China Military Purge Zhang Youxia : चीन की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर सामने आया है। शी जिनपिंग ने अपने सबसे वरिष्ठ जनरल और सबसे करीबी सहयोगी जनरल झांग यूसिया को बर्खास्त कर दिया है। यूसिया जिनपिंग के बचपन के साथी रहे हैं और उन्हें चीन की सेना में नंबर दो का अधिकारी माना जाता था।
इस घटना को ‘पर्ज’ कहा जा रहा है – एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें अचानक पार्टी के प्रभावशाली नेताओं या सेना के जनरलों को हटा दिया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर ऐसा हुआ क्यों?
क्या है असली कारण? मीडिया में अटकलें
चीन के रक्षा मंत्रालय ने केवल इतना कहा है कि जनरल यूसिया को “अनुशासन और कानून तोड़ने के आरोप” में पद से हटाया गया है। लेकिन इसके पीछे की असली वजह क्या है, यह किसी को स्पष्ट रूप से नहीं पता।
वॉल स्ट्रीट जर्नल ने सूत्रों के हवाले से कुछ चौंकाने वाले आरोप लगाए हैं। अखबार के अनुसार, जनरल यूसिया पर अमेरिका को चीन के परमाणु कार्यक्रम की जानकारी लीक करने का आरोप है। इसके अलावा घूस लेने के भी आरोप लगे हैं – सेना के हार्डवेयर अपडेट के एक बड़े प्रोजेक्ट के दौरान घूस लेना और घूस लेकर एक व्यक्ति को रक्षा मंत्री बनाने का आरोप।
लेकिन बीबीसी, न्यूयॉर्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट ने इन आरोपों का जिक्र नहीं किया है। बीबीसी ने केवल इस बात पर जोर दिया कि यूसिया शी जिनपिंग के कितने करीबी थे।
कौन हैं जनरल झांग यूसिया?
जनरल यूसिया साधारण जनरल नहीं हैं। उन्हें शी जिनपिंग का सबसे विश्वासपात्र माना जाता था। दोनों के पिताओं ने 1949 के चीन के गृह युद्ध में भाग लिया था, जिसके बाद माओ की कम्युनिस्ट पार्टी ने सत्ता संभाली।
जिन लोगों के माता-पिता ने माओ के उस संघर्ष में भाग लिया, उन्हें ‘प्रिंसलिंग’ यानी राजकुमार कहा जाता है। इसलिए जिनपिंग और यूसिया को एक दूसरे का करीबी माना गया।
बीजिंग में जन्मे यूसिया 1968 में सेना में भर्ती हुए। 2012 में मिलिट्री कमीशन में शामिल हुए। उन वर्षों में चीन की सेना में आधुनिकीकरण का दौर था। यूसिया का तेजी से प्रमोशन हुआ और वे 2011 से जनरल के पद पर तैनात हो गए।
15 साल तक जनरल के पद पर
किस देश की सेना में कोई जनरल 15 साल तक एक ही पद पर रहता है? लेकिन जनरल यूसिया इस पद पर बने रहे। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की पोलिथ ब्यूरो के सदस्य बने।
यूसिया उन चुनिंदा वरिष्ठ अधिकारियों में से थे जिनके पास युद्ध में लड़ने का अनुभव था। 1979 और 1984 में वियतनाम के खिलाफ दो-दो युद्धों में यूसिया मोर्चे पर लड़ने गए थे।
कहा जाता है कि ताइवान को लेकर अगर अमेरिका और चीन के बीच युद्ध हुआ, तब यूसिया का युद्ध का अनुभव काम आ सकता था।
सेंट्रल मिलिट्री कमीशन में नंबर दो
चीन में सेना के सर्वोच्च नेतृत्व की एक कमेटी होती है जिसे सेंट्रल मिलिट्री कमीशन (CMC) कहते हैं। इस कमेटी में राष्ट्रपति शी जिनपिंग होते हैं और सेना के बाकी जनरल भी।
जनरल यूसिया इसी सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के उपाध्यक्ष थे। यानी जिनपिंग के बाद नंबर दो की पोजीशन पर।
दो महीने से गायब थे जनरल
जो व्यक्ति 15 साल से सेना के जनरल के पद पर है, टॉप कमांडर है, वो 2 महीने से दिखाई नहीं दे रहा था। आखिरी बार 20 नवंबर को मॉस्को में रूस के रक्षा मंत्री के साथ बैठक करते देखे गए।
उस बैठक के कुछ ही दिन पहले सीएमसी के वाइस चेयरमैन हे वेडांग और आठ वरिष्ठ अधिकारियों को उनके पद से हटाया गया था।
क्या कहता है पश्चिमी मीडिया?
