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The News Air - Breaking News - जनता का ₹3500000,00,00,000 रूपए ‘डूब गया’! सरकार के इस बयान पर क्यों भड़की राजनीति?

जनता का ₹3500000,00,00,000 रूपए ‘डूब गया’! सरकार के इस बयान पर क्यों भड़की राजनीति?

देश के सबसे बड़े वित्तीय घोटाले की पूरी कहानी, जहाँ हर रोज़ 100 कंपनियां बंद हो रही हैं और भगोड़े अपराधी सरकार को ही झूठा बता रहे हैं

The News Air Team by The News Air Team
शनिवार, 6 दिसम्बर 2025
in Breaking News, NEWS-TICKER, अंतरराष्ट्रीय, बिज़नेस, राष्ट्रीय, सियासत
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Bank NPA Scam
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Bank NPA Scam: भारत के बैंकिंग सिस्टम से पिछले एक दशक में लगभग 35 से 48 लाख करोड़ रुपये का पैसा गायब हो गया है। इसमें से बमुश्किल 15 लाख करोड़ की ही रिकवरी हो पाई है, बाकी पैसा कहाँ गया – इसका कोई जवाब नहीं है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जो लोग बैंकों का पैसा लेकर भाग गए, वे अब विदेश से सरकार पर ही आरोप लगा रहे हैं कि “आपने हमसे ज्यादा वसूला है।”


35 लाख करोड़ का खेल: पैसा गया कहाँ?

2016 से लेकर 2025 तक के बीच भारतीय बैंकों से तकरीबन 45 से 48 लाख करोड़ रुपये निकाले गए। यह पैसा इस देश के बड़े-बड़े बिजनेसमैन और कॉर्पोरेट हाउसेस को दिया गया, जिनकी संख्या हजारों-लाखों में थी। जब पैसा लौटाने का समय आया, तो किसी ने कंपनी बंद कर दी, किसी ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया और कोई मर्जर की दिशा में बढ़ गया।

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि सरकार ने इसकी भरपाई “राइट ऑफ” करके कर दी, यानी बैंकों की किताबों से इस पैसे को मिटा दिया गया। इस पूरे खेल में जो इंडस्ट्री फलफूल रही थी, वहां पर भी दबाव आया कि कंपनी को बेच दीजिए। धीरे-धीरे कॉर्पोरेट सेक्टर सिमटता गया और कल तक जो खुद की कंपनी के मालिक थे, वो मालिक भी किसी दूसरी बड़ी कंपनी के साथ जुड़ गए।


2 लाख से ज्यादा कंपनियां बंद: सरकार के पास कोई जवाब नहीं

बीते 5 वर्षों में इस देश की 2 लाख 4268 प्राइवेट कंपनियां बंद हो गईं। यह आंकड़ा सरकार ने खुद संसद में दिया है। लेकिन जब पार्लियामेंट के भीतर पूछा गया कि इतनी कंपनियां बंद हो गई हैं तो इनमें काम करने वाले लोग कहाँ गए, उनके पास कोई काम बचा है या नहीं, तो सरकार ने कहा – “हमें नहीं पता, हम इसकी जिम्मेदारी नहीं ले सकते क्योंकि वह प्राइवेट कंपनी के हिस्सेदार थे।”

सोचिए, हर दिन औसतन 100 से ज्यादा कंपनियां इस देश में बंद हो रही थीं। सिर्फ 2022-23 में 83,452 कंपनियां एक ही साल में बंद हुईं। 2021-22 में भी 64,000 कंपनियां बंद हुई थीं और 2024-25 में 20,365 कंपनियां बंद हुईं। देश में कुल 28 लाख से ज्यादा कंपनियां रजिस्टर्ड हैं, लेकिन एक्टिव सिर्फ 18 लाख हैं।

