US Iran Conflict : दुनिया एक नए विश्व युद्ध की दहलीज पर खड़ी है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अब सीधे टकराव में बदल रहा है। अमेरिका का सबसे शक्तिशाली युद्धपोत USS अब्राहम लिंकन मिडिल ईस्ट की तरफ बढ़ चुका है। ईरान ने जवाब में अपने 5000 से ज्यादा मिसाइलों के साथ परमाणु हथियार तैयार कर लिए हैं। और इस भयावह माहौल के बीच संयुक्त राष्ट्र में भारत ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया है – पहली बार भारत, चीन और पाकिस्तान एक साथ ईरान के पक्ष में खड़े हो गए हैं।
नई विश्व व्यवस्था के लिए जंग
यह सिर्फ दो देशों की लड़ाई नहीं है। यह एक बड़ा सवाल है कि दुनिया की नई विश्व व्यवस्था क्या होगी और उसके केंद्र में कौन खड़ा होगा। एक तरफ अमेरिका है जो दुनिया को अपने हिसाब से बदलना चाहता है। दूसरी तरफ ईरान है जो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।
ईरान के भीतर बड़ी तादाद में प्रदर्शनकारी मारे गए। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने खुले तौर पर कहा कि ऐसा रोकना होगा और वे प्रदर्शनकारियों के साथ खड़े हैं।
यूएन में भारत का चौंकाने वाला रुख
लेकिन पहली बार यूनाइटेड नेशन के भीतर जब आइसलैंड ने यह सवाल उठाया कि क्या वाकई ईरान के भीतर मानव अधिकार हनन हो रहा है, तो चीन ने कहा नहीं हो रहा है। पाकिस्तान ने कहा नहीं हो रहा है।
और चौंकाने वाली बात यह है कि भारत ने भी कहा नहीं हो रहा है। यानी किसी देश के भीतर की परिस्थितियां उसकी अपनी संप्रभुता और वहां की राजनीतिक सत्ता के हिसाब से चलनी चाहिए। वो अमेरिका के इशारे पर नहीं चलेगी।
पहली बार भारत-चीन-पाकिस्तान एक मंच पर
ईरान का साथ यूनाइटेड नेशन में सात देशों ने दिया। हालांकि जो प्रस्ताव आइसलैंड ने रखा था उसके साथ जर्मनी भी खड़ा था, ब्रिटेन भी खड़ा था। 25 देश पक्ष में थे। 14 ने मतदान नहीं किया।
लेकिन जिन्होंने ईरान का साथ दिया उसमें भारत है, चीन है, पाकिस्तान है, इंडोनेशिया है, इराक है, वियतनाम है, क्यूबा है। यानी पहली बार यूनाइटेड नेशन के भीतर भारत, पाकिस्तान और चीन एक साथ नजर आए। भारत की यह रणनीति अंतरराष्ट्रीय तौर पर अमेरिका को आहत कर सकती है।
यूरोपीय यूनियन ने भारत को दिया झटका
अमेरिका का विरोध यूरोप या यूरोपीय यूनियन के भीतर या फिर नाटो कंट्रीज के भीतर जरूर हो रहा हो लेकिन एक सच तो है। यूरोपीय यूनियन भी इस हकीकत को समझता है कि वह कितना अमेरिका के खिलाफ जा सकता है।
शायद इसीलिए यूरोपीय यूनियन भारत के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट करने से पहले ही उसने अपने तौर पर यह जतला दिया कि वह अमेरिकी टैरिफ को लेकर शायद अमेरिका के साथ खड़ा है।
इसीलिए 1 जनवरी से भारत को जो सुविधा यूरोपीय यूनियन के जरिए जो जीएसपी की मिल रही थी यानी जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंस जो मिल रहा था, आयात शुल्क जो कम हो जाता था, वह एक झटके में खत्म कर दिया गया।
87% भारतीय माल प्रभावित