बीबीसी ने नहीं लिखा कि सेना के टॉप कमांडर जनरल यूसिया को क्यों हटाया गया। मतलब कारणों को लेकर अटकलबाजी नहीं की। इसके बजाय बीबीसी ने इस पर जोर दिया कि जिस जनरल को हटाया गया वो राष्ट्रपति शी जिनपिंग का कितना करीबी था।
इतना कि 70 साल की उम्र में रिटायर होने के बाद भी शी जिनपिंग ने उन्हें उसी पद पर बनाए रखा।
न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है कि चीन के रक्षा मंत्रालय ने यह साफ-साफ नहीं बताया है कि जनरल यूसिया ने किया क्या है।
वाशिंगटन पोस्ट ने इशारा भर किया है कि अनुशासन और कानून तोड़ने की बात का संबंध भ्रष्टाचार से हो सकता है या किसी राजनीतिक विरोधी को ठिकाने लगाने के लिए ऐसा किया जाता है।
शी जिनपिंग की असुरक्षा?
दोनों अखबारों ने शी जिनपिंग की असुरक्षा की बात की है कि वे अपनी सत्ता पर पकड़ मजबूत बनाए रखने के लिए उन सभी को हटा रहे हैं जो उनके लिए चुनौती बन सकते हैं।
दोनों अखबारों ने लिखा है – असली कारण क्या है, यह कभी सामने नहीं आएगा।
जनरल यूसिया का पक्ष क्या है?
जनरल यूसिया का क्या कहना है? उनका क्या पक्ष है? इसकी जानकारी कहीं नहीं है। इस सन्नाटे को जरूर महसूस करना चाहिए।
क्या आप ऐसा देश चाहेंगे कि सेना के टॉप पोस्ट पर पहुंचा एक व्यक्ति अचानक धकिया कर निकाल दिया जाए और वह कुछ बोल ना सके?
जो जनरल सबसे योग्य माना जा रहा था, वही विदेशी एजेंट निकल आया। जिस चीन की सेना दुनिया में अभेद्य मानी जाती है, उस चीन की सेना के टॉप पर यह सब हो रहा है।
क्या सच में घूस का खेल?
अगर वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार तमाम आरोप सही हैं, तो हंसी को रोकना असंभव हो जाता है। क्या चीन की यह हालत हो गई है कि घूस लेकर रक्षा मंत्री बनाया जा सकता है?
भारत में घूसखोरी का सिस्टम जितना परिपक्व है, घूस कमाने वालों को जितना सपोर्ट मिलता है – अगर उन सबको पता चल जाए कि चीन की सेना के टॉप पर घूस चलता है, तो भारत के सारे घूसखोर ट्रैक्टर को टैंक बताकर चीन की सेना को सप्लाई कर देंगे।
भारत के पड़ोस में लोकतंत्र का हाल
भारत के पड़ोस में चार देश हैं। एक चीन जहां सेना का सबसे बड़ा जनरल गायब कर दिया जाता है।
दूसरा पाकिस्तान जहां सेना का जनरल देश के प्रधानमंत्री को ही गायब कर देता है। जनरल मुनीर के आगे प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ प्रधानमंत्री कम, प्यादा ज्यादा लगते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान कब से जेल में हैं।
तीसरा देश बांग्लादेश जहां सेना सरकार चलाने के लिए एक एक्सपर्ट मोहम्मद यूनुस को कहीं से ले आई और वहां की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत में शरण ले रही हैं।
चौथा देश म्यांमार जहां सैनिक तानाशाही है। भारत के पड़ोस में जवाबदेही, पारदर्शिता वाले लोकतंत्र का नामोनिशान कब का मिट चुका है।
क्या है ‘पर्ज’?
