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The News Air - NEWS-TICKER - “क्या एनपीएफएएम से किसानों का भविष्य खतरे में है? एसकेएम ने सभी दलों से मांगी स्थिति स्पष्ट करने की मांग!”

“क्या एनपीएफएएम से किसानों का भविष्य खतरे में है? एसकेएम ने सभी दलों से मांगी स्थिति स्पष्ट करने की मांग!”

"एनपीएफएएम को लेकर एसकेएम ने सभी राजनीतिक दलों से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की, किसान महापंचायत में प्रस्ताव पारित!"

The News Air Team by The News Air Team
शुक्रवार, 3 जनवरी 2025
in NEWS-TICKER, पंजाब, राष्ट्रीय, सियासत
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नई दिल्ली, 03 जनवरी (The News Air) संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने आरोप लगाया है कि एनडीए-3 सरकार द्वारा हाल ही में शुरू की गई कृषि विपणन पर राष्ट्रीय नीति रूपरेखा (एनपीएफएएम) एनडीए-2 सरकार द्वारा निरस्त किए गए तीन कृषि कानूनों से भी अधिक खतरनाक है। यदि इस नीति रूपरेखा को लागू किया जाता है, तो यह राज्य सरकारों के संघीय अधिकारों को खत्म कर देगी और किसानों, खेत मजदूरों, छोटे उत्पादकों और छोटे व्यापारियों के हितों को नष्ट कर देगी, क्योंकि इसमें किसानों और खेत मजदूरों को क्रमशः एमएसपी और न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करने का कोई प्रावधान नहीं है।

इस प्रस्ताव का मुख्य सार मौजूदा कृषि विपणन प्रणाली का मौलिक पुनर्गठन है, जो मूल्य श्रृंखला केंद्रित बुनियादी ढांचे (वीसीसीआई) से जुड़े एक एकीकृत राष्ट्रीय बाजार (यूएनएम) में इसके परिवर्तन का प्रस्ताव करता है। इसका उद्देश्य खेती-किसानी के क्षेत्र में कॉर्पोरेट कृषि व्यवसाय को प्रवेश देना है, ताकि भारत भर में 7057 पंजीकृत बाजारों और 22931 ग्रामीण हाटों को डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के साथ एकीकृत किया जा सके। यह प्रस्ताव मूल्य श्रृंखला के संबंध में विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी (आईएफसी) के दृष्टिकोण के साथ निकटता से जुड़ा हुआ है। वास्तव में एनपीएफएएम में उल्लिखित लक्ष्य है : “कच्चे माल और अन्य इनपुट की खरीद सहित उत्पादन के विभिन्न चरणों के माध्यम से उत्पाद या सेवा लाने के लिए आवश्यक मूल्य वर्धित गतिविधियों की पूरी श्रृंखला।” इस प्रकार यह कृषि उत्पादन और विपणन को इस तरह से एकीकृत करता है, जो छोटे उत्पादकों और किसानों के कल्याण पर कॉर्पोरेट हितों को प्राथमिकता देता है।

कृषि क्षेत्र में इन प्रस्तावित सुधारों का उद्देश्य डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई), ब्लॉकचेन, मशीन लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) जैसी उन्नत तकनीकों के माध्यम से निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों को एकीकृत करने के लिए मूल्य श्रृंखला-आधारित क्षमता-निर्माण ढांचे को फिर से डिजाइन करना है। बहरहाल, ये सुधार विनियमन का भी प्रस्ताव करते हैं, जिससे निजी क्षेत्र – विशेष रूप से, कॉर्पोरेट कृषि व्यवसाय – को उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन पर प्रभुत्व स्थापित करने की अनुमति मिलती है।

किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को इस प्रणाली में प्रमुख खिलाड़ी के रूप में देखा जाता है, जिनका काम बिचौलियों और व्यापारियों को दरकिनार करके कॉर्पोरेट उद्योगों, व्यापार और निर्यात चैनलों को कच्चे माल की सुचारू और सीधी आपूर्ति सुनिश्चित करना है। इस दृष्टिकोण से इन सुधार प्रस्तावों में बड़े निगमों के भीतर नियंत्रण को मजबूत करने, संभावित रूप से छोटे उत्पादकों को हाशिए पर रखने और बाजार में उनकी सौदेबाजी की शक्ति को सीमित करने का जोखिम है।