खत्म होने का मतलब यह है कि जो भी माल भारत से यूरोपीय यूनियन जाता है उसमें 87% माल प्रभावित हो गया। और प्रभावित नहीं हुआ बल्कि एक्सपोर्ट करने वाले लोगों पर 20% टैरिफ का बोझ बढ़ गया।
वह एग्रीकल्चर से जुड़ा हुआ उत्पाद हो, चमड़ा हो, लकड़ी हो, कागज हो, फुटवेयर हो, ऑप्टिकल हो, मेडिकल उपकरण हो, हस्तशिल्प हो और इसके साथ-साथ खनिज, रसायन, प्लास्टिक, लोहा, स्टील सभी का बोझ एक झटके में बढ़ गया। माना जा रहा है कि लगभग 1.95 बिलियन डॉलर का असर इस जरिए पड़ जाएगा।
चाबहार पोर्ट पर खतरा
इन सबके बीच ईरान के चाबहार पोर्ट पर भारत ने जितना भी खर्च किया, अमेरिका अब अप्रैल के बाद वहां पर प्रतिबंध बढ़ा देगा।
और अगर प्रतिबंध लगा देगा तो भारत ने जितना पैसा चाबहार पोर्ट पर खर्च किया, चीन के जो बेल्ट रोड मिशन है उसके समानांतर अपने आप को खड़ा किया, चीन और पाकिस्तान की साझेदारी के बीच अपने आर्थिक रास्तों को बनाने की कोशिश की तो क्या अमेरिका उस पर हमला कर रहा है? इसीलिए भारत ने अपने तौर पर ईरान का साथ दे दिया।
ईरान ने भारत को लिखा धन्यवाद पत्र
दरअसल ईरान की तरफ से एक पत्र भारत को भी लिखा गया। कहा गया संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार परिषद में ईरान के इस्लामी गणराज्य के प्रति सिद्धांत आधारित और दृढ़ समर्थन के लिए जिसमें एक अन्यायपूर्ण और राजनीतिक रूप से प्रेरित प्रस्ताव का विरोध जो शामिल किया गया उसमें भारत सरकार के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता वो व्यक्त करते हैं।
क्योंकि यह रुख न्याय, बहुपक्षवाद और राष्ट्रीय संप्रभुता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। मैसेज है कि ईरान और भारत इस दौर में नजदीक आ गए।
मैसेज है कि ईरान के भीतर जिन प्रदर्शनकारियों के पीछे अमेरिका खड़ा है, उन प्रदर्शनकारियों के साथ जो भी हो लेकिन भारत ईरान की सरकार के साथ खड़ी है।
खामनेई अंडरग्राउंड, अगले 24 घंटे महत्वपूर्ण
और यहीं से यह सवाल खड़ा होता है क्या वाकई अमेरिका आज की रात या अगले 24 घंटों में ईरान पर हमला कर देगा। क्योंकि ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामनेई इस वक्त अंडरग्राउंड हैं।
अंडरग्राउंड इसलिए हैं क्योंकि इससे पहले अमेरिका और इजराइल के निशाने पर दुनिया के तीन ऐसे लोग आए जो खुले तौर पर घूम रहे थे या फिर उनकी मौजूदगी खुले आसमान तले थी। निशाने पर आए और ड्रोन से उन्हें मार गिराया गया।
तीन बड़े लीडर्स का ड्रोन से खात्मा
27 सितंबर 2024 को हसन नसरुल्लाह बेरूत में एक रिहाइशी टावर में मौजूद थे। वहां पर इजरायली ड्रोन ने हमला किया और वह मारे गए।
उससे पहले ISIS के प्रमुख अबू बकर अल बगदादी 27 अक्टूबर 2019 में उत्तरी सीरिया में खुले तौर पर आसमान तले मौजूद थे। अमेरिकी ड्रोन हमले में मारे गए।
कासिम सुलेमानी 3 जनवरी 2020 ईरान के सबसे महत्वपूर्ण सैन्य रणनीतिकार बगदाद एयरपोर्ट के करीब थे और ड्रोन से उन पर निशाना बनाया गया।
