Voter List Update SIR देशभर में चल रहे मतदाता सूची के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। इस दौरान कोर्ट ने वोटर लिस्ट में ‘घुसपैठियों’ के शामिल होने के मुद्दे पर गंभीर चिंता जताई और चुनाव आयोग को क्लीन चिट देते हुए प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि अगर कोई गड़बड़ी पाई गई, तो वह हस्तक्षेप करने से पीछे नहीं हटेगा।
बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने एक अहम सवाल उठाया। कोर्ट ने पूछा कि क्या सिर्फ आधार कार्ड होने की वजह से किसी गैर-भारतीय को चुनाव में वोट डालने का अधिकार मिल जाना चाहिए? कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आधार कार्ड का मकसद लोगों तक सामाजिक कल्याण योजनाओं का लाभ पहुंचाना है, लेकिन यह वोट देने का अधिकार नहीं देता। आधार कार्ड नागरिकता का पूर्ण प्रमाण नहीं है, बल्कि यह पहचान के दस्तावेजों में से एक है।
‘चुनाव आयोग को है संवैधानिक अधिकार’
सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि चुनाव आयोग को देश भर में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को संचालित करने का संवैधानिक और वैधानिक अधिकार प्राप्त है। कोर्ट ने SIR की आवश्यकता और औचित्य पर उठ रहे सवालों को खारिज कर दिया।
कोर्ट ने बिहार का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां SIR की प्रक्रिया पूरी होने के बाद जमीनी स्तर पर कोई नकारात्मक असर नहीं दिखा। शुरुआत में कहा गया था कि करोड़ों वोटर्स के नाम काटे जा रहे हैं, लेकिन अंत में पता चला कि जिनके नाम कटे, वे या तो मृत थे या बाहर चले गए थे। इस प्रक्रिया पर किसी ने आपत्ति भी दर्ज नहीं कराई।
‘कपिल सिब्बल ने उठाए सवाल’
आरजेडी सांसद मनोज झा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने SIR की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए। उन्होंने तर्क दिया कि देश में करोड़ों निरक्षर लोग हैं जो मतदाता पंजीकरण के लिए जरूरी फॉर्म नहीं भर पाते, जिससे यह प्रक्रिया ‘बहिष्कार का औजार’ बन रही है।
सिब्बल ने कहा कि इलेक्शन कमीशन यह तय करने वाला कौन होता है कि कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक है या नहीं? उन्होंने दलील दी कि अगर 18 साल से ऊपर का कोई व्यक्ति घोषणा करता है कि वह भारतीय नागरिक है और उसके पास आधार कार्ड (जिसमें निवास और जन्मतिथि होती है) है, तो उसे वोटर लिस्ट में शामिल किया जाना चाहिए। नागरिकता साबित करने का बोझ वोटर पर नहीं डाला जा सकता।
‘कोर्ट का सिब्बल को जवाब’
जस्टिस बागची ने सिब्बल के तर्कों का जवाब देते हुए कहा कि 2012 और 2014 में कई राज्यों में मतदाताओं की तादाद वयस्क आबादी से भी ज्यादा पाई गई थी। उन्होंने सवाल किया कि अगर चुनाव आयोग को किसी वोटर की नागरिकता पर संदेह हो, तो क्या उसे जांच का अधिकार नहीं होना चाहिए? अगर आक्रामक पुनरीक्षण होगा, तो कुछ नाम तो हटेंगे ही।
कोर्ट ने साफ किया कि बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) को किसी की नागरिकता जांचने का अधिकार नहीं है। अगर किसी मतदाता पर संदेह है, तो उसका मामला सक्षम प्राधिकारी को भेजा जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि अगर किसी का नाम वोटर लिस्ट से हटाया जाता है, तो उसे हटाने से पहले नोटिस देना अनिवार्य होगा। मामले की अगली सुनवाई गुरुवार को होगी।
‘मुख्य बातें (Key Points)’
सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार किया।
कोर्ट ने कहा, आधार कार्ड सामाजिक लाभ के लिए है, यह वोट का अधिकार या नागरिकता का पूर्ण प्रमाण नहीं देता।
चुनाव आयोग को SIR संचालित करने का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन अनियमितता पर कोर्ट हस्तक्षेप करेगा।
किसी भी वोटर का नाम लिस्ट से हटाने से पहले उसे नोटिस देना अनिवार्य होगा।








