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Republic Day 2026: क्या भारतीय डरपोक हो रहे हैं? निर्भीकता का स्केल क्यों जरूरी

गणतंत्र दिवस पर बड़ा सवाल - ट्रंप के सामने भारत क्यों चुप, जबकि कनाडा-ब्रिटेन-फ्रांस बोले?

The News Air Team by The News Air Team
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Republic Day India Fearlessness Scale: 26 जनवरी, गणतंत्र दिवस के अवसर पर एक बड़ा सवाल उठ रहा है – क्या भारत के नागरिक और सरकार निर्भीकता के मामले में पीछे रह गए हैं? जब कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने डोनाल्ड ट्रंप की खुलकर आलोचना की, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने जवाब दिया और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी बोला, तब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुप क्यों रहे? यह सवाल अब राजनीतिक और बौद्धिक हलकों में गूंज रहा है।


निर्भीकता का स्केल क्या है और क्यों जरूरी?

एक नई अवधारणा सामने आ रही है – निर्भीकता का स्केल (Scale of Courage)। यह स्केल सेंटीमीटर या मिलीमीटर से नहीं भरा होना चाहिए। इसमें एक छोर पर निर्भीकता लिखी हो और दूसरे छोर पर दब्बूपन।

बीच में भीड़ लिखी जा सकती है क्योंकि भीड़ बनते हुए दब्बू साहसिक महसूस करने लगता है या भीड़ देखते ही निर्भीक डरपोक महसूस करने लगता है।

यह स्केल हर दिन बताएगा कि नगरपालिका से लेकर न्यायपालिका कितनी स्वायत्त है, कितनी निर्भीक है और कितनी दब्बू है।


संजय बारू ने क्या लिखा?

वरिष्ठ पत्रकार संजय बारू ने अपने लेख में लिखा है कि भारत यह मौका चूक गया। कार्नी ने जैसा भाषण दिया है वैसा भाषण किसी निर्गुण देश को नहीं बल्कि भारत को देना चाहिए था।

बारू ने पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंडोनेशिया के सुकर्णो और मिस्र के गमाल अब्देल नासिर को याद किया। उन्होंने कहा कि कोई और दौर होता तो यही भाषण भारत के प्रधानमंत्री ने दिया होता।

संजय बारू ने लिखा कि ट्रंप के कारण दिल्ली को अब समझ आ गया कि मोदी ट्रंप के सामने दब नहीं रहे हैं, लेकिन घुटनों पर न आने के बावजूद भी भारत अक्सर अमेरिका को खुश करने के लिए झुक जा रहा है।


दुनिया के नेताओं ने ट्रंप को कैसे जवाब दिया?

जब ट्रंप ने कहा कि नेटो को अमेरिका सब कुछ देता है मगर नेटो कभी मदद नहीं करता, तो उन्हीं के सामने नेटो के चीफ ने कह दिया कि नेटो ने हमेशा मदद की है, अफगानिस्तान में भी और आगे भी करेगा।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री स्टारमर ने ट्रंप के इस बयान की आलोचना करते हुए कहा कि अफगानिस्तान युद्ध में ब्रिटेन के 450 से अधिक सैनिक मारे गए और ट्रंप भूल गए हैं और गलत बोल रहे हैं।

कनाडा के प्रधानमंत्री कार्नी ने ट्रंप की आलोचना की और अमेरिका तथा अपने स्वार्थ में नियमों को कुचलने वाले पश्चिम के देशों की भी आलोचना की।


भारत क्यों नहीं बोल पाया?

सवाल उठता है कि क्या इस एक साल में भारत के प्रधानमंत्री मोदी को एक भी मौका नहीं मिला जिसमें वे ट्रंप के फालतू और संप्रभुता का अतिक्रमण करने वाले बयानों की निंदा कर सकते थे?

चीन ने बोला, रूस ने भी बोला, ब्रिटेन, फ्रांस, डेनमार्क, कनाडा सब ने ही बोला। भारत के प्रधानमंत्री केरल और बंगाल के बहाने घुसपैठ और मुस्लिम लीग पर भाषण दे रहे हैं।

जो मजबूत माने जाते थे वे चुप रह गए और जो दब्बू माने जाते थे उन्होंने हिम्मत दिखा दी।


ओडिशा में पादरी पर हमला – भीड़ की निर्भीकता?

ओडिशा में एक पादरी के घर पर हमला हुआ। पादरी बिपिन बिहारी नायक के घर भीड़ घुस गई। उन्हें मारा-पीटा गया, चप्पलों की माला पहनाई गई, चेहरे पर सिंदूर लगा दिया गया और मंदिर के सामने झुकने पर मजबूर किया गया।

पादरी के मुंह में गोबर ठूसने की बात भी आई मगर पुलिस का कहना है कि परिवार ने इस बात की शिकायत नहीं की है।

पादरी की पत्नी की शिकायत के बाद मकान मालिक ने घर खाली करने के आदेश दे दिए। इंडियन एक्सप्रेस के सुजीत बिश्नोई से बात करते हुए पादरी के भाई ने कहा कि उन्हें नहीं लगता उनका भाई अब उस गांव में वापस जाने की हिम्मत रख पाएगा जहां वो 8 साल से रह रहा था।


क्या धर्म का पालन करना पाप है?

पादरी के भाई ने पूछा – क्या अपने धर्म का पालन करना पाप है? क्या हमारे देश में यह मौलिक अधिकार नहीं?

मौलिक अधिकार है। धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार है। संविधान में सब कुछ है। फिर यह भीड़ कैसे बन जाती है जो घरों में घुस जाती है?

क्या धर्म की रक्षा का काम भीड़ के हवाले कर दिया गया है? यह पहली घटना नहीं है। आए दिन ऐसी घटनाएं होती रहती हैं।


राहुल गांधी का ‘डरो मत’ नारा

2022 में भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने ‘डरो मत’ का नारा दिया था। उन्होंने कहा था – “किसी चीज से डरो मत। मैं नरेंद्र मोदी की बात नहीं कर रहा। मैं आरएसएस की बात नहीं कर रहा। जिंदगी में किसी चीज से डरो मत। कभी नहीं डरो।”

राहुल ने कहा था – “अगर डरोगे नहीं तो किसी से नफरत करोगे नहीं। अपने दिल में से डर को निकाल दो।”

2023 में जब राहुल गांधी को मानहानि के मामले में सजा हुई और उनकी सांसदी चली गई तब कांग्रेस के नेताओं ने अपनी प्रोफाइल पिक्चर में राहुल की फोटो के साथ ‘डरो मत’ का नारा लगाया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को खारिज कर दिया।


दुस्साहस है, निर्भीकता नहीं

भारत में दुस्साहस की कोई कमी नहीं है। नियम तोड़ने में, किसी की जमीन कब्जा करने में, मजबूरी का फायदा उठाकर लाखों रिश्वत लेने में, करोड़ों की टैक्स चोरी करने में, चुनाव जीतने से पहले शराब बांटने, नोट बांटने में कहीं से नहीं लगता।

बहुत सारे रील दिखते हैं जिनमें विधायक से लेकर लफंगे तक कारों का काफिला बनाकर ताकत और बहादुरी का प्रदर्शन कर रहे हैं। तब तो नहीं लगता भारत में निर्भीकता की कमी है।

लेकिन जैसे ही गलत का सवाल आता है, गलत के विरोध का सवाल आता है, मैदान खाली हो जाता है, संस्थाएं भी नागरिकों का साथ छोड़ देती हैं।


बहादुरी का पुरस्कार किसे मिले?

जिस भारत में बाल बहादुरों को प्रोत्साहित किया जाता है, उस भारत में पुलिस के दमन का विरोध करने वाले नागरिकों की बहादुरी का सम्मान क्यों नहीं होता?

संभल के जिला जज विभांशु सुधीर ने 20 पुलिसवालों के खिलाफ FIR दायर करने के आदेश दिए। आदेश देने के बाद ही उनका तबादला हो गया। 13 साल में उनका 16वां तबादला है।

राजस्थान के जज दिनेश कुमार गुप्ता ने अडानी समूह की कंपनी पर 4000 करोड़ का जुर्माना लगाने के आदेश दिए और उसके बाद उनका तबादला हो गया।

गौरी लंकेश की हत्या के आरोपियों को बेल मिली और आज वह निकाय चुनाव जीत गए। छत्तीसगढ़ के पत्रकार मुकेश चंद्राकर को क्या मिला?

नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पंसारे, एमएम कलबुर्गी की हत्या कर दी गई। क्या उनकी निर्भीकता को सम्मानित किया जाएगा?


संविधान सभा में महावीर त्यागी की चेतावनी

16 सितंबर 1949 को संविधान सभा की बैठक में प्रिवेंटिव अरेस्ट पर बहस हो रही थी। महावीर त्यागी ने डॉ. भीमराव अंबेडकर से कहा – “काश आप और ड्राफ्टिंग कमेटी के अन्य सदस्य ब्रिटिश हुकूमत के दौरान जेल का अनुभव कर चुके होते।”

महावीर त्यागी ने कहा – “एक ऐसा समय भी आ सकता है जब कोई सरकार ऐसी आएगी जो हमारे बनाए इन प्रावधानों का खुलकर अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ इस्तेमाल करेगी।”

उस समय लोगों को पता था कि अगर नागरिक विरोध नहीं करेंगे तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा।


गांधी का मंत्र – डरो मत, डराओ मत, नफरत छोड़ दो

महात्मा गांधी ने पूरा जीवन लगाया खुद को डर से आजाद करने का और देश को अंग्रेजों की यातना और जेल के डर से मुक्त कराने का। उनका सारा प्रयोग इसी डर और दब्बूपन के खिलाफ था।

गांधी के तीन शस्त्र थे – पहला “ईश्वर अल्लाह तेरे नाम”, दूसरा रविंद्रनाथ ठाकुर का गीत “एकला चलो रे” और तीसरा 15वीं सदी के कवि नरसी मेहता का “पीड़ पराई जाने रे”।

आज भारत गांधी को याद रखता तो भारत के प्रधानमंत्री ट्रंप के बयानों का जवाब देते, जैसे कनाडा और ब्रिटेन के प्रधानमंत्रियों ने दिया।


प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल की किताब

दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में 2 अक्टूबर 2005 को प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल ने भाषण दिया – “मजबूती का नाम महात्मा गांधी”।

उन्होंने कहा कि मजबूरी तो हिंसा की होती है। हिंसा करने वाला कहता है मजबूरी में हिंसा की। इसके बाद भी लोग अहिंसा को मजबूरी कैसे समझते हैं और हिंसा को ताकत?

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अब इसी लेक्चर को उन्होंने पुस्तक का रूप दिया है जो राजकमल प्रकाशन से छपी है।


संविधान सभा में गांधी और जिन्ना को श्रद्धांजलि

डॉ. राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष थे। 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या हुई। गांधी की हत्या से कुछ महीने पहले मोहम्मद अली जिन्ना का निधन हो चुका था।

28 फरवरी 1948 को संविधान सभा की बैठक में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने एक ही दिन एक ही साथ गांधी और जिन्ना दोनों को श्रद्धांजलि दी।

उन्होंने कहा – “हम सीमा के पार अपने भाइयों को अपनी श्रद्धांजलि भेजते हैं।” आज हर सवाल को विरोध के रूप में देखा जाता है।


मनोज झा का लेख – आज्ञाकारी vs भागीदार

राज्यसभा सांसद मनोज झा ने फ्रंटलाइन में लिखा है कि परिवार, स्कूल, धार्मिक संस्थान, आधुनिक राज्य सभी हमें आज्ञाकारी होने की ट्रेनिंग देते हैं, लेकिन सत्ता को कैसे देखा जाए इसकी समझ नहीं देते।

वोट देने से पहले लोग चुप रहने के अनुशासन में जीने के आदी हो गए हैं। लेकिन लोकतंत्र केवल आज्ञाकारी होने से नहीं चलता। लोकतंत्र चलता है नागरिकों की असहमति से, विरोध करने से।

निरंकुशता घोषणा करके नहीं आती। नियम, कानून, प्रक्रियाओं का सहारा लेकर चुपचाप आती रहती है और एक दिन दिल और देश पर बैठ जाती है।


विश्लेषण: बिना निर्भीकता के नागरिकता अधूरी

नहीं बोलने से, डर से नहीं बोलने से आप कागज पर तो नागरिक रहेंगे लेकिन रहेंगे एक लाश की तरह। बिना निर्भीकता के नागरिक अपना संवैधानिक विस्तार नहीं कर सकता। संविधान मजबूत हो ही नहीं सकता। नागरिक अधिकार संविधान की धाराओं में ही सिमट कर रह जाएंगे और इन धाराओं से नई कल्पनाओं का निकलना बंद हो जाएगा। विरोध और बहिष्कार की परंपरा की बुनियाद निर्भीकता से आती है और इसीलिए भारत में निर्भीकता का स्केल बनाने की जरूरत है।


मुख्य बातें (Key Points)
  • कनाडा के कार्नी, ब्रिटेन के स्टारमर और फ्रांस के मैक्रों ने ट्रंप को जवाब दिया लेकिन भारत के प्रधानमंत्री मोदी चुप रहे
  • ओडिशा में पादरी बिपिन बिहारी नायक पर भीड़ ने हमला किया, चप्पलों की माला पहनाई और मंदिर के सामने झुकने पर मजबूर किया
  • संभल के जज ने पुलिस के खिलाफ FIR का आदेश दिया तो 13 साल में 16वां तबादला हो गया
  • गांधी का मंत्र था ‘डरो मत, डराओ मत, नफरत छोड़ दो’ लेकिन आज का भारत निर्भीकता का प्रयोग भूल चुका है
  • लोकतंत्र केवल आज्ञाकारी होने से नहीं चलता, असहमति और विरोध से चलता है

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न: गणतंत्र दिवस का क्या महत्व है?

उत्तर: 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ था जिसने नागरिकों को मौलिक अधिकार दिए। इसी दिन भारत गणतंत्र बना और हर साल यह दिन गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है।

प्रश्न: निर्भीकता का स्केल क्या है?

उत्तर: यह एक अवधारणा है जिसमें नागरिकों और संस्थाओं की निर्भीकता या दब्बूपन को मापा जा सकता है। एक छोर पर निर्भीकता और दूसरे छोर पर दब्बूपन होगा।

प्रश्न: भारत ने ट्रंप को जवाब क्यों नहीं दिया?

उत्तर: यह सवाल उठ रहा है कि जब कनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस के नेताओं ने ट्रंप की आलोचना की तो भारत के प्रधानमंत्री ने क्यों नहीं बोला। संजय बारू के अनुसार भारत अमेरिका को खुश करने के लिए झुक जा रहा है।

प्रश्न: संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार क्या है?

उत्तर: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25-28 में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है जिसके तहत हर नागरिक को अपने धर्म का पालन करने का मौलिक अधिकार है।

प्रश्न: गांधी का मंत्र क्या था?

उत्तर: महात्मा गांधी का मंत्र था – “डरो मत, डराओ मत, नफरत छोड़ दो।” उनके तीन शस्त्र थे – ईश्वर अल्लाह तेरे नाम, एकला चलो रे और पीड़ पराई जाने रे।

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