तो अमेरिका की रणनीति आयतुल्ला अली खामनेई को निशाने पर लेकर पूरे तरीके से ईरान की सरकार का मनोबल तोड़ने को लेकर है।
ट्रंप का संदेश: सत्ता परिवर्तन का वक्त
ट्रंप ने बहुत साफ इस दौर में कह दिया – अमेरिका के राष्ट्रपति का रुख साफ है कि ईरान में इस वक्त सत्ता परिवर्तन का वक्त आ गया है।
द वॉल स्ट्रीट की अगर रिपोर्ट को समझें तो अमेरिका ईरान के खिलाफ सैन्य विकल्प की दिशा में अब तेजी से और निर्णायक तरीके से बढ़ना चाहता है और ईरानी शासन को सत्ता से हटाने की योजना वो बना चुका है।
USS अब्राहम लिंकन मिडिल ईस्ट पहुंचा
अमेरिकी जंगी बेड़ा जो ईरान की तरफ लगातार बढ़ रहा है, और खाड़ी के सभी अमेरिकी मिलिट्री बेस को निशाने पर ईरान ने ले लिया है।
अगर अमेरिकी जंगी बेड़ा जिसका नाम अब्राहम लिंकन है वह मिडिल ईस्ट तक पहुंच गया है और इन सबके बीच उसके साथ जिन जहाजों का पूरा का पूरा काफिला है।
उसमें कहते हैं कि इस जहाज की रफ्तार 20 नॉट की रफ्तार है यानी तकरीबन 50-60 किलोमीटर के हिसाब से वह चलता है प्रति घंटे।
लोकेशन छुपाकर आगे बढ़ रहा जंगी बेड़ा
लोकेशन छिपाने के लिए इसने ऑटोमेटिक पहचान सिस्टम को बंद कर दिया है। कई डेस्ट्रॉयर जहाज या कहें न्यूक्लियर पनडुब्बी, एयरक्राफ्ट कैरियर जो 48 से 60 के लगभग है। F/A-18 जो फाइटर जेट है वो भी मौजूद है।
और इन सबके साथ जो अलग-अलग हिस्सों में मिडिल ईस्ट के भीतर अमेरिका के बेस हैं वहां पर F-15 फाइटर जेट की मौजूदगी है। पेट्रियोट मिसाइल्स डिफेंस सिस्टम भी मौजूद है।
और यह माना जा रहा है कि मिडिल ईस्ट के भीतर एयर डिफेंस सिस्टम को अमेरिका अगले 24 घंटों में मजबूत कर लेगा क्योंकि उसे पता है वो ईरान के निशाने पर होगा।
दक्षिण चीन सागर से निकला अमेरिकी बेड़ा
दरअसल अमेरिका का यह जंगी बेड़ा जो है यह साउथ चाइना सी में मौजूद था और वहां से यह निकलकर मिडिल ईस्ट तक पहुंच चुका है। तो क्या वाकई हमले की पूरी तैयारी है?
क्योंकि एक लिहाज से ईरान के चारों तरफ जो मिडिल ईस्ट की कंट्रीज हैं वहां पर अमेरिका के सैन्य बेस हैं। नौसेना के बेस हैं और वहां से क्या वो हमला करेगा?
ईरान की भौगोलिक मजबूती
लेकिन दूसरी तरफ ईरान जिस स्थिति में खड़ा है वो प्राकृतिक तौर पर और हथियारों को लेकर भी जिस मजबूत परिस्थिति के साथ खड़ा है। उत्तर में कैस्पियन सागर है। कैस्पियन सी, दक्षिण में फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी है। पूर्व पश्चिम में रेगिस्तान और पहाड़ हैं।
पश्चिमी सीमा पर जाग्रोस पर्वत श्रृंखला है। उत्तर में अलबुर्ज पर्वत श्रृंखला है। और फारस की खाड़ी जो होर्मुज जलडमरूमध्य के बीच में बहुत संकरा सा रास्ता है जहां से तेल की आवाजाही दुनिया भर में होती है।
ईरान की सैन्य ताकत: 10 लाख सैनिक
इन सबके साथ जो ईरान के भीतर अभी तक जो अमेरिका को लगता रहा, जो CIA और मोसाद सोचते रहे कि वहां की सेना वहां की धार्मिक सत्ता के खिलाफ खड़ी हो जाएगी क्योंकि अमेरिका इस वक्त प्रदर्शनकारियों के साथ है। ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ।