सरकार से जब पूछा गया कि इतनी कंपनियां बंद होने की वजह क्या है, तो कहा गया कि देखिए कंपनियों का मर्जर हो गया, कंपनियों ने सरकार को रिकॉर्ड देना बंद कर दिया, कारोबार नहीं चल रहा था, मुनाफा कम हो गया। जब पूछा गया कि क्या उन्होंने कर्ज भी लिया था और क्या कर्ज लौटाया, तो जवाब था – कर्ज लौटाया नहीं। वसूली कैसे करते? कोई आईबीसी के दरवाजे पर, कोई NCLT के दरवाजे पर – सब कुछ तो इस देश में चल रहा है।


SBI का चौंकाने वाला डेटा: 1.41 लाख करोड़ राइट ऑफ

देश का सबसे बड़ा सार्वजनिक बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के आंकड़े आँखें खोल देने वाले हैं। SBI ने अपने तौर पर जो डॉक्यूमेंट दिया और उस पर जो अध्ययन किया गया, उसमें जानकारी आई कि 2016-17 से लेकर 2023-24 तक सरकार ने SBI का 1 लाख 41,515 करोड़ रुपये राइट ऑफ कर दिया।

इसमें से रिकवरी सिर्फ 17,584 करोड़ की हुई। 2017 के बाद से 2023 तक के बीच में जो हेयरकट चल रहा था, वो तकरीबन 83,637 करोड़ का था। यानी जो पैसा बैंक ने दिया, उसका बहुत बड़ा हिस्सा कभी वापस नहीं आया।

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अब आपको कुछ समझ में आने लगा होगा कि दरअसल यह सरकार इतनी रईस कैसे है और उसकी रईसी में इस देश के भीतर लाभार्थियों की तादाद बढ़ते-बढ़ते 50 करोड़ से ज्यादा क्यों हो गई है।


कौन से सेक्टर में सबसे ज्यादा पैसा डूबा?

NCLT और IBC के आंकड़ों के मुताबिक, जो सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित हुए:

सेक्टरपूंजी डूबने का प्रतिशत
स्टील इंडस्ट्री58%
कंस्ट्रक्शन75%
मैन्युफैक्चरिंग77%
रियल एस्टेट72%
फार्मा83%
टेक्सटाइल83%

यानी जिन सेक्टर्स को सरकार ने 11 वर्ष पहले सत्ता में आने के बाद आगे बढ़ाया – स्टील, कंस्ट्रक्शन, मैन्युफैक्चरिंग, रियल एस्टेट, फार्मा, टेक्सटाइल और बाद में फूड एंड बेवरेज – उन सबमें बैंकों का पैसा डूब गया। रिकवरी बड़ी न्यूनतम है और डूबना ज्यादा हो रहा है।


NCLT के दरवाजे पर 20,000 से ज्यादा कंपनियां खड़ी

IBC (इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड) ने बताया कि उसने 26 लाख करोड़ के मामलों को सुलझाने में मदद की। टोटल जो मामला था जो कंपनियों के जरिए आया था, उस 26 लाख करोड़ में से 1200 केस में 12 लाख करोड़ का मामला था और लगभग 3000 केस में 14 लाख करोड़ का मामला था जो NCLT सुलझा रही थी। यह 2016 से 2025 तक के बीच का वाकया है।

टॉप 10 बैंक डिफॉल्टर्स यानी टॉप 10 बड़ी कंपनियों के जो बैंक डिफॉल्टर थे, वो तकरीबन 8,44,000 करोड़ के थे। एनपीए 4 लाख करोड़ से ज्यादा हो गया है और 2000 से ज्यादा कंपनियां NCLT के दरवाजे पर खड़ी हुई हैं। अभी 2025 में जब हम बात कर रहे हैं तो 20,000 से ज्यादा कंपनियां NCLT के दरवाजे पर हैं।

NCLT इसलिए लाई गई सामने कि जो इंडस्ट्री या जो भारत के भीतर बिजनेसमैन है, जो कॉर्पोरेट है, जो बड़ी इंडस्ट्री चला रहा है, उसके सामने कोई मुसीबत ना आए और उसका निदान सरकार खोजेगी। लेकिन यह तो किसी ने नहीं सोचा कि निदान ऐसा होगा कि पैसा उठाते चले जाओ, उसके बाद उस कंपनी में अपने आप को दिवालिया या मर्जर की परिस्थिति में लाकर खड़ा कर दो, बाकी सरकार के नियम-कायदे देख लेंगे।


