Hindus Minority Status in India : देश में अल्पसंख्यकों (Minorities) की परिभाषा और उन्हें मिलने वाले हक को लेकर एक बहुत बड़ा बदलाव होने की आहट सुनाई दे रही है। जम्मू-कश्मीर और पंजाब सहित देश के 8 राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की तैयारी चल रही है। अगर यह फैसला लागू होता है, तो देश के सामाजिक और सियासी समीकरण पूरी तरह बदल जाएंगे, जिसका सीधा असर उन समुदायों पर पड़ेगा जो अब तक इन राज्यों में अल्पसंख्यक माने जाते रहे हैं।
अधिकारों की नई जंग: किसे मिलेगा, किसका छिन जाएगा?
इस वक्त देश में अल्पसंख्यक का दर्जा राष्ट्रीय स्तर (National Level) पर तय होता है। इसके तहत मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी समुदाय अल्पसंख्यक माने जाते हैं। लेकिन अब पेंच यह फंसा है कि देश के कई राज्य ऐसे हैं जहां हकीकत इसके उलट है।
National Commission for Minorities (राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग) ने इस पूरे मसले पर एक विशेष समिति (Special Committee) बनाई है। यह समिति 14 जून को एक बेहद अहम बैठक करने जा रही है। अगर हिंदुओं को राज्य स्तर पर अल्पसंख्यक माना गया, तो जम्मू-कश्मीर में मुसलमान और पंजाब में सिखों का ‘अल्पसंख्यक दर्जा’ छिन सकता है। इसका मतलब है कि उन्हें मिलने वाली सरकारी सुविधाएं बंद हो सकती हैं।
आंकड़ों का खेल: 2011 की जनगणना क्या कहती है?
इस मांग के पीछे का मुख्य आधार 2011 की जनगणना (Census) है। आंकड़ों के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, पूर्वोत्तर के कुछ राज्य और लक्षद्वीप जैसे क्षेत्रों में हिंदू आबादी संख्या के लिहाज से कम है यानी वे ‘अल्पसंख्यक’ हैं।
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जम्मू-कश्मीर: यहां मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक है।
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पंजाब: यहां सिख समुदाय बहुमत में है।
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लक्षद्वीप: यहां भी मुस्लिम आबादी का दबदबा है।
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पूर्वोत्तर: कई राज्यों में ईसाई समुदाय की संख्या ज्यादा है।
हिंदू पक्ष का तर्क सीधा है—जब हम इन राज्यों में संख्या में कम हैं, तो हमें भी वही संवैधानिक अधिकार और सरकारी लाभ मिलने चाहिए जो बाकी देश में अल्पसंख्यकों को मिलते हैं।
सरकारी खजाने और सुविधाओं पर सीधा असर
अगर यह बदलाव होता है, तो इसका असर आम आदमी की जेब और भविष्य पर पड़ेगा। जिन राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक घोषित होंगे, वहां उन्हें अल्पसंख्यक Scholarship, स्कूल-कॉलेजों में विशेष योजनाओं का लाभ और रोजगार व स्किल डेवलपमेंट (Skill Development) में प्राथमिकता मिल सकती है।
वहीं, दूसरी तरफ चिंता यह है कि अगर राज्य स्तर पर पैमाना तय हुआ, तो जो समुदाय अभी लाभ ले रहे हैं (जैसे पंजाब में सिख या कश्मीर में मुस्लिम), उनकी स्कॉलरशिप, धार्मिक संस्थानों की फंडिंग और कल्याणकारी योजनाएं रुक सकती हैं। कई संगठन इसे सामाजिक संतुलन (Social Balance) बिगाड़ने वाला कदम बता रहे हैं।
विश्लेषण: सिर्फ धर्म नहीं, संसाधनों की लड़ाई
वरिष्ठ संपादकीय विश्लेषण: यह मामला ऊपर से जितना धार्मिक दिखता है, असल में यह संसाधनों और प्रतिनिधित्व (Representation) की लड़ाई है। भारत का संविधान सबको बराबरी का हक देता है, लेकिन ‘अल्पसंख्यक’ की परिभाषा राष्ट्रीय होनी चाहिए या राज्य-स्तरीय, यह एक जटिल संवैधानिक पेंच है। यदि परिभाषा बदलती है, तो यह केवल 8 राज्यों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि भविष्य में जिला स्तर पर भी ऐसी मांगें उठ सकती हैं। यह कदम भारत के संघीय ढांचे (Federal Structure) और सामाजिक ताने-बाने के लिए एक ‘लिटमस टेस्ट’ साबित होगा।
जानें पूरा मामला (Context)
इस पूरी बहस की शुरुआत नवंबर 2017 में हुई थी, जब Supreme Court के वकील अश्विनी उपाध्याय (Ashwini Upadhyay) ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग में एक याचिका दाखिल की थी। उनका तर्क था कि जिन राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक हैं, वहां भी अल्पसंख्यक कल्याण का लाभ उन समुदायों को मिल रहा है जो वास्तव में वहां बहुसंख्यक हैं। इसी याचिका के बाद आयोग ने हाई लेवल कमेटी बनाई है, जो 14 जून की बैठक के बाद केंद्र सरकार को अपनी सिफारिशें भेज सकती है।
‘मुख्य बातें (Key Points)’
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14 जून को बैठक: राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की विशेष समिति इस मुद्दे पर अहम चर्चा करेगी।
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8 राज्य रडार पर: जम्मू-कश्मीर, पंजाब और पूर्वोत्तर के राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक दर्जा देने पर विचार।
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विपरीत प्रभाव: यह नियम लागू होने पर पंजाब में सिखों और कश्मीर में मुस्लिमों का अल्पसंख्यक दर्जा छिन सकता है।
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आधार: 2011 की जनगणना के अनुसार, इन राज्यों में हिंदू आबादी संख्यात्मक रूप से कम है।








