने आई हैं, वे वाशिंगटन के लिए चिंता का सबब बन गई हैं। सीआईए की रिपोर्ट के अनुसार चीन के पास केवल 600 हाइपरसोनिक मिसाइलें हैं, लेकिन ईरान की तरफ से दावा किया जा रहा है कि उसे 3000 से अधिक हाइपरसोनिक मिसाइलें मिल चुकी हैं।
ये हाइपरसोनिक मिसाइलें बेहद महंगी और घातक होती हैं। इनकी खासियत यह है कि ये किसी भी मिसाइल डिफेंस सिस्टम को चकमा देने में सक्षम होती हैं। जब अमेरिकी सेना ने मिडिल ईस्ट में ईरान की पूरी घेराबंदी कर रखी है, ऐसे में चीन का यह कदम अमेरिकी रणनीति के लिए बड़ा झटका है।
DF-17: वाशिंगटन तक मार करने की क्षमता
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या चीन ने वाकई अपनी मीडियम रेंज की इंटरकॉन्टिनेंटल DF-17 मिसाइल ईरान को दे दी है? यह मिसाइल 12,000 किलोमीटर तक की मार रखती है। इसका मतलब है कि तेहरान से दागी गई मिसाइल न्यूयॉर्क, वाशिंगटन या बोस्टन तक हमला कर सकती है।
अब तक ईरान के पास ऐसी क्षमता नहीं थी। लेकिन चीन के इस हथियार सौदे ने पूरे समीकरण को बदल दिया है। अमेरिका जो अब तक ईरान पर हमले की योजना बना रहा था, अब उसे दोबारा सोचना पड़ रहा है।
अमेरिकी घेराबंदी के बावजूद चीन का साहसिक कदम
मिडिल ईस्ट के हर कोने में अमेरिकी सैन्य अड्डे मौजूद हैं। ईरान की हर सीमा पर अमेरिकी फौजों की तैनाती है। USS Abraham Lincoln समेत अमेरिकी युद्धपोत खाड़ी क्षेत्र में तैनात हैं। लेकिन इन सबके बावजूद चीन ने खुलकर ईरान का साथ देने का फैसला किया है।
पहली बार चीन किसी कूटनीति के तहत नहीं, बल्कि सीधे युद्ध की तैयारी में शामिल हो गया है। इसके पीछे चीन की रणनीति साफ है – अगर युद्ध की परिस्थितियां बनती हैं, तो दुनिया के वे तमाम देश जो अमेरिका की टैरिफ नीति से परेशान हैं, वे चीन के साथ खड़े हो सकते हैं।
इजराइल और रूस का समीकरण
इजराइल ने रूस को समझा दिया है कि वह इस युद्ध में न कूदे। लेकिन चीन इजराइल और अमेरिका की पहुंच से बाहर है। पहली बार चीन ने यह संकेत दिया है कि वह ईरान के साथ पूरी तरह से खड़ा है।
यह सिर्फ हथियारों की सप्लाई नहीं है। यह एक बड़े भू-राजनीतिक बदलाव का संकेत है। चीन यह मानने लगा है कि अगर वह इस युद्ध में शामिल होता है, तो न्यू वर्ल्ड ऑर्डर में उसकी भूमिका निर्णायक हो सकती है।
भारत-यूरोप का ऐतिहासिक व्यापार समझौता
इसी बीच भारत और यूरोपीय संघ के बीच एक ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौता (FTA) होने जा रहा है। यूरोपीय संघ की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा है।
यह समझौता 2 बिलियन यानी 200 करोड़ लोगों का एक खुला बाजार तैयार करेगा। यूरोपीय संघ की अर्थव्यवस्था 22 से 25 ट्रिलियन डॉलर की है, जबकि भारत की अर्थव्यवस्था 4 ट्रिलियन डॉलर की है। दोनों को मिलाकर यह दुनिया की कुल GDP का लगभग 25% हिस्सा होगा।
अमेरिका के टैरिफ वार का जवाब
जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार भारत पर टैरिफ प्रतिबंध लगा रहे हैं, ऐसे में भारत ने अमेरिका का विकल्प खोज लिया है। यूरोपीय संघ के साथ यह समझौता भारत के निर्यातकों के लिए ऑक्सीजन की तरह होगा।
भारत ने पिछले साल यूरोपीय संघ को 76 बिलियन डॉलर का माल भेजा था, जबकि यूरोप से 61 बिलियन डॉलर का माल आया था। यानी भारत को व्यापारिक लाभ हुआ है। अब यह समझौता होने के बाद यह आंकड़ा और बढ़ेगा।
गणतंत्र दिवस पर यूरोपीय संघ की विशेष उपस्थिति
26 जनवरी 2026 को भारत के गणतंत्र दिवस पर यूरोपीय संघ की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन विशेष अतिथि के रूप में मौजूद थीं। यह भारत-यूरोप संबंधों की मजबूती का प्रतीक है।
27 जनवरी को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा के बीच शिखर सम्मेलन होगा, जहां इस समझौते पर मोहर लगेगी।
क्या-क्या सस्ता होगा भारत में?
इस समझौते के बाद यूरोप से आने वाली कारों पर टैरिफ 110% से घटकर 40% तक आ जाएगा। वाइन, मशीनरी, इस्पात, पेट्रोलियम उत्पाद और दवाएं भी सस्ती होंगी।
हालांकि, भारत ने कृषि और डेयरी उत्पादों को इस समझौते से बाहर रखा है, क्योंकि ये भारत के लिए संवेदनशील क्षेत्र हैं।
यूरोप की चीन पर निर्भरता कम करने की रणनीति
यूरोपीय संघ चीन पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है। भारत उसके लिए एक बेहतर विकल्प है। भारत भी अमेरिका के साथ आर्थिक संबंधों में आई दिक्कतों के बाद नए बाजार खोज रहा है।
यह समझौता दोनों के लिए फायदेमंद है। यूरोप को भारत का विशाल बाजार मिलेगा, और भारत को यूरोप की तकनीक और निवेश मिलेगा।
ब्रिक्स की अगुवाई में भारत
इस वक्त भारत ब्रिक्स की अगुवाई कर रहा है। ईरान भी ब्रिक्स में शामिल हो चुका है। ब्रिक्स देशों की कुल ताकत दुनिया की कुल शक्ति का लगभग 40% है।
अमेरिका चाहता था कि ब्रिक्स देश कोई वैकल्पिक मुद्रा न लाएं। लेकिन अब भारत के रिजर्व बैंक का सुझाव है कि डिजिटल इकोनॉमी के जरिए व्यापार किया जाए। इसके लिए किसी नई मुद्रा की जरूरत नहीं है।
डॉलर की घटती भूमिका
भारत के फॉरेक्स रिजर्व में डॉलर की हिस्सेदारी 75% से घटकर अब 38-39% रह गई है। यह डी-डॉलराइजेशन की दिशा में एक बड़ा कदम है।
जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप डॉलर का वर्चस्व चाहते हैं, उसी समय दुनिया के तमाम देश डॉलर से हटकर अपने व्यापार को देख रहे हैं।
भारत, चीन, पाकिस्तान एक साथ?
संयुक्त राष्ट्र में ईरान के मुद्दे पर भारत, चीन और पाकिस्तान ने अमेरिकी रुख का विरोध किया। यह एक अजीब लेकिन महत्वपूर्ण घटनाक्रम था।
यह बदलती हुई परिस्थितियों का संकेत है। टैरिफ वार ने दुनिया के समीकरण बदल दिए हैं। अब पुराने दोस्त और दुश्मन के रिश्ते नए सिरे से परिभाषित हो रहे हैं।
अमेरिका की मुश्किलें बढ़ीं
अमेरिका के सामने अब कई मोर्चे खुल गए हैं:
- ईरान के पास अब चीनी हाइपरसोनिक मिसाइलें हैं
- भारत यूरोप के साथ मिलकर नया आर्थिक गठबंधन बना रहा है
- ब्रिक्स देश डॉलर से हटकर नई व्यवस्था बना रहे हैं
- यूरोपीय देश भी अमेरिका की टैरिफ नीति से नाखुश हैं
नाटो का भविष्य अनिश्चित
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप नाटो को खत्म करना चाहते हैं। यूरोपीय संघ के ज्यादातर देश नाटो के सदस्य हैं। अमेरिका यूरोपीय संघ को चेता रहा है कि वह भारत के साथ न जाए, लेकिन यूरोप ने अमेरिका की नहीं सुनी।
जर्मनी, इटली और फ्रांस जैसे बड़े देश अमेरिका की नीतियों का विरोध कर रहे हैं। न्यू वर्ल्ड ऑर्डर को लेकर कनाडा के प्रधानमंत्री ने दावोस में जो भाषण दिया, उसमें भी अमेरिका की एकतरफा नीतियों की आलोचना की गई।
हथियारों का कारोबार और युद्ध
स्टॉकहोम की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में हथियार बनाने वाली कंपनियों को युद्ध से सबसे ज्यादा मुनाफा होता है। इसलिए टैरिफ वार और असली युद्ध दोनों साथ-साथ चल रहे हैं।
यह सिर्फ व्यापार का मामला नहीं है। यह सत्ता, प्रभाव और वैश्विक नेतृत्व की लड़ाई है।
चीन की रणनीति क्या है?
