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Yogi vs Shankaracharya: चारों शंकराचार्य दिल्ली कूच को तैयार, BJP में हड़कंप!

उप-शीर्षक: मौनी अमावस्या विवाद के बाद संत समाज में भारी नाराजगी, योगी प्रशासन पर सीधे हमले, क्या हिंदुत्व की राजनीति पर मंडराया खतरा?

The News Air Team by The News Air Team
शुक्रवार, 23 जनवरी 2026
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Yogi vs Shankaracharya
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 Yogi Adityanath Shankaracharya Controversy : उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और देश के चारों शंकराचार्यों के बीच एक ऐसी टकराव की स्थिति पैदा हो गई है जिसने पूरी भारतीय राजनीति को हिलाकर रख दिया है। प्रयागराज में मौनी अमावस्या के दिन जो कुछ हुआ, उसके बाद अब चारों शंकराचार्य दिल्ली कूच करने की तैयारी में हैं।

यह टकराव सिर्फ एक घटना का नहीं है, बल्कि धर्म और राजनीति के बीच उस महीन लकीर का है जो पहली बार इतने खुले तौर पर टूटती दिखाई दे रही है।


मौनी अमावस्या पर क्या हुआ था?

18 जनवरी को मौनी अमावस्या के दिन प्रयागराज में करीब 4 करोड़ श्रद्धालु संगम में आस्था की डुबकी लगाने पहुंचे थे। इसी दिन ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपनी टीम के साथ संगम स्नान के लिए जा रहे थे। आरोप है कि उनकी टीम ने पोंटून पुल के बैरियर को तोड़ते हुए बिना अनुमति बग्गी के साथ संगम की तरफ जाने की कोशिश की। इसके बाद वहां भगदड़ जैसी स्थिति पैदा हो गई और पुलिस प्रशासन ने शंकराचार्य के शिष्यों के साथ जो व्यवहार किया, वह तस्वीरों में दिखा भी।


प्रशासन ने भेजे दो नोटिस

इस घटना के बाद प्रशासन ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को एक नहीं बल्कि दो नोटिस थमा दिए। पहले नोटिस में कहा गया कि आप साबित करें। दूसरे नोटिस में 48 घंटे का समय देते हुए कहा गया कि आप शंकराचार्य हैं या नहीं, यह प्रमाणित करना होगा।

प्रशासन का रुख यह था कि वे मानते ही नहीं कि अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि उन्हें दी गई जमीन और सुविधाएं छीन ली जाएंगी। माघ मेले में प्रतिबंधित कर दिया जाएगा।


शंकराचार्य का करारा जवाब

इन नोटिसों पर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि प्रशासन नोटिस का खेल खेल रहा है। उन्होंने कहा, “मेरा मौनी अमावस्या का स्नान भी अभी नहीं हुआ है, तो मैं वसंत का स्नान कैसे करूंगा? पहले मौनी अमावस्या का स्नान करूंगा।”

उनका सवाल था कि यह प्रशासन कैसे तय करेगा कि कौन शंकराचार्य है? भारत के राष्ट्रपति को भी यह अधिकार नहीं है। शंकराचार्य का निर्णय शंकराचार्य ही करते हैं।


चारों शंकराचार्य एकजुट

यह पहली बार है जब देश के चारों शंकराचार्य एक साथ खड़े हो गए हैं। गोवर्धन पीठ (पुरी) के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती से जब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पूछा था, तो उन्होंने मौन स्वीकृति दी थी।

शारदा मठ (द्वारका) के स्वामी सदानंद सरस्वती ने खुलकर सहमति जताई कि अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य हैं। श्रृंगेरी मठ (कर्नाटक) के स्वामी भारती तीर्थ भी उनके साथ खड़े हैं।

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संत समाज की तीखी नाराजगी

द्वारकापीठ के शंकराचार्य सदानंद महाराज ने कहा कि प्रशासन को शंकराचार्य से माफी मांगनी चाहिए। यह शासन का अहंकार है। उनकी अगली लाइन और भी तीखी थी – “सत्ता हमेशा नहीं रहती।”

पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने कहा कि धार्मिक छत्र का नेतृत्व सरकार अपने पास रखना चाहती है। जगतगुरु रामानुजाचार्य ने साफ कहा कि प्रशासन को माफी मांगकर विवाद खत्म करना चाहिए और अगर जरूरत पड़ी तो संत समाज दिल्ली जाकर आंदोलन करेगा।


शंकराचार्य पर संतों का सीधा हमला

एक संत ने योगी आदित्यनाथ पर सीधा निशाना साधते हुए कहा, “योगी के लिए धर्म और राष्ट्र से बढ़कर कुछ नहीं होना चाहिए। उसकी व्यक्तिगत प्रॉपर्टी कुछ नहीं होती। धर्म ही उसकी प्रॉपर्टी है।”

एक और तीखी टिप्पणी आई, “यह हिंदू कहने के लायक नहीं है। 150 से ज्यादा मंदिर तोड़ दिए गए, एक शब्द नहीं निकला इसके मुंह से। मुख्यमंत्री की गद्दी को महत्वपूर्ण समझने वाला हिंदू नहीं हो सकता। वो सत्ता रूपी है।”


बीफ एक्सपोर्ट का मुद्दा

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने एक और बड़ा मुद्दा उठाया जिसने सबको चौंका दिया। उन्होंने कहा कि जब योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने थे, तो गोरखपीठ के महंत होने के नाते उम्मीद थी कि कम से कम उत्तर प्रदेश में गौ माता की हत्या नहीं होगी।

लेकिन आज भी टनों-टन कंटेनर पकड़े जा रहे हैं। किसी भी देश के मॉल में जाइए, यूपी से एक्सपोर्ट किया गया बीफ मिल रहा है।आंकड़े चौंकाने वाले हैं – भारत आज दुनिया में बीफ एक्सपोर्ट में तीसरे नंबर पर है।

ब्राजील 3.7 मेट्रिक टन, ऑस्ट्रेलिया 1.9 मेट्रिक टन, भारत 1.56 मेट्रिक टन और अमेरिका 1.2 मेट्रिक टन एक्सपोर्ट करता है। 2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सत्ता में नहीं आए थे, तब भारत पांचवें नंबर पर था।


अंबानी-अडानी और शंकराचार्य का रिश्ता

यह भी दिलचस्प है कि अंबानी परिवार की शादी में शंकराचार्य को बुलाया गया था। वहां प्रधानमंत्री मोदी ने शंकराचार्य से आशीर्वाद लिया और उन्होंने एक माला भी भेंट की। अडानी के निवास पर भी शंकराचार्य को बुलाया गया था। कई राज्यों में शंकराचार्य को स्टेट गेस्ट का दर्जा प्राप्त है। सनातन परंपरा में शंकराचार्य को भगवान शिव के समान माना जाता है।


योगी का पक्ष

दूसरी तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कहना है कि 18 जनवरी को मौनी अमावस्या के दिन 4 करोड़ श्रद्धालुओं ने संगम में आस्था की डुबकी लगाई।

उनका मानना है कि हमारा दायित्व है कि हम हर उस प्रतीक को सम्मान दें जो हमारे ऋषि-मुनियों, संतों और शास्त्रों ने जिसके लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि किसी को यह अधिकार नहीं कि वह देव तुल्य नदियों को प्रदूषित करे या उनकी अविरलता को बाधित करे।


संघ और बीजेपी में खामोशी

इस पूरे टकराव के बीच आरएसएस और बीजेपी में एक अजीब खामोशी है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी इस मामले पर चुप्पी साधी हुई है।याद रहे कि 2017 में जब योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया गया था, तो दिल्ली की पसंद मनोज सिन्हा थे। लेकिन संघ ने योगी के पक्ष में खड़े होकर उन्हें मुख्यमंत्री बनवाया था।


इंदिरा गांधी का सॉफ्ट हिंदुत्व

इतिहास के पन्ने पलटें तो 1970 में जब आरएसएस के स्वयंसेवक एकनाथ रानडे ने विवेकानंद शिला स्मारक का कार्य पूरा किया, तो इंदिरा गांधी ने एक चतुर चाल चली।