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किसानों के सामने मौजूद तीखे आय संकट को केवल मूल्य श्रृंखलाओं या ब्लॉक चेन तकनीक जैसे तकनीकी सुधारों के माध्यम से हल नहीं किया जा सकता है। कृषि संकट के मूल में मुख्य रूप से सामाजिक और राजनीतिक कारण है, जो वर्ग विरोधाभासों से उपजा है। किसान कच्चे माल का उत्पादन करते हैं, जो प्रसंस्करण उद्योगों, व्यापार घरानों और निर्यातकों द्वारा नियंत्रित बाजारों में प्रवेश करता है, जो बदले में कीमतें तय करते हैं। बहरहाल, यह नीति दस्तावेज ऐसे किसी भी प्रावधान को संबोधित करने में विफल रहता है, जो इन कॉर्पोरेट ताकतों को – प्रोसेसर, व्यापारियों और निर्यातकों सहित – बाजार से निकाले गए अधिशेष का उचित हिस्सा साझा करने के लिए जवाबदेह बनाता हो। इन प्रस्तावों में किसानों के लिए लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) सुनिश्चित करने का कोई उल्लेख नहीं है, जो कि दिवंगत एम एस स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय किसान आयोग (एनसीएफ) की एक केंद्रीय सिफारिश थी, और वर्तमान में राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।

इन प्रस्तावित सुधारों का उद्देश्य कृषि, भूमि, उद्योग और बाजारों पर राज्य सरकारों के अधिकारों का अतिक्रमण करना है — ये क्षेत्र भारत के संविधान के अनुसार राज्य सूची में आते हैं। कृषि विपणन पर राष्ट्रीय नीति ढांचा (एनपीएफएएम) एक अकेली पहल नहीं है, बल्कि यह अन्य कॉर्पोरेट समर्थक सुधारों के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है, जिसमें माल और सेवा कर (जीएसटी) अधिनियम, डिजिटल कृषि मिशन, राष्ट्रीय सहयोग नीति, चार श्रम संहिताओं को लागू करना और ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ विधेयक आदि शामिल हैं।

भाजपा-आरएसएस गठबंधन के नेतृत्व वाली एनडीए-3 सरकार — कॉरपोरेट ताकतों और विश्व बैंक के प्रभाव में – एनपीएफएएम के माध्यम से राज्य सरकारों के संघीय अधिकारों को खत्म करने का प्रस्ताव कर रही है। यह नीति घरेलू कृषि उत्पादन और खाद्य उद्योग पर बहुराष्ट्रीय निगमों (एमएनसी) और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के वर्चस्व और नियंत्रण को सुगम बनाती है, जिससे भारत की खाद्य सुरक्षा को खतरा पैदा होता है और “एक राष्ट्र एक बाजार” के नारे के साथ इसकी संप्रभुता से समझौता किया जा रहा है।

सभी राजनीतिक दलों के लिए प्रस्तावित एनपीएफएएम पर अपना रुख स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें भारत को स्वायत्त राज्य सरकारों वाले संघीय गणराज्य से एक एकात्मक राष्ट्र में बदलने की क्षमता है, जिसमें एक सत्तावादी केंद्रीय सरकार होगी और अधीनस्थ राज्य सरकारें कॉर्पोरेट हितों और अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी के नियंत्रण में होंगी।

एसकेएम ने एनपीएफएएम को खारिज करने के लिए पंजाब राज्य सरकार और मुख्यमंत्री भगवंत मान को बधाई दी है। एसकेएम ने एनडीए सहित सभी राज्य सरकारों और मुख्यमंत्रियों से अपील की है कि वे इसे खारिज करें और किसानों, मजदूरों, छोटे व्यापारियों, उद्योगपतियों और निर्यातकों सहित सभी शेयरधारकों को शामिल करते हुए लोकतांत्रिक संवाद की मांग करें, ताकि किसानों और छोटे उत्पादकों के सहयोग के आधार पर नए सिरे से कृषि क्षेत्र का वैकल्पिक नीति ढांचा विकसित किया जा सके,जो लोगों और देश के हितों की रक्षा करेगा।

हरियाणा के टोहाना और पंजाब के मोगा में क्रमशः 4 और 9 जनवरी 2025 को किसान महापंचायतों में एनपीएफएएम को निरस्त किए जाने तक निरंतर जन संघर्ष छेड़ने के संकल्प लिए जाएंगे।

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