Indian Army Martyr : कड़ाके की सर्दी में जब लोग रजाइयों और हीटर के सहारे घरों में दुबके हुए थे, तब जम्मू के आरएसपुरा इलाके में एक मां अपने दिल की आवाज सुनते हुए घर से निकल पड़ी। वह रठाना मोड़ (गुरनाम सिंह चौक) पहुंची, जहां अपने बलिदानी बेटे की प्रतिमा के सामने खड़ी होकर उसकी ठंड की चिंता में आंखों से आंसू बहाते हुए कंबल ओढ़ा दिया। यह दृश्य सिर्फ भावुक नहीं, बल्कि शहादत और ममता की अमर कहानी बन गया।

कौन थीं वह मां और किसके लिए छलके आंसू
यह मां हैं जसवंत कौर, जिनके बेटे गुरनाम सिंह देश की रक्षा करते हुए बलिदान हो गए थे। जसवंत कौर ने कहा कि इतनी सर्दी में उनका बेटा कैसे ठंड में खड़ा रह सकता है। मां का दिल कैसे मान जाता। इसलिए वह हाथों में कंबल लेकर बेटे की प्रतिमा तक पहुंचीं और उसे ओढ़ा दिया।
शहादत की तारीख और वीरता की कहानी
22 अक्टूबर 2016 को Border Security Force के जवान गुरनाम सिंह जम्मू के सांबा सेक्टर की अग्रिम चौकी बोबिया में आतंकियों से मुकाबला करते हुए मातृभूमि की रक्षा में शहीद हो गए थे। उनकी बहादुरी के सम्मान में आरएसपुरा के रठाना मोड़ पर उनकी प्रतिमा स्थापित की गई, जिसे आज लोग गुरनाम सिंह चौक के नाम से जानते हैं।
मां की यादों में जिंदा है बेटा
प्रतिमा के पास खड़ी जसवंत कौर ने बताया कि गुरनाम सिंह को बचपन से ही ठंड बहुत लगती थी। अक्टूबर आते ही वह रजाई निकलवा लेता था और ड्यूटी के दौरान भी घर फोन कर गर्म कपड़े और कंबल मंगवाता था। मां के लिए आज भी वह आदतें जिंदा हैं, इसलिए प्रतिमा को कंबल ओढ़ाना उनके लिए स्वाभाविक था।
पिता की खामोशी में छिपा गर्व और दर्द
शहीद के पिता कुलबीर सिंह चुपचाप बेटे की प्रतिमा को निहारते रहे। उनकी खामोशी में गर्व भी था और टूटे दिल का दर्द भी। उन्होंने बताया कि बलिदान के बाद कई वादे किए गए थे। BSF ने बेटी को नौकरी दी, जिसकी अब शादी हो चुकी है, लेकिन जम्मू-कश्मीर सरकार की ओर से घोषित ₹5 लाख की सहायता राशि आज तक नहीं मिली।
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स्मारक की हालत पर मां की चिंता
जसवंत कौर ने यह भी कहा कि जिस चौक पर प्रतिमा लगी है, वह जगह काफी छोटी है। कई बार वहां से गुजरने वाले वाहन स्मारक से टकरा जाते हैं, जिससे उनका कलेजा कांप उठता है। यह दर्द सिर्फ एक मां का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का सवाल भी है, जो शहीदों की स्मृतियों की सुरक्षा की जिम्मेदार है।
मानवीय असर (Human Impact)
यह घटना हर उस परिवार को छू जाती है, जिसने देश के लिए अपनों को खोया है। यह बताती है कि शहीद कभी मरते नहीं, वे अपनी मां की ममता और देश के सम्मान में हमेशा जिंदा रहते हैं।
विश्लेषण (Analysis)
इस दृश्य ने एक बार फिर साबित किया कि शहादत सिर्फ सीमाओं पर नहीं, बल्कि घरों के भीतर भी रोज जी जाती है। मां का कंबल ओढ़ाना एक भावनात्मक क्रिया जरूर है, लेकिन यह सिस्टम के लिए आईना भी है—क्या हम शहीदों और उनके परिवारों के वादों को उतनी ही गंभीरता से निभाते हैं, जितनी श्रद्धा से उनकी कहानियां सुनते हैं।
मुख्य बातें (Key Points)
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कड़ाके की सर्दी में मां ने शहीद बेटे की प्रतिमा को कंबल ओढ़ाया
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BSF जवान गुरनाम सिंह 22 अक्टूबर 2016 को शहीद हुए थे
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मां जसवंत कौर आज भी बेटे की आदतों को याद करती हैं
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पिता कुलबीर सिंह ने सरकारी वादों के अधूरे रहने की बात कही
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यह घटना शहादत और ममता की अमर मिसाल बनी