और इस वक्त लगभग 6 लाख से ज्यादा सक्रिय सैनिक हैं। ईरान के पास लगभग 3.5 लाख रिजर्व फोर्स है और इससे हटकर रेवोलशनरी गार्ड फोर्स अलग से है। यानी 9-10 लाख फौज के अलावा 1.5 से 3 लाख के बीच रेवोलशनरी गार्ड का होना।
600 लड़ाकू विमान और 5000 मिसाइलें
लेकिन उसके आगे की कड़ी यह है कि जो लड़ाकू विमान हैं वह लगभग 600 के करीब हैं। जो नौसेना में 150 से ज्यादा एसेट की मौजूदगी है।
उनके साथ पहली बार चीन के सहयोग से वहां बैलेस्टिक मिसाइल और क्रूज मिसाइल जो 5000 के पार है वो उसकी सबसे बड़ी ताकत है।
और माना जा रहा है कि मिसाइल के साथ अगर न्यूक्लियर पहलू भी होगा तो फिर अमेरिका के लिए यह खतरे की घंटी इसलिए कहीं बड़ी है।
मिडिल ईस्ट में अमेरिकी बेस निशाने पर
अगर जो अमेरिका रक्षा करने की दृष्टि से पूरे मिडिल ईस्ट को चाह रहा है कि वह उसके डिफेंस सिस्टम में आ जाए। अगर नहीं आता है तो फिर अमेरिका के जो नौसैनिक अड्डे हैं जो सैन्य अड्डे हैं, एयरबेस जिसको कहते हैं:
- तुर्की में दो हैं
- इराक में तीन हैं
- कुवैत में एक है
- जॉर्डन में एक है
- सऊदी अरब में पांच हैं
- यूनाइटेड अरब अमीरात में एक है
- ओमान में तीन हैं
यह एयर बेस हैं। और नेवल फैसिलिटी जो उपलब्ध है उसमें ओमान में एक बेस है, UAE में दो बेस हैं, सऊदी अरब में तीन हैं और जॉर्डन में एक है। बड़ी महत्वपूर्ण बात है कि ईरान अपने तौर पर इन्हीं जगहों को निशाने पर लिए हुए है।
मिडिल ईस्ट की चिंता: पूरा क्षेत्र युद्ध में फंसेगा
और उसके आगे की कड़ी यह है कि मिडिल ईस्ट की कंट्रीज अमेरिका को अब भी कह रही हैं कि दरअसल हमला करने के बाद डिफेंस सिस्टम अगर अमेरिका का धराशाई होता है तो उसके बाद की परिस्थिति पूरे मिडिल ईस्ट को उस युद्ध में झोंक देगी।
तब कौन सा रास्ता बचेगा? मिडिल ईस्ट के ये पूरे देशों की कतार बतला रही है कि अगर ईरान सीधे हमला करता है तो युद्ध में चाहे अनचाहे मिडिल ईस्ट भी आकर खड़ा होगा ही।
यूएन वोट: अमेरिका के लिए परेशानी का सबब
लेकिन इन सबके बीच यूनाइटेड नेशन में जब उसे यह मान्यता उन देशों से मिल रही है कि जो विरोध प्रदर्शन ईरान के भीतर हो रहा है, वहां हजारों की तादाद में प्रदर्शनकारी चाहे मारे गए।
लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि ईरान की मौजूदा सत्ता ने मानवाधिकार हनन किया है। यही बात तो यूनाइटेड नेशन में रखी गई जिसमें भारत, चीन, पाकिस्तान समेत सात देशों ने समर्थन कर दिया कि वाकई वहां की सरकार सही है।
यह मैसेज अमेरिका के लिए परेशान करने वाला है। यह मैसेज शायद एशिया और यूरोप के भीतर एक मोटी लकीर खींचने वाला है।
कनाडा में भी ईरान के समर्थन में प्रदर्शन
अमेरिका और ईरान के इस टकराव के बीच दुनिया के अलग-अलग देश अगर अपने अस्तित्व की लड़ाई को भी अमेरिकी पहल से जोड़ रहे हैं या विरोध कर रहे हैं।
तो उसमें यूनाइटेड नेशन में जो हुआ उससे हटकर कनाडा के टोरंटो शहर में बर्फ गिर रही है। लेकिन लोग सड़क पर ईरान के पक्ष में क्यों निकल आए?
