India Economy 2025 : साल 2025 खत्म हो रहा है और 2026 की दस्तक हो चुकी है। लेकिन इस नए साल का जश्न मनाने से पहले भारत को कुछ कड़वी सच्चाइयों का सामना करना जरूरी है। इस बीते साल में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को रुपये की कीमत बचाने के लिए 3.5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के डॉलर बाजार में बेचने पड़े, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है।
रुपये को बचाने की जद्दोजहद: 32 बिलियन डॉलर बेचे गए
भारत की अर्थव्यवस्था के सामने इस साल सबसे बड़ी चुनौती रुपये की गिरती कीमत को संभालना रही। आरबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी से अक्टूबर तक हर महीने औसतन 3 बिलियन डॉलर बाजार में बेचे गए। दस महीनों में यह आंकड़ा लगभग 32 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया।
यह सब इसलिए करना पड़ा ताकि रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले 100 के पार न चली जाए। एक समय था जब 75 रुपये प्रति डॉलर को अमृतकाल का प्रतीक माना जाता था, लेकिन धीरे-धीरे यह 90 के करीब पहुंच गया और सरकार के माथे पर कोई शिकन तक नहीं आई।
चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था का दर्द: प्रति व्यक्ति आय 2013 से नीचे
सरकार ने बड़े गर्व से ऐलान किया कि भारत दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है और 2030 तक तीसरी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। लेकिन इस चौथी अर्थव्यवस्था के भीतर का सच कुछ और ही कहानी बयान करता है।
भारत में जो कमाई है, वह घटते-घटते 2013 के स्तर से भी नीचे आ गई है। अगर इस देश के 90 प्रतिशत लोगों की प्रति व्यक्ति आय देखी जाए तो हैरानी होगी कि भारत उन अफ्रीकी देशों की कतार में खड़ा है जहां प्रति व्यक्ति आय सालाना 1 लाख रुपये से भी कम है। भारत में तो यह आंकड़ा घटकर लगभग 89,000 रुपये सालाना रह गया है।
ढिंढोरा पीटा जा रहा है कि भारत चौथी बड़ी इकॉनमी हो गया, लेकिन असमानता चरम पर पहुंच चुकी है।
भारत छोड़कर जा रहे हैं लोग: चीन को भी पीछे छोड़ा
भारत की एक नई पहचान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उभरी है और यह पहचान उन लोगों की तादाद से जुड़ी है जो रोजगार के लिए देश छोड़कर विदेश जा रहे हैं। भारत ने इस मामले में चीन को भी पीछे छोड़ दिया है।
सबसे बड़ी संख्या में भारतीय अब दुनिया के अलग-अलग देशों में बस रहे हैं और यह आंकड़ा करोड़ों में पहुंच चुका है। चाहे अमेरिका हो, ऑस्ट्रेलिया हो या यूरोपियन देश – हर जगह भारतीयों की मौजूदगी बढ़ती जा रही है।
इसके साथ ही एक और चिंताजनक बात यह है कि 2014 की जो तस्वीर हुआ करती थी, वह अब छिछली हो चली है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीयों की पहचान अब इस निशानदेही के साथ जुड़ गई है कि भारत का समाज अब सेकुलर नहीं रहा।
रईसों का पलायन: दुनिया के 60 प्रतिशत बिलेनियर्स भारत से
भारत के रईसों की तादाद देश छोड़ने वालों में इतनी बढ़ गई है कि यह आंकड़ा चौंकाने वाला है। दुनिया के तमाम देशों से अपना देश छोड़कर जाने वाले बिलेनियर्स की संख्या अगर जोड़ी जाए तो उसमें लगभग 60 प्रतिशत बिलेनियर्स भारत के नजर आएंगे।
