Cryptocurrency Tax : पिछले कुछ वर्षों में क्रिप्टोकरेंसी भारत की मुख्यधारा की वित्तीय चर्चा का अहम हिस्सा बन चुकी है। महानगरों से लेकर टियर-2 और टियर-3 शहरों तक, लाखों आम निवेशक आज डिजिटल एसेट्स में निवेश कर रहे हैं। ये निवेशक सिर्फ शॉर्ट-टर्म ट्रेडिंग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सिस्टमैटिक निवेश और संतुलित पोर्टफोलियो के जरिए लंबी अवधि में संपत्ति बनाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन तेजी से बदलती इस हकीकत के साथ भारत की मौजूदा टैक्स और रेगुलेटरी व्यवस्था अभी पूरी तरह तालमेल नहीं बैठा पा रही है।
क्रिप्टो निवेशकों का बदलता प्रोफाइल
भारत में क्रिप्टो निवेश अब केवल बड़े शहरों या हाई-प्रोफाइल निवेशकों तक सीमित नहीं है। छोटे शहरों के युवा, नौकरीपेशा लोग और रिटेल निवेशक भी डिजिटल एसेट्स को भविष्य की बचत और निवेश के विकल्प के रूप में देख रहे हैं। बढ़ती स्वीकार्यता यह संकेत देती है कि भारतीय निवेशक जिम्मेदारी के साथ इस नए एसेट क्लास से जुड़ने के लिए तैयार हैं।

2022 का टैक्स ढांचा और उसकी सख्ती
साल 2022 में वर्चुअल डिजिटल एसेट्स के लिए जो टैक्स ढांचा लागू किया गया था, उसके तहत मुनाफे पर 30 प्रतिशत का फ्लैट टैक्स और हर ट्रांजैक्शन पर 1 प्रतिशत टीडीएस लगाया गया। इसका मकसद ट्रांजैक्शन पर नजर रखना और निगरानी बढ़ाना था। लेकिन व्यवहार में 1 प्रतिशत टीडीएस ने ईमानदार निवेशकों के लिए कई मुश्किलें खड़ी कर दीं।
1% TDS से कैसे बढ़ी दिक्कतें
ट्रांजैक्शन पर लगने वाला 1 प्रतिशत टीडीएस निवेशकों की पूंजी को फंसा देता है। इससे बाजार में लिक्विडिटी घटती है और बार-बार या लंबे समय तक निवेश करना कठिन हो जाता है। नतीजतन, कई निवेशक भारतीय प्लेटफॉर्म छोड़कर विदेशी ऑफशोर एक्सचेंजों की ओर शिफ्ट हो गए।
सरकार को कितना हुआ नुकसान
ट्रांसक्रिप्ट के अनुसार, साल 2025 में करीब 4.87 लाख करोड़ रुपये का क्रिप्टो ट्रेडिंग वॉल्यूम विदेशी ऑफशोर प्लेटफॉर्म पर चला गया, जो भारत के टैक्स और रेगुलेटरी दायरे से बाहर है। 2022 से अब तक नियमों का पालन करने वाले भारतीय क्रिप्टो एक्सचेंजों के जरिए सरकार को लगभग 1,096 करोड़ रुपये का टीडीएस मिला। वहीं, गैर-नियमित विदेशी प्लेटफॉर्म पर ट्रांजैक्शन शिफ्ट होने से सरकार को करीब 11,000 करोड़ रुपये के टैक्स राजस्व के नुकसान का अनुमान है।
TDS घटाने से क्या बदल सकता है खेल
अगर टीडीएस की दर को घटाकर 0.1 प्रतिशत कर दिया जाए, जैसा कि अन्य वित्तीय बाजारों में होता है, तो ट्रांजैक्शन की पारदर्शिता बनी रह सकती है। साथ ही निवेशक भारतीय प्लेटफॉर्म पर बने रहने के लिए प्रोत्साहित होंगे, जिससे सरकार का टैक्स बेस भी मजबूत हो सकता है।
30% फ्लैट टैक्स पर भी सवाल
एक और बड़ी चिंता क्रिप्टो मुनाफे पर लगने वाला 30 प्रतिशत फ्लैट टैक्स है, जो न तो होल्डिंग पीरियड को देखता है और न ही निवेशक की आय को। इसके अलावा, नुकसान को मुनाफे से समायोजित करने की अनुमति भी नहीं है। जबकि शेयर और म्यूचुअल फंड जैसे अन्य एसेट क्लास में होल्डिंग पीरियड के हिसाब से टैक्स लगता है और लॉस एडजस्टमेंट की सुविधा मिलती है।
आम निवेशक पर असर
मौजूदा टैक्स सिस्टम के कारण छोटे और मध्यम निवेशक सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। ज्यादा टैक्स और सख्त नियम उन्हें लंबे समय के निवेश से हतोत्साहित कर रहे हैं, जिससे भारत में जिम्मेदार और स्थायी क्रिप्टो इकोसिस्टम का विकास रुक सकता है।
क्या है पृष्ठभूमि
क्रिप्टोकरेंसी की बढ़ती लोकप्रियता के बावजूद, भारत में इसका टैक्स ढांचा अब भी शुरुआती दौर में है। 2022 में बनाए गए नियम उस समय के जोखिमों को ध्यान में रखकर बनाए गए थे, लेकिन अब बाजार का आकार और निवेशकों की भागीदारी काफी बढ़ चुकी है। ऐसे में बजट 2026 से पहले इन नियमों की समीक्षा को सही समय माना जा रहा है।
मुख्य बातें (Key Points)
- भारत में क्रिप्टो निवेशकों की संख्या और विविधता तेजी से बढ़ी
- 2022 में लागू 30% टैक्स और 1% TDS से निवेशकों को परेशानी
- 4.87 लाख करोड़ का ट्रेडिंग वॉल्यूम विदेशी प्लेटफॉर्म पर शिफ्ट
- TDS घटाने और टैक्स ढांचे में सुधार से सरकार को भी फायदा संभव