चीन के लिए भले ही इस तरह की घटना सामान्य हो। लेकिन जनरल झांग यूसिया और बाकी टॉप जनरलों को जिस तरह से हटाया गया, इसके बहाने चीन को देखने-समझने का यह अच्छा मौका भी है।
‘पर्ज’ मतलब कई लोगों को हटा देना जो अक्षम और भ्रष्ट हैं। एक तरह का शुद्धिकरण अभियान जिससे समय-समय पर लगे कि अब पार्टी अपनी बुराइयों से मुक्त हो गई है।
लेकिन तब भी वही पार्टी रहती है। उसकी प्रक्रियाएं रहस्यमई बनी रहती हैं।
शी जिनपिंग: आजीवन राष्ट्रपति
चीन में नियम था – दो बार से ज्यादा राष्ट्रपति कोई नहीं रह सकता। 2018 में इसे बदल दिया गया। संविधान का संशोधन किया गया ताकि शी जिनपिंग जब तक जिंदा रहेंगे, तब तक राष्ट्रपति के पद पर रहेंगे।
शी जिनपिंग 2012 से राष्ट्रपति हैं। इस समय 72 साल के हैं।
रूस में भी ऐसा ही हुआ। दो बार से ज्यादा राष्ट्रपति के पद पर कोई नहीं रह सकता था। पुतिन ने नियम बदल दिया। अब वे 2036 तक इस पद पर रहेंगे। पुतिन 73 साल के हैं।
5 महीने पहले था भव्य प्रदर्शन
सितंबर 2025 में चीन की सेना ने अपने इतिहास की सबसे बड़ी परेड का आयोजन किया। दूसरे विश्व युद्ध में जापान को हराने की 80वीं सालगिरह के मौके पर दुनिया के 26 देशों के प्रमुख बुलाए गए।
इसमें रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी थे और उत्तर कोरिया के किम जोंग भी।
इस परेड में चीन की सेना ने अपनी ताकत का प्रदर्शन किया। हेलीकॉप्टर उड़ाए जा रहे थे। उनके साथ जो बैनर लहरा रहे थे, उन पर लिखा था – “न्याय की जीत हो, शांति की जीत हो और लोगों की जीत हो।”
5 महीने पहले चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपनी और चीन की सेना की ताकत का प्रदर्शन कर रहे थे। अचानक उनकी सेना के टॉप जनरलों के खिलाफ घूस लेने के आरोपों की जांच होने लगती है।
चीन में ‘पर्ज’ का इतिहास
चीन का इतिहास बताता है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और सरकार पर एक व्यक्ति के नियंत्रण को बनाए रखने के लिए समय-समय पर ऐसे मनोवैज्ञानिक झटके दिए जाते रहते हैं।
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी 100 साल की हो गई और 100 साल में कई बार पर्ज हुआ है।
माओ ने 1966 के कल्चरल रेवोल्यूशन के दौरान कई लोगों को पर्ज किया। तियानेनमन स्क्वायर प्रदर्शन के दौरान डेंग शाऊपिंग ने पर्ज की। और भ्रष्टाचार के खिलाफ कारवाई के नाम पर शी जिनपिंग भी कई बार पर्ज कर चुके हैं।
पर्ज की खास बात
पर्ज की खास बात है कि केवल उसे नहीं हटाया जाता जो पार्टी की लाइन से सहमत नहीं होता, बल्कि उसकी गर्दन भी उड़ा दी जाती है जो पार्टी और टॉप कमांड का भरोसेमंद होता है, योग्य होता है।
1966 में माओ के उत्तराधिकारी माने जाने वाले लियू शाओकी को भी पर्ज किया गया। माओ के बाद वे चीन के राष्ट्राध्यक्ष बने, लेकिन रेड गार्ड्स ने उन्हें पूंजीवादी करार दिया।
लियू को पद से हटाया गया। पार्टी से निकाल दिया गया। उनकी मौत 1969 में हुई, लेकिन 1974 तक देश को पता ही नहीं चला कि वे मर चुके हैं।
जनरल पेंग देहुआई की कहानी
माओ के समय एक और नेता हुए जनरल पेंग देहुआई। कोरिया युद्ध में चीन के शानदार प्रदर्शन के बाद रक्षा मंत्री बनाए गए। लेकिन गरीबी और भुखमरी की हालत देखकर धीरे-धीरे माओ की ग्रेट लीप फॉरवर्ड योजना की निंदा करने लगे।