ये लोग भारत छोड़कर दुनिया के दूसरे देशों में जाकर कमाई कर रहे हैं या फिर वहां रहकर भारत को गवर्नमेंट नेक्सस के सहारे लूट रहे हैं। यह एक ऐसी स्थिति है जो पहले कभी नहीं देखी गई।
भूख की हकीकत: 5 किलो अनाज से परे का सच
भारत की पहचान अब उस भूख से भी जुड़ गई है जो गरीब कल्याण योजना के नाम पर 5 किलो अनाज देकर वाहवाही तो बटोरती है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है।
आईएमएफ (IMF), वर्ल्ड बैंक, एशियन डेवलपमेंट बैंक और विकसित देशों के बैंक भारत को आर्थिक मदद इसी तर्ज पर बढ़ाते हैं जैसे भारत गरीबों को 5 किलो अनाज देता है। बैंकों के जरिए भारत को लोन मिलता है और इस मामले में भारत दुनिया के तमाम देशों की कतार में सबसे आगे खड़ा है।
सियासी ताना-बाना: नफरत और हमलों का दौर
इस देश के भीतर की सियासी परिस्थितियां पहली बार इतनी नाजुक हुई हैं। पहली बार इस स्तर पर नफरत है, पहली बार इस तरह के हमले हैं जो इससे पहले कभी देखे नहीं गए।
तीन बातें खुलकर सामने आई हैं। पहला, इस देश की राजनीतिक सत्ता अब चाहकर भी लिबरल नहीं हो सकती। दूसरा, दुनिया के अखबारों में भारत पर छपने वाली रिपोर्ट्स अब भारत के गवर्नेंस के उस ताने-बाने को छापने से कतराती नहीं हैं जो पहले कभी था ही नहीं।
तीसरा, वैचारिक तौर पर संघ की सोच अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जिस रूप में रेंगने लगी है, उसे तानाशाही भी कहा जाता है। ऐसी परिस्थिति पहले कभी नहीं थी।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति: भारत कहां खड़ा है?
2025 ने पूरी दुनिया को बदलकर रख दिया और भारत एक अद्भुत पायदान पर खड़ा है। जनवरी में वाशिंगटन में क्वाड की बैठक विदेश मंत्रियों के बीच हुई थी। भारत के विदेश मंत्री, अमेरिकी विदेश मंत्री, ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्री और जापान के विदेश मंत्री मौजूद थे। चीन ने विरोध किया था।
लेकिन संयोग देखिए, साल बीतते-बीतते कल ही चीन के बीजिंग शहर में क्वाड के राजदूतों की बैठक हुई और चीन विरोध नहीं कर पाया। यह बदलाव दिखाता है कि 2025 ने कितना कुछ बदल दिया।
डोनाल्ड ट्रंप के शपथ लेने के साथ ही भारत की तस्वीर बदलने लगी। भारत और अमेरिका के रिश्ते कैसे आगे बढ़ेंगे, यह आज तक सुलझ नहीं पाया है। टैरिफ का रास्ता अटका हुआ है, इसीलिए डॉलर की कीमत बढ़ रही है और रुपये को बचाने के लिए डॉलर बेचने पड़ रहे हैं।
भारत की अजीब स्थिति: सबके साथ, लेकिन कौन है साथ?
रूस और अमेरिका टकराते हैं, भारत हर किसी के साथ है। रूस और यूक्रेन का युद्ध होता है, भारत हर किसी के साथ है। चाइना और अमेरिका टकराते हैं, भारत सहमति जताता है। इजराइल और ईरान टकराते हैं, फिलिस्तीन और गाजा पट्टी पर सवाल खड़े होते हैं, भारत हर किसी के साथ है।
लेकिन एक सवाल जो कोई भी पूछ सकता है – भारत के साथ इस वक्त कौन-कौन से देश हैं? पड़ोसियों की लंबी कतार है – अफगानिस्तान, श्रीलंका, म्यांमार, भूटान, नेपाल, बांग्लादेश। इस पूरी कतार में भारत के साथ कौन खड़ा है?