तो क्या अमेरिका ने खुद को इस दौर में अलग-थलग खड़ा कर लिया है या दुनिया अमेरिका को अलग-थलग करने पर अब आमादा हो चली है?
भारत की जियोपॉलिटिकल चुनौतियां
लेकिन इस दौर की जियोपॉलिटिक्स एक नई परिभाषा को शायद अमेरिका को केंद्र में रखकर गढ़ रही है कि हर देश के सामने इस वक्त अपने अस्तित्व का सवाल है।
और शायद इसीलिए पहली बार भारत यूनाइटेड नेशन के बीच चीन और पाकिस्तान के साथ ईरान के पक्ष में खड़ा हो जाता है। क्योंकि भारत को जो आर्थिक नुकसान चाबहार पोर्ट से ना मिलने की वजह से होगा उसकी भरपाई अमेरिका नहीं कर रहा है।
अमेरिका के साथ, उसके अपने देश के साथ खड़े हुए कनाडा ने सीधे दो-दो हाथ करने की ठान ली है। अमेरिका ने कहा कनाडा हमारी आर्थिक स्थितियों पर निर्भर है। कनाडा ने इंकार कर दिया।
ब्रिक्स और भारत की दुविधा
ईरान, इजराइल के बीच युद्ध जो जून के महीने में हुआ था, उसके बाद से चीन और रूस का खुला सहयोग ईरान को मिला। ईरान ब्रिक्स में शामिल हो गया।
2024 के अक्टूबर में ब्रिक्स की अगुवाई भारत कर रहा है। भारत के सामने मुश्किल है कि वह किन फ्रंट पर किसका साथ दें, इससे बेहतर है अब अपनी डोमेस्टिक परिस्थितियों को लेकर मैसेज दुनिया के सामने उसे देना होगा।
गणतंत्र दिवस पर यूरोपीय यूनियन के मेहमान
क्योंकि यूरोपीय यूनियन भी अगर अब इस दिशा में बढ़ जाता है जहां पर वह FTA तो करेगा जो 27 तारीख को माना जा रहा है कि समझौता हो जाएगा दिल्ली के भीतर।
क्योंकि इस बार गणतंत्र दिवस के मौके पर यूरोपीय यूनियन के ही जो प्रतिनिधि हैं उनको मुख्य अतिथि बनाया गया और पूरा प्रतिनिधिमंडल आज ही दिल्ली भी पहुंच गया।
पीस बोर्ड और भारत की दुविधा
पाकिस्तान जिस पीस बोर्ड में शामिल हो गया, उस पीस बोर्ड ने भी भारत के सामने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है।
कि कल को अगर भारत पाकिस्तान पर जिस तरीके से ऑपरेशन सिंदूर को लेकर उसने कारवाई की, कोई अगर टेरर अटैक होता है और भारत तो लगातार कह रहा है कि उसके लिए ऑपरेशन सिंदूर रुका नहीं है।
तो अगर वह पीस बोर्ड में शामिल हो जाता है तो फिर पीस बोर्ड जो तय करेगा वही भारत को मानना होगा। तो इसका मतलब यह है कि उस पीस बोर्ड में पाकिस्तान पहले से है। इजरायल भी शामिल हो गया है। भारत ने अभी तक निर्णय लिया नहीं है।
यूएन बनाम पीस बोर्ड
और इन सबके बीच अगर वो निर्णय लेता है तो फिर यूनाइटेड नेशन का कोई महत्व बचेगा नहीं। इसीलिए यूनाइटेड नेशन में भारत, अमेरिकी पहल जो आइसलैंड, ब्रिटेन, जर्मनी और बाकी देशों के साथ खड़ी हुई, भारत ने उसका विरोध करते हुए ईरान के पक्ष ले लिया।
यानी जियोपॉलिटिकल सिचुएशन में पहली बार अमेरिका के सामने सवाल है और ईरान को लेकर दुनिया के वह देश जो अमेरिका के निशाने पर हैं उनके लिए भी सवाल है।
पूरा एशिया युद्ध की चपेट में आ सकता है
शायद इसीलिए ये युद्ध की परिस्थिति सिर्फ ईरान और अमेरिका के बीच नहीं है। जियोपॉलिटिकल कन्फ्रंटेशन जो है जो आपस में टकराव की परिस्थिति है उसमें चीन, रूस, ईरान, मिडिल ईस्ट के देश, भारत, भारत के पड़ोसी देश सभी को तय करना है। क्योंकि एशियाई कंट्रीज के भीतर यह युद्ध की परिस्थिति है।
शांति बोर्ड बनाम युद्धपोत
और जो इजरायल, हमास या गाजा को लेकर जिस पीस बोर्ड का सवाल किया गया है उसमें भारत इसलिए अनिर्णय की स्थिति में है क्योंकि अमेरिका ने कहा है वहां ट्रंप यानी अमेरिकी राष्ट्रपति का वीटो चलेगा।
और उसके बाद गाजा में शांति स्थापित करने के बाद दुनिया के दूसरे तमाम देशों में जो भी टकराव की परिस्थिति होगी उसमें भी वही बोर्ड शांति स्थापित करेगा।
शांति के लिए एक बोर्ड है और दूसरी तरफ शांति भंग करने के लिए अमेरिका का जंगी जहाज ईरान की तरफ बढ़ चला है। ईरान अपने हथियारों के साथ जिसमें न्यूक्लियर मिसाइलों का भी जिक्र हो रहा है, वह भी शामिल है। तो यह पीस है या वॉर है?
ट्रंप की परीक्षा की घड़ी
इस परिस्थिति में पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति के भीतर भी यह सवाल है और शायद अपनी ताकत दिखा ना पाने की परिस्थितियों में उसकी अपनी मजबूत या कमजोर परिस्थिति के बीच निर्णय लेने की स्थिति भी है।
ईरान के लिए भी सवाल है और एशियाई देशों के साथ भी यह बड़ा सवाल है कि वो अमेरिकी दादागिरी को भारत की जमीन या भारत के इर्द-गिर्द की परिस्थितियों में हावी होने दें या ना दें।
दुनिया खड़ी हो गई है साइड चुनने के लिए
शायद इसीलिए पहली बार ईरान और अमेरिका के इस टकराव के बीच में दुनिया के वह तमाम देश आकर खड़े हो गए हैं जो जान चुके हैं कि अमेरिका ने अगर हमला किया तो फिर उन्हें कहां खड़ा होना है।
और ईरान इस हकीकत को जान रहा है कि इस वक्त अमेरिका को लेकर दुनिया भर में जितने सवाल हैं उन सवालों के तमाम जवाब ईरान के जवाब के साथ हर देश को खड़ा होना होगा।
यह मैसेज यूनाइटेड नेशंस से निकलकर आ चुका है। शायद इसीलिए युद्ध की परिस्थिति अगले 24 घंटों में क्या होगी या नहीं होगी, वो तय कर देगा रास्ता दुनिया का जा किस दिशा में रहा है।
मुख्य बातें (Key Points)
- अमेरिका का सबसे शक्तिशाली युद्धपोत USS अब्राहम लिंकन मिडिल ईस्ट पहुंच चुका है और अगले 24 घंटे बेहद महत्वपूर्ण हैं
- पहली बार यूएन में भारत, चीन और पाकिस्तान एक साथ ईरान के पक्ष में खड़े हुए, 7 देशों ने ईरान का समर्थन किया
- ईरान के पास 5000 से ज्यादा मिसाइलें, 600 लड़ाकू विमान और 10 लाख सैनिक हैं, चीन की मदद से परमाणु क्षमता विकसित की
- यूरोपीय यूनियन ने भारत को GSP सुविधा रद्द कर दी, 87% भारतीय माल पर 20% अतिरिक्त टैरिफ का बोझ
- चाबहार पोर्ट पर अप्रैल के बाद अमेरिकी प्रतिबंध बढ़ने से भारत के आर्थिक हितों को खतरा
- ईरान के सर्वोच्च नेता खामनेई अमेरिकी ड्रोन हमले के डर से अंडरग्राउंड, ट्रंप ने सत्ता परिवर्तन की बात कही
- मिडिल ईस्ट के 18 अमेरिकी सैन्य और नौसैनिक बेस ईरान के निशाने पर, पूरा क्षेत्र युद्ध में फंस सकता है