1966 में माओ के वफादार गार्ड्स ने उन्हें गिरफ्तार किया। जेल में एकांतवास में रखे गए। सार्वजनिक मंच पर लाकर अपमान किया गया और काफी अत्याचार हुआ। 8 साल बाद जेल में उनकी मौत हो गई।
डेंग शाऊपिंग को दो बार पर्ज किया गया
चीन की आधुनिक अर्थव्यवस्था के रचनाकार माने जाने वाले डेंग शाऊपिंग को माओ के काल में दो बार पार्टी से पर्ज किया गया।
कल्चरल रिवोल्यूशन के दौरान लियू शाओकी से उनकी करीबी के चलते उन्हें भी पार्टी से निकाला गया और ट्रैक्टर फैक्ट्री में काम करने के लिए भेज दिया गया।
1973 में माओ उन्हें वापस बीजिंग ले आए। लेकिन 3 साल बाद माओ ने डेंग को फिर से पर्ज कर दिया। माओ को डर था डेंग उनकी नीतियों को पलट सकते हैं।
माओ की मौत के बाद डेंग की वापसी होती है और अपनी मौत तक वे पार्टी के सबसे कद्दावर नेताओं में शुमार रहे।
रूस में भी पर्ज का इतिहास
रूस में भी पर्ज का इतिहास रहा है। स्टालिन के काल में हुई पर्ज के दौरान एक पंक्ति मशहूर हो गई। आरोप की जानकारी मिलते ही आरोपी कहता था – “कॉमरेड स्टालिन, एक भयंकर गलती हो गई है।”
2025 में जब पुतिन ने अपने करीबी सर्गेई मार्कोव को पर्ज का शिकार बनाया, तब उनका बयान भी कुछ ऐसा ही था – “कोई गलतफहमी हुई है।”
भारत में भी होता है पर्ज
भारत में भी पर्ज होता है। लेकिन इतना भयानक नहीं। मार्गदर्शक मंडल बन जाता है या ईडी का छापा पड़ जाता है।
अभी भारत में पर्ज परिपक्व होने की राह पर है। लेकिन जब परिपक्व होगा, चीन की तरह शायद लग सकता है।
2 साल पहले कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए राजस्थान के पूर्व मंत्री महेंद्रजीत सिंह मालवीय ने जनवरी में ऐलान किया – वे वापस कांग्रेस में जाना चाहते हैं।
बयान दिया – “बीजेपी की सत्ता होते हुए भी जनता के काम नहीं करा पा रहे हैं। भाजपा सरकार में गरीबों की सुनने वाला कोई नहीं।”
लेकिन उनकी इस घोषणा के बाद 48 घंटे के भीतर उनके तीन ठिकानों पर एंटी करप्शन ब्यूरो का छापा पड़ गया।
हिटलर और सद्दाम ने भी किया पर्ज
हिटलर ने 1934 में “नाइट ऑफ द लॉन्ग नाइव्स” नाम से पर्ज किया। अपने कई राजनीतिक प्रतिद्वंदियों को एक ही रात में मार डाला या गिरफ्तार कर लिया।
मरने वालों में हिटलर का पुराना साथी अर्नेस्ट रोम भी शामिल था जो अर्धसैनिक बल SA का अध्यक्ष था।
22 जुलाई 1979 को राष्ट्रपति बनने के 6 दिन बाद सद्दाम हुसैन ने एक भयानक पर्ज की। इसे बाथ पार्टी पर्ज कहते हैं।
एक बड़े से हॉल में सद्दाम ने अपने अधिकारियों को बुलाया जिन्हें कोई अंदेशा नहीं था क्या होने वाला है। एक-एक कर सद्दाम ने 50 से अधिक अधिकारियों के नाम लिए जिन्हें गार्ड बाहर ले गए।
ओडिशा में चुनावी घोटाला?
26 जनवरी के दिन ही फ्रंटलाइन में एक चौंकाने वाली हेडलाइन के साथ खबर छपी। एजाज अशरफ की रिपोर्ट की हेडलाइन कहती है – “ओडिशा में इलेक्शन फ्रॉड हुआ है।”
बीजेडी ने आरोप लगाया कि 2024 के चुनाव में 147 विधानसभाओं में 58 बूथों पर जितने वोट डाले गए, जितने गिने गए, उनके बीच एक वोट से लेकर 908 वोट का अंतर था।
एजाज अशरफ लिखते हैं कि मामला इससे भी गंभीर है। फॉर्म 17 के अनुसार एक बूथ पर 682 वोट पड़े, लेकिन फॉर्म 20 के अनुसार एक भी वोट नहीं गिना गया। अगर किसी ने भी वोट नहीं किया तो यह वोट गया कहां?