चीन के हथियार और युद्धक विमान पाकिस्तान के साथ खड़े हैं। भारत चीन के कच्चे माल पर निर्भर है। भारत अब रूस से उतना तेल नहीं लेता क्योंकि अमेरिका ने पाबंदी लगाई है। भारत खड़ा कहां है? न वह पूरी तरह अमेरिका के साथ है, न रूस के साथ, न चीन के साथ।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन का अंत
इस दौर में कोई गुटनिरपेक्ष आंदोलन नहीं बचा है जिसकी अगुवाई कभी भारत करता था। दुनिया के लगभग 100 देश उस आंदोलन के सदस्य थे।
पहली बार 2014 में गुटनिरपेक्ष आंदोलन की बैठक हुई तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि नहीं जाएंगे। अब व्यवस्था बदल रही है और आने वाले वक्त में यह और बदलेगी।
महंगाई का आलम: सोना-चांदी के दाम आसमान पर
रोजमर्रा की जिंदगी पर महंगाई का असर देखना है तो सोने-चांदी के दाम देखिए। पिछले साल 31 दिसंबर को 24 कैरेट सोने की कीमत 76,210 रुपये प्रति 10 ग्राम थी, जो आज बढ़कर 78,399 रुपये हो चुकी है।
1 किलो चांदी पिछले साल 86,173 रुपये में मिलती थी, जो आज 92,943 रुपये में मिलती है। सवाल यह है कि एक साल में दाम कितने बढ़े और आपकी कमाई कितनी बढ़ी?
बैंकों का खेल: 25 लाख करोड़ का राइट ऑफ
बैंकों में आम लोगों का पैसा जमा होता है। उन बैंकों से रईसों को कर्ज दिया जाता है। वह कर्ज वापस नहीं आता। सरकार उसे राइट ऑफ कर देती है और बैंकों की बैलेंस शीट ठीक करने के लिए 25 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा दे दिए गए।
हर साल 1 लाख करोड़ से ज्यादा रईसों को बैंक कर्ज के तौर पर बांट देता है, लेकिन वह वापस नहीं आता। इसी बीच आरबीआई सरकार को 1 लाख करोड़ से ज्यादा का डिविडेंड देता है।
प्रचार-प्रसार का बजट: 9.5% से बढ़कर 13% हुआ
इस देश में जितनी योजनाएं चल रही हैं, उन योजनाओं के प्रचार-प्रसार पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ रहा है। 2025 में देश के बजट का लगभग 13 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ प्रचार-प्रसार में चला गया।
उसके पिछले साल यह लगभग 11 प्रतिशत था और उससे पहले लगभग 9.5 प्रतिशत। यानी प्रचार-प्रसार की दृष्टि से आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत क्या है?
लोकतंत्र पर सवाल: चुनाव आयोग से लेकर न्यायपालिका तक
2025 का एक पहलू यह भी है कि इस देश में जिसके तहत लोकतंत्र जिंदा रहता है, वह भी सवालों के दायरे में आ गया। कल तक राजीव कुमार को जानते थे, आज ज्ञानेश कुमार को जानते हैं। फर्क यह आया कि उस दौर में मशीन का जिक्र था, इस दौर में वोटर लिस्ट का।
परिस्थितियां इतनी नाजुक हो गईं कि पहली बार इस देश ने देश के चीफ जस्टिस पर जूता फेंकते हुए देखा। प्रधानमंत्री ने कहा कि अच्छा है चीफ जस्टिस ने संयम दिखाया। लेकिन इस देश में प्रधानमंत्री को कब बोलना है, कब नहीं बोलना है, यह संविधान तय करता है – वही संविधान जो विवादों के दायरे में है।
बॉलीवुड और क्रिकेट: सरकार की पहुंच हर जगह
इस देश के भीतर शायद कोई ऐसा क्षेत्र 2025 में बचा नहीं जहां सरकार की नीतियां, सोच और विचारधारा नहीं पहुंची। चाहे बॉलीवुड हो या क्रिकेट का मैदान।