चीन जानता है कि अगर युद्ध होता है, तो उसके खिलाफ अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, ताइवान और फिलीपींस खड़े होंगे। लेकिन दूसरा सच यह भी है कि टैरिफ वार ने भारत, चीन, रूस, ईरान, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे ब्रिक्स देशों को करीब ला दिया है।
चीन की रणनीति यह है कि युद्ध की परिस्थितियों में साथ खड़े होकर आर्थिक नीतियों को अपने देश के अनुकूल बनाया जा सकता है।
भारत की स्थिति
भारत इस वक्त अमेरिका के साथ नहीं है, क्योंकि अमेरिका भारत के साथ नहीं है। अमेरिका जिन देशों के साथ खड़ा है, भारत उनका विरोध करता है – जैसे पाकिस्तान।
लेकिन भारत चीन को भी पूरी तरह छोड़ नहीं सकता, क्योंकि ब्रिक्स, SCO और आसियान जैसे मंचों पर दोनों देश साथ हैं। भारत की चीन पर निर्भरता भी है – 100 बिलियन डॉलर से ज्यादा का व्यापारिक घाटा सहते हुए भी भारत चीन से कच्चा माल मंगा रहा है।
क्या होगा आगे?
अगले 24-48 घंटों में जब भारत और यूरोपीय संघ के बीच FTA पर समझौता हो जाएगा, तो अमेरिका क्या करेगा? क्या अमेरिका ईरान पर हमला करेगा, जबकि अब ईरान के पास चीनी हाइपरसोनिक मिसाइलें हैं?
ये सवाल अब सबसे बड़े हैं। दुनिया एक नए दौर में प्रवेश कर रही है, जहां पुराने गठबंधन टूट रहे हैं और नए बन रहे हैं।
जानें पूरा मामला
यह पूरा मामला तीन बड़े मुद्दों के इर्द-गिर्द घूम रहा है:
पहला, अमेरिका की टैरिफ नीति ने दुनिया भर के देशों को परेशान कर दिया है। भारत, यूरोप, चीन सभी अमेरिका के विकल्प खोज रहे हैं।
दूसरा, ईरान पर अमेरिकी हमले की आशंका के बीच चीन ने खुलकर ईरान का साथ दिया है। यह सिर्फ हथियारों की सप्लाई नहीं, बल्कि एक बड़े भू-राजनीतिक बदलाव का संकेत है।
तीसरा, भारत-यूरोप का व्यापार समझौता एक नई वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की शुरुआत हो सकता है, जहां अमेरिका का वर्चस्व कम होगा।
मुख्य बातें (Key Points)
- चीन ने ईरान को 3000 से अधिक हाइपरसोनिक मिसाइलें और DF-17 इंटरकॉन्टिनेंटल मिसाइलें दी हैं
- DF-17 मिसाइल 12,000 किलोमीटर तक मार करने में सक्षम है, जो तेहरान से वाशिंगटन तक पहुंच सकती है
- भारत और यूरोपीय संघ के बीच 27 जनवरी को ऐतिहासिक FTA पर मोहर लगेगी
- यह समझौता 200 करोड़ लोगों का बाजार बनाएगा, जो दुनिया की GDP का 25% होगा
- भारत के फॉरेक्स रिजर्व में डॉलर की हिस्सेदारी 75% से घटकर 38-39% रह गई है
- यूरोप से आने वाली कारों पर टैरिफ 110% से घटकर 40% होगा
- अमेरिका की टैरिफ नीति के खिलाफ भारत, यूरोप और ब्रिक्स देश नए विकल्प खोज रहे हैं