उन्होंने रानडे को समझाया कि स्वामी विवेकानंद के विचार फैलाने में सरकार मदद करेगी, लेकिन एक शर्त है – स्वामी विवेकानंद को “हिंदू संत” की जगह “भारतीय संत” कहा जाए।

रानडे ने इस पर सहमति जता दी और 1971 की संघ प्रतिनिधि सभा में उन्होंने इस स्मारक की रिपोर्ट नहीं रखी। यह कांग्रेस की सॉफ्ट हिंदुत्व की वह रणनीति थी जिसे आज की कांग्रेस शायद समझ नहीं पाती।


विपक्ष ने साधा निशाना

समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) ने इस मौके को भुनाते हुए बीजेपी पर निशाना साधा है। सभी दल शंकराचार्य के मुद्दे पर योगी आदित्यनाथ और उनके प्रशासन को घेर रहे हैं।


‘क्या है पूरी पृष्ठभूमि’

भारत में धर्म और राजनीति का गठजोड़ नया नहीं है। अयोध्या आंदोलन से लेकर राम मंदिर तक, बीजेपी ने हिंदुत्व की राजनीति को अपनी पहचान बनाया। योगी आदित्यनाथ खुद गोरखपीठ के महंत से मुख्यमंत्री बने। उनकी भगवा पहचान बीजेपी और संघ के लिए एक प्रतीक रही है।

लेकिन अब पहली बार वही संत समाज जिसके आशीर्वाद से बीजेपी सत्ता तक पहुंची, वह खुलकर सड़क पर उतरने की बात कर रहा है। यह टकराव सिर्फ एक घटना का नहीं, बल्कि उस पूरी राजनीतिक व्यवस्था का है जहां धर्म के नाम पर सत्ता साधी गई लेकिन धर्म की मर्यादा की अनदेखी होती गई।


‘मुख्य बातें (Key Points)’
  • मौनी अमावस्या पर प्रयागराज में शंकराचार्य की टीम के साथ प्रशासन का विवाद हुआ
  • चारों शंकराचार्य एकजुट होकर दिल्ली कूच की तैयारी में हैं
  • संत समाज ने योगी सरकार से माफी की मांग की, नहीं तो आंदोलन की धमकी दी
  • भारत दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा बीफ एक्सपोर्टर है – यह मुद्दा भी उठा
  • बीजेपी और संघ की हिंदुत्व की राजनीति पर पहली बार इतना बड़ा सवाल

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q1. शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद कौन हैं?

A. वे ज्योतिष पीठ (उत्तराखंड) के शंकराचार्य हैं। सनातन परंपरा में शंकराचार्य को भगवान शिव के समान माना जाता है।

Q2. मौनी अमावस्या विवाद क्या है?

A. 18 जनवरी 2025 को प्रयागराज में शंकराचार्य की टीम और प्रशासन के बीच बैरियर तोड़ने को लेकर विवाद हुआ। इसके बाद प्रशासन ने उन्हें नोटिस भेजे।

Q3. भारत में कितने शंकराचार्य हैं?

A. भारत में चार प्रमुख मठ हैं – ज्योतिष पीठ (उत्तराखंड), गोवर्धन पीठ (पुरी), शारदा मठ (द्वारका), और श्रृंगेरी मठ (कर्नाटक)। इन चारों के शंकराचार्य अलग-अलग हैं।

Q4. संत समाज दिल्ली क्यों जा रहा है?

A. शंकराचार्य के अपमान के विरोध में और योगी प्रशासन से माफी की मांग को लेकर संत समाज दिल्ली में आंदोलन की तैयारी कर रहा है।

Q5. इस विवाद का बीजेपी पर क्या असर होगा?

A. बीजेपी की हिंदुत्व की राजनीति पर यह पहला बड़ा धार्मिक संकट है। संत समाज की नाराजगी उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजनीति दोनों को प्रभावित कर सकती है।

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