विराट कोहली और रोहित शर्मा का जिक्र हो तो सामने गौतम गंभीर नजर आ जाएंगे। अलग-अलग फाइलों को लेकर फिल्में बन रही हैं। किसी को पता ही नहीं चला कि कैसे धीरे-धीरे बॉलीवुड सरकार की फाइलों में दफन हो गया और फाइलों से निकलने वाले स्क्रिप्ट स्क्रीन पर रेंगने लगे।
IMF का खुलासा: भारत के आंकड़ों पर सवाल
आईएमएफ ने इस दौर में एक बड़ा खुलासा किया कि भारत जो आंकड़े देता है, उसमें भी बाजीगरी होती है। अपनी अर्थव्यवस्था की जो शिकन अंदर नजर आती है, उसे छुपाया जाता है। किसी और देश ने ऐसा नहीं किया, लेकिन आईएमएफ को भारत की इकॉनमी को लेकर यह कहना पड़ा।
न्यूजीलैंड में भी विरोध: भारत के साथ फ्री ट्रेड पर सवाल
न्यूजीलैंड जहां से नया साल सबसे पहले मनाया जाता है, वहां की राजनीतिक सत्ता में भी कशमकश है। सत्ता में सहयोग करने वाली दूसरी बड़ी पार्टी कह रही है कि भारत के साथ फ्री ट्रेड को खत्म किया जाए। यह भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि का एक और पहलू है।
सकारात्मक पक्ष: भारत के पास क्या है?
सब कुछ नकारात्मक नहीं है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है। भारत के मौजूदा रईसों की तादाद यूरोप के रईसों को मात कर देती है। भारत आने वाले वक्त में सबसे ज्यादा ग्रोथ के साथ उस कतार में सबसे आगे खड़ा नजर आएगा जहां खर्च करने की व्यवस्था सबसे मजबूत है।
दुनिया के एक दर्जन से ज्यादा देशों के साथ भारत फ्री ट्रेड की दिशा में जुड़ चुका है। लेकिन इन सबके बीच 2026 में कदम हौले-हौले बढ़ाने होंगे।
विश्लेषण: 2025 की सीख और 2026 की चुनौतियां
2025 ने भारत को कई सबक दिए हैं। अर्थव्यवस्था की चमक-दमक के पीछे की हकीकत यह है कि आम आदमी की जेब खाली होती जा रही है। प्रति व्यक्ति आय में गिरावट, बढ़ती असमानता, प्रतिभाओं का पलायन और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बदलती छवि – ये सब मिलकर एक ऐसी तस्वीर बनाते हैं जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है।
2026 में भारत को इन चुनौतियों से निपटना होगा। ट्रंप प्रशासन के साथ संबंध, चीन पर निर्भरता, रुपये की कमजोरी और घरेलू राजनीतिक माहौल – ये सभी कारक मिलकर आने वाले समय की दिशा तय करेंगे। जश्न मनाइए, लेकिन आंखें खुली रखिए।
‘मुख्य बातें (Key Points)’
- रुपये को बचाने की कवायद: आरबीआई ने 2025 में 32 बिलियन डॉलर (लगभग 3.5 लाख करोड़ रुपये) बाजार में बेचे ताकि रुपया डॉलर के मुकाबले 100 के पार न जाए।
- प्रति व्यक्ति आय में गिरावट: भारत चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बना लेकिन प्रति व्यक्ति आय 2013 के स्तर से भी नीचे गिरकर लगभग 89,000 रुपये सालाना रह गई।
- प्रतिभाओं और रईसों का पलायन: भारत ने चीन को पछाड़कर सबसे ज्यादा लोगों के विदेश जाने का रिकॉर्ड बनाया और दुनिया में देश छोड़ने वाले 60 प्रतिशत बिलेनियर्स भारत से हैं।
- बजट का 13 प्रतिशत प्रचार पर: सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार पर खर्च 9.5 प्रतिशत से बढ़कर 13 प्रतिशत हो गया, जबकि 25 लाख करोड़ से ज्यादा का बैंक कर्ज राइट ऑफ किया गया।








