Magh Mela Controversy : 21 जनवरी 2026 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के दौरान बड़ा विवाद सामने आया। मौनी अमावस्या के दिन संगम स्नान से पहले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को मेला प्रशासन ने रोक दिया। इसके बाद झड़प, नोटिस, धरना और सुप्रीम कोर्ट की अवमानना तक के आरोपों ने आस्था के इस सबसे बड़े आयोजन को विवादों के केंद्र में ला दिया।

मौनी अमावस्या स्नान से पहले क्या हुआ
माघ मेले के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने शिष्यों के साथ पालकी में संगम स्नान के लिए जा रहे थे। इसी दौरान प्रयागराज माघ मेला प्राधिकरण ने उन्हें रोक दिया। आरोप है कि इस दौरान झड़प हुई, उनका छत्र टूट गया और शिष्यों के साथ मारपीट हुई। इस घटना से आहत होकर स्वामी ने धरना शुरू कर दिया और अन्न-जल त्याग दिया।
शंकराचार्य पद पर नोटिस क्यों जारी हुआ
मेला प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को औपचारिक नोटिस जारी कर पूछा कि वह स्वयं को ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य किस आधार पर बता रहे हैं। नोटिस में सुप्रीम कोर्ट में लंबित सिविल अपील संख्या 30/2020 और 31/2020 का हवाला दिया गया और अक्टूबर 2022 के उस आदेश का जिक्र किया गया, जिसमें ज्योतिष पीठ पर नए पट्टा अभिषेक पर रोक की बात कही गई थी। प्रशासन ने 24 घंटे में सबूत मांगे कि वह शंकराचार्य कैसे हैं।
स्वामी का जवाब और प्रेस कॉन्फ्रेंस
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने नोटिस का जवाब देते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने कहा कि उनका पट्टा अभिषेक सितंबर 2022 में हो चुका है और महाकुंभ की स्मारिका में उनकी तस्वीर शंकराचार्य के नाम से प्रकाशित हुई थी। उनका दावा है कि सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें शंकराचार्य कहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि आधी रात में नोटिस चिपकाया गया, जो नियमों के खिलाफ है।
कानूनी मोर्चा: अवमानना का आरोप
स्वामी की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता पी.एन. मिश्रा ने कहा कि प्रशासन द्वारा भेजा गया नोटिस सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना की श्रेणी में आता है। उनका तर्क है कि कोर्ट ने केवल नए अभिषेक पर रोक लगाई है, नाम के आगे शंकराचार्य लिखने पर नहीं।
भेदभाव और राजनीतिक प्रतिक्रिया
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने आरोप लगाया कि गौ रक्षा की बात करने के कारण उन्हें निशाना बनाया जा रहा है, जबकि अन्य संतों को शंकराचार्य लिखकर शिविर आवंटित किए गए। इस पूरे मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना करते हुए माफी की मांग की है।
विश्लेषण: आस्था बनाम प्रशासन
यह विवाद केवल एक संत और प्रशासन के बीच टकराव नहीं है, बल्कि आस्था, परंपरा और प्रशासनिक नियमों के टकराव का प्रतीक बन गया है। जहां प्रशासन नियमों और कोर्ट के आदेशों की बात कर रहा है, वहीं स्वामी इसे अपने सम्मान और विश्वास पर हमला बता रहे हैं। माघ मेला जैसे आयोजन में इस तरह का टकराव प्रशासन की संवेदनशीलता और संवाद क्षमता पर भी सवाल खड़े करता है।
जानें पूरा मामला
माघ मेले में मौनी अमावस्या के स्नान को लेकर शुरू हुआ विवाद अब शंकराचार्य पद, सुप्रीम कोर्ट के आदेश और अवमानना के आरोपों तक पहुंच चुका है। स्वामी अभी धरने पर हैं और प्रशासन से माफी की मांग कर रहे हैं। मामला सुलझेगा या अदालत तक जाएगा, इस पर सबकी नजर बनी हुई है।
मुख्य बातें (Key Points)
- मौनी अमावस्या पर संगम स्नान से रोके गए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद
- शंकराचार्य पद के दावे पर मेला प्रशासन का नोटिस
- सुप्रीम कोर्ट आदेश की व्याख्या पर टकराव
- राजनीतिक और कानूनी बयानबाजी तेज