भारत में भी सिकुड़ती पारदर्शिता
भारत में भी पारदर्शिता और जवाबदेही की घोर कमी होती जा रही है। चुनाव आयोग के तमाम उदाहरण सामने हैं। अदालतों के फैसलों पर लगातार सवाल उठ रहे हैं।
सियासी पक्षपात के आरोप लग रहे हैं। जमानत तक मुश्किल होती जा रही है। जांच एजेंसियां विपक्ष को कुचल रही हैं।
अडानी और पुलिस अधिकारी के खिलाफ फैसला देने वाले जजों का तबादला कर दिया जाता है।
अचानक मई 2023 में किरण रिजुजू को कानून मंत्री के पद से हटाकर पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय का भार दे दिया जाता है। उस समय आरोपों की चर्चा हुई, मगर बाद में कुछ पता नहीं चला – क्यों हटाए गए?
बीजेपी और चीन की पार्टी की बैठक
बीजेपी ने चीन की पार्टी के साथ हाल में बैठक की। बैठक में क्या हुआ? दो लाइन की जानकारी दी। लेकिन यह बैठक क्यों हुई? यह मुद्दा गायब हो गया।
सरकार ही कहती है ऑपरेशन सिंदूर जारी है। लेकिन चीन की पार्टी के साथ बैठक भी होती है।
क्या बीजेपी में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की झलक देखी जा सकती है? इन सवालों को खारिज मत कीजिए। मगर जब बहस कीजिए, तो पूरी तैयारी के साथ कीजिए।
असेंबली लाइन समाज
आपने फैक्ट्री में असेंबली लाइन प्रोडक्शन के बारे में सुना होगा। जैसे फैक्ट्री में दर्जनों लोग एक ही काम करते हैं।
एक ही तरह का काम करने वालों में से आप किसी को कभी भी हटा सकते हैं। अगर लगे कि इसका अनुभव ज्यादा है, ज्यादा सैलरी मांग रहा है, उसे किसी बहाने हटा दिया जाता है।
जो काम फैक्ट्री के भीतर हो रहा था, वही काम कंट्री के स्तर पर हो रहा है। जनता अब जनता नहीं रही। उसे असेंबली लाइन यानी पार्टी लाइन में ढाल दिया गया है।
लोकतंत्र के लिए आखिरी लड़ाई
आप दुनिया के नक्शे पर देखिए – हर देश की जनता छटपटा रही है। क्योंकि उसकी जनता होने का यह आखिरी दौर है। जनता अपनी मृत्यु के सामने खड़ी है।
अमेरिका में भी बहस हो रही है – क्या उसका शानदार लोकतंत्र खत्म होने के आखिरी दौर में प्रवेश कर चुका है?
तो भारत में भी इसे लेकर बहस होनी चाहिए। भारत के पड़ोसी देशों का हाल देखकर इस सवाल पर बहस करने में आपको कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।
जानें पूरा मामला
जनरल झांग यूसिया को हटाए जाने की घटना केवल चीन की सैन्य राजनीति की कहानी नहीं है। यह उस बड़ी तस्वीर का हिस्सा है जहां दुनिया भर में लोकतंत्र सिकुड़ रहा है और सत्ता एक व्यक्ति के हाथों में केंद्रित हो रही है।
चाहे चीन हो या रूस, पाकिस्तान हो या बांग्लादेश – हर जगह पारदर्शिता और जवाबदेही खत्म होती जा रही है। सवाल पूछने वालों को चुप कराया जा रहा है।
भारत में भी ऐसे संकेत दिख रहे हैं। चुनावी प्रक्रिया पर सवाल, न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर उंगलियां, जांच एजेंसियों का राजनीतिक इस्तेमाल – ये सब चिंता के विषय हैं।
लोकतंत्र के प्रति अपनी समझ की सारी किताबों को निकालकर रख लीजिए। वैसे भी सबसे बड़ा अफसोस यही है कि इतिहास पढ़ाया नहीं गया। लेकिन अब दुनिया भर में लोकतंत्र को इतिहास में बदलते हुए सामने से दिखाई दे रहा है। देख लीजिए।
मुख्य बातें (Key Points)
- चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपने सबसे वरिष्ठ जनरल झांग यूसिया को बर्खास्त किया
- यूसिया सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के उपाध्यक्ष थे और 15 साल से जनरल पद पर थे
- अनुशासन और कानून तोड़ने का आरोप लगा, लेकिन असली कारण स्पष्ट नहीं
- वॉल स्ट्रीट जर्नल ने परमाणु रहस्य लीक करने और घूस के आरोप लगाए
- चीन में ‘पर्ज’ का लंबा इतिहास – माओ, डेंग और अब शी जिनपिंग के काल में
- भारत के पड़ोस में लोकतंत्र सिकुड़ रहा है – चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार
- भारत में भी पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं







