Parliament Winter Session 2025: देश में लोकतंत्र की स्थिति, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया को लेकर संसद के आगामी सत्र में जोरदार बहस होने की संभावना है। विपक्ष इन मुद्दों पर सरकार और चुनाव आयोग को घेरने की तैयारी में है, जबकि सरकार का कहना है कि आयोग अच्छा काम कर रहा है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार हैं, जिनकी भूमिका पर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है।
‘लोकतंत्र के मंदिर’ में लोकतंत्र पर सवाल
सबसे बड़ा सवाल जो उठ रहा है, वह यह है कि क्या लोकतंत्र के मंदिर यानी संसद में लोकतंत्र बचा है या नहीं और क्या इस पर चर्चा की अनुमति मिलेगी। विपक्ष का आरोप है कि सरकार संसद को सिर्फ अपने हिसाब से चलाना चाहती है और लोकतांत्रिक तरीके से विपक्ष की आवाज को दबाया जा रहा है।
अगस्त महीने में 300 से ज्यादा सांसदों का सड़क पर उतरना और ‘वोट चोरी’ के नारे लगाना इस बात का संकेत था कि चुनाव आयोग की भूमिका संदेह के घेरे में है। विपक्ष का मानना है कि चुनाव आयोग अब एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के बजाय सत्ताधारी पार्टी के प्रवक्ता की तरह काम कर रहा है।
SIR प्रक्रिया और BLOs की मौतें: एक गंभीर मुद्दा
संसद में एसआईआर (Special Summary Revision) का मुद्दा जोर-शोर से उठने की संभावना है। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया के तहत बड़े पैमाने पर वोटर लिस्ट में गड़बड़ी की जा रही है और खास विचारधारा के लोगों के वोट काटे जा रहे हैं।
इस प्रक्रिया के दौरान बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLOs) पर काम के अत्यधिक दबाव का मामला भी गरमाया हुआ है। खबरें हैं कि दबाव के चलते दो दर्जन से ज्यादा बीएलओ आत्महत्या कर चुके हैं या उनकी मौत हो चुकी है। हालांकि, चुनाव आयोग ने बीएलओ के वेतन में बढ़ोतरी की है और एसआईआर की समयसीमा भी बढ़ा दी है, लेकिन सवाल उठ रहे हैं कि क्या सिर्फ वेतन बढ़ाना या समय देना ही समस्या का हल है, जब काम का बोझ जानलेवा हो चुका है।
चुनाव आयोग की साख और ज्ञानेश कुमार पर दबाव
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका और उनकी कुर्सी पर खतरे की चर्चाएं तेज हैं। विपक्ष चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहा है और उसकी साख को लेकर गंभीर चिंता जता रहा है।
सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या संसद में इस मुद्दे पर महाभियोग (Impeachment) की बात भी उठेगी या फिर सिर्फ चर्चा होकर रह जाएगी। अगर संसद में विपक्ष को अपनी बात रखने का मौका नहीं मिला, तो क्या वे सड़क पर उतरकर अपना विरोध दर्ज कराएंगे, जैसा कि पहले भी हो चुका है।
सरकार का रुख: ‘सब कुछ ठीक है’
दूसरी ओर, सरकार का मानना है कि चुनाव आयोग बहुत अच्छा काम कर रहा है और एसआईआर की प्रक्रिया भी सुचारू रूप से चल रही है। संसदीय कार्य मंत्री का कहना है कि संसद चलेगी और किसी ने इसे न चलने देने की बात नहीं कही है, हालांकि एसआईआर को लेकर हंगामे की आशंका जताई गई है।
सरकार का नजरिया साफ है कि वह संसद चलाना चाहती है, लेकिन विपक्ष के उठाए मुद्दों पर उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी, यह देखना बाकी है।
सुप्रीम कोर्ट और अन्य संवैधानिक संस्थाओं पर भी सवाल
लोकतंत्र की स्थिति पर बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट और अन्य संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि सीबीआई, ईडी और अब चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट जैसे संस्थान भी सत्ता के प्रभाव में काम कर रहे हैं।
एक तरफ बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे सुप्रीम कोर्ट पर अराजकता फैलाने का आरोप लगाते हैं, तो दूसरी तरफ जमात उलेमा-ए-हिंद के मदनी कहते हैं कि अगर सुप्रीम कोर्ट की साख खत्म हो गई तो उम्मीद किससे बचेगी।
यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि देश के विभिन्न संस्थानों और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों का झुकाव सत्ता की ओर दिखाई दे रहा है, जिससे लोकतंत्र के भविष्य पर सवालिया निशान लग रहे हैं।
मुख्य बातें (Key Points)
संसद सत्र में लोकतंत्र की स्थिति और चुनाव आयोग की भूमिका पर हंगामे के आसार हैं।
विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग सत्ता पक्ष के साथ मिलकर काम कर रहा है।
एसआईआर प्रक्रिया के दौरान बीएलओ पर काम के दबाव और आत्महत्याओं का मुद्दा उठेगा।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की निष्पक्षता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
सरकार का कहना है कि चुनाव आयोग अच्छा काम कर रहा है और संसद चलेगी।








