Supreme Court Traffic Challan : Supreme Court of India ने ट्रैफिक चालान को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार को सख्त निर्देश जारी करते हुए साफ कर दिया है कि वर्ष 2017 से 2021 के बीच यातायात नियमों के उल्लंघन पर जारी किए गए चालान समाप्त नहीं होंगे और संबंधित लोगों को यह जुर्माना भरना ही होगा। अदालत ने राज्य सरकार को वर्ष 2023 में बनाए गए कानून में आवश्यक संशोधन छह हफ्तों के भीतर लागू करने का आदेश दिया है।
यह आदेश वरिष्ठ अधिवक्ता केसी जैन की याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया गया। याचिका में राज्य सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर ट्रैफिक मामलों को खत्म किए जाने को सड़क सुरक्षा के मूल उद्देश्य के खिलाफ बताया गया था।
क्यों सुप्रीम कोर्ट को देना पड़ा दखल
मामले की सुनवाई जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केबी विश्वनाथन की पीठ ने की। अदालत के सामने यह तथ्य आया कि उत्तर प्रदेश सरकार ने 2023 में बनाए गए एक कानून के तहत यातायात नियमों के उल्लंघन से जुड़े 10 लाख से अधिक लंबित मुकदमे समाप्त कर दिए थे। इसके साथ ही परिवहन विभाग स्तर पर लंबित 1 लाख से अधिक ई-चालान भी बंद कर दिए गए थे।
वरिष्ठ अधिवक्ता केसी जैन ने दलील दी कि ऐसे फैसलों से उन नागरिकों के साथ अन्याय होता है, जिन्होंने नियमों का पालन किया या समय पर जुर्माना अदा किया। उन्होंने इसे सड़क सुरक्षा और कानून के समान लागू होने के सिद्धांत के खिलाफ बताया।
राज्य सरकार का पक्ष और प्रस्तावित संशोधन
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से हलफनामा पेश किया गया, जिसमें बताया गया कि 9 जनवरी 2026 को मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हुई बैठक में यह फैसला लिया गया है कि 2023 के कानून में संशोधन कर कुछ श्रेणियों के अपराधों को इसके दायरे से बाहर किया जाएगा। इनमें वे उल्लंघन शामिल होंगे जो शमनीय नहीं हैं, जिनमें जेल की सजा का प्रावधान है या जिन मामलों में पहले सजा हो चुकी है।
अदालत ने राज्य सरकार को यह संशोधन लागू करने के लिए छह हफ्ते का समय दिया है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि यह राज्य कानून केंद्रीय मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के प्रतिकूल प्रतीत होता है। अदालत ने यह भी नोट किया कि इस कानून को न तो राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए आरक्षित किया गया और न ही ऐसी स्वीकृति प्राप्त की गई।
सड़क सुरक्षा और आम आदमी पर असर
सुप्रीम कोर्ट ने पहले की टिप्पणियों का हवाला देते हुए कहा कि भारत में ट्रैफिक अनुशासन एक बड़ी चुनौती है और सड़क हादसों में बड़ी संख्या में लोगों की जान जाती है। ऐसे में चालान माफ करना कानून के उद्देश्य को विफल करता है। इस आदेश का सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ेगा, क्योंकि अब पुराने चालानों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकेगा और नियम तोड़ने पर जवाबदेही तय होगी।
संवैधानिक सवाल अभी खुला
अदालत में न्यायमित्र वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल ने आशंका जताई कि राज्य सरकार का प्रस्तावित संशोधन भी व्यवहारिक रूप से समस्या का समाधान नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि यदि स्थिति यथावत रही, तो पूरे उत्तर प्रदेश अधिनियम को असंवैधानिक घोषित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। हालांकि, राज्य सरकार ने दावा किया कि प्रस्तावित संशोधन पर्याप्त होगा।
दोनों पक्षों की दलीलों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल राज्य सरकार को संशोधन लागू करने का अवसर दिया है, लेकिन मूल संवैधानिक प्रश्न को जानबूझकर खुला रखा है। मामले की अगली सुनवाई 9 अप्रैल 2026 को निर्धारित की गई है।
याचिका में यह भी सामने आया कि उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 1977 से 2023 के बीच समय-समय पर बनाए गए पांच अलग-अलग कानूनों के जरिए करीब 44 वर्षों में ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन से जुड़े मामलों को बार-बार समाप्त किया। जबकि पूरे देश में सड़क हादसों में सबसे ज्यादा मौतें उत्तर प्रदेश में होती हैं। इस पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश सड़क सुरक्षा को लेकर एक अहम संकेत माना जा रहा है।
मुख्य बातें (Key Points)
- 2017–2021 के ट्रैफिक चालान माफ नहीं होंगे, जुर्माना भरना अनिवार्य
- सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को छह हफ्ते में 2023 कानून में संशोधन लागू करने का आदेश दिया
- 10 लाख से अधिक ट्रैफिक मुकदमे और 1 लाख ई-चालान पहले किए गए थे समाप्त
- मामला मोटर वाहन अधिनियम और सड़क सुरक्षा से सीधे जुड़ा