15 भगोड़े आर्थिक अपराधी: 26,645 करोड़ का नुकसान

वित्त राज्य मंत्री ने संसद में जानकारी दी कि 31 अक्टूबर 2025 तक इस देश के 15 व्यक्तियों को भगोड़ा आर्थिक अपराधी (FEO) घोषित किया गया है। इन 15 लोगों ने 9 सार्वजनिक बैंकों को जबरदस्त नुकसान पहुँचाया है। कितना नुकसान? खुद सरकार ने कहा 26,645 करोड़ का नुकसान बैंकों को पहुँचाया गया है।

इन भगोड़ों में विजय माल्या, नीरव मोदी, नितिन संदेशरा, सुदर्शन वेंकट रमन, रामानुम शेख रत्नम, चेतन संदेशरा, दीप्ति संदेशरा, पुष्पेंद्र कुमार वैद और हितेश पटेल के नाम बताए गए। यह भाग गए हैं और पैसा लौटाते नहीं हैं।

यह भी कहा गया कि जो पैसा नहीं लौटाया गया उसमें जो 26,645 करोड़ है, इसमें अगर एनपीए का इंटरेस्ट जोड़ दीजिए तो यह तकरीबन 31,347 करोड़ हो जाएगा। फिर कहा गया कि हमने 19,187 करोड़ की वसूली की है, यानी कुल मिलाकर जो बकाया था वो 12,000 करोड़ का बचा हुआ है – अगर सरकार की बात मान लें तो।


विजय माल्या केस: सरकार और बैंक के आंकड़ों में भारी अंतर

मुंबई हाईकोर्ट में एक मामला पहुँचा विजय माल्या का। विजय माल्या का कहना था कि दरअसल हमसे जितना वसूल लिया गया है वो तो ज्यादा वसूल लिया गया है। लेकिन सरकार जिन बातों का जिक्र पार्लियामेंट में करती है और बैंक जिन बातों का जिक्र करते हैं कि हमारा इतना पैसा विजय माल्या के चक्कर में डूब गया – दोनों का मिलान तो कर लीजिए।

विजय माल्या के वकील ने चीजों को रखा सामने और कहा कि वित्त मंत्री ने संसद में कहा 14,100 करोड़ वसूले गए हैं। लेकिन बैंक ने जो दस्तावेज शामिल किया उसमें कहा गया 10,000 करोड़ वसूले गए। अब दोनों के बीच नंबर का चक्कर है और नंबर छोटा-मोटा नहीं है – 4,100 करोड़ कहाँ गए? यह पहला सवाल किया गया।

राज्य मंत्री ने अपने तौर पर संसद में बताया कि अभी भी उन पर 10,000 करोड़ का बकाया है। बैंक से पूछा गया कितना बकाया है तो बैंक ने कहा 7,000 करोड़ का बकाया है। फिर 3,000 करोड़ का गड़बड़ झाला हो गया। यानी वसूली की गई रकम में बैंक अलग कह रहा है, सरकार अलग कह रही है। जो बकाया है वो बैंक अलग कह रहा है, सरकार अलग कह रही है।

दिसंबर 2024 में सरकार ने कहा था कि हमने 1,594 करोड़ की रिकवरी कर ली है और नवंबर में कहा 14,100 करोड़ की वसूली की गई – उसमें भी वेरीफाई नहीं हो पा रहा। यानी पार्लियामेंट के भीतर रखे गए डॉक्यूमेंट्स और बैंकों के अपने डॉक्यूमेंट्स मेल नहीं खा रहे। और यह बात कौन कह रहा है? वो शख्स जो इस देश के बैंकों का पैसा लेकर फरार हो गया। कोर्ट कह रही है आप हिंदुस्तान लौट के आइए, लेकिन वो शख्स कह रहा है लौटेंगे तो उसके बाद क्या होगा हमें नहीं पता।


ED के 6200 केस: सिर्फ 120 दोषी करार

जितने लोग भी इस देश को छोड़कर भाग गए, सबके पीछे ED लगी। इन्फोर्समेंट डायरेक्टोरेट ने अपने तौर पर मनी लॉन्ड्रिंग का केस सबके खिलाफ बनाया। सभी देश छोड़कर भागते चले गए। जो भाग गए वो बाहर से कह रहे हैं हमसे ज्यादा वसूल लिया गया।

मंत्री महोदय ने पार्लियामेंट में ही जानकारी दी कि ED के पास 2014 से 2019 तक 791 केसेस आए थे और 2020 से 2025 तक 5,521 केसेस आए हैं। यानी कुल मिलाइए तो यह लगभग 6,200 केसेस हो जाते हैं। इनमें 120 लोगों को दोषी पाया गया।

इसमें बड़ी महत्वपूर्ण बात यह है कि पिछले वित्तीय वर्ष (अप्रैल 2024 से मार्च 2025) में 775 केस थे, उसमें सिर्फ 15 ही दोषी पाए गए। अगर एक केस में एक व्यक्ति भी दोषी नहीं है या एक दोषी एक केस से जुड़ा है – संयोग से 120 लोग जो दोषी पाए गए उसमें तीन दर्जन लोग ऐसे हैं जो कई केसेस में संलग्न थे। इसका मतलब यह है कि इस देश के भीतर लगभग 6,200 केसेस में से 6,100 केसेस में किसी को पकड़ा ही नहीं जा सका।


मैन्युफैक्चरिंग और इंडस्ट्रियल ग्रोथ धराशायी

सरकार ने खुद जानकारी दी कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का जो ग्रोथ है वह सिर्फ 1.8% है, जो पहले की तुलना में काफी नीचे आ गया है। माइनिंग सेक्टर में भी नीचे आ गया है। पावर सेक्टर में भी नीचे आ गया है। अगर इंडस्ट्रियल आउटपुट देखेंगे तो लगभग बीते सवा बरस में सबसे नीचे चला गया है – 0.4% तक पर आकर खड़ा हो गया है।

भारत के भीतर जो कोयला निकाला जाता है, उस कोयले को निकालने में भी हम बहुत नीचे 3.7% पर आ गए हैं। यह अप्रैल से नवंबर तक का इस फाइनेंशियल ईयर का आंकड़ा है। कोयला प्रोडक्शन भी नीचे आ गया है।


सरकारी बैंकों में हिस्सेदारी बेचने की तैयारी

सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी कैसे कम की जाए और अब कॉर्पोरेट के साथ-साथ बैंकों को भी शामिल कर लिया जाए – इसी दिशा में बैंक ऑफ महाराष्ट्र की 6% हिस्सेदारी सरकार बेचने जा रही है। इससे लगभग 2,600 करोड़ का लाभ होगा।

कुछ दिनों पहले वित्त मंत्री ने कहा कि बड़े-बड़े बैंक चाहिए तभी देश का ग्रोथ हो पाएगा। बड़े बैंकों का मतलब होता है बैंकों का भी मर्जर। जो कंपनियों का मर्जर हो रहा था जिस पर से सरकार ने आंखें मूंद ली कि 2 लाख से ज्यादा कंपनियां जो बंद हुईं उसमें सबसे बड़ी वजह मर्जर की थी – अब बैंक और प्राइवेट कंपनी को सरकार दोनों को दो अलग-अलग दृष्टि से देखती है।


मुद्रा योजना: 50 करोड़ खातों में 34 लाख करोड़ बाँटे

सरकार खुद कहती है कि मुद्रा योजना के तहत लगभग इस देश के 50 करोड़ से ज्यादा खातों में 34 लाख करोड़ बाँट दिए हैं। गरीब कल्याण योजना को अगर माइनस भी कर दें तो भी उसमें एक बड़ा हिस्सा मुद्रा योजना का आता है। गरीब कल्याण योजना के लाभार्थियों की तादाद बढ़ते-बढ़ते 50 करोड़ से ज्यादा हो गई है।

यह सारे आंकड़े सुनकर आपको लगेगा यह खेल हो क्या रहा है? यह देश चल कैसे रहा है और इसे चलाया कैसे जा रहा है?


NPA का असली आंकड़ा: 16 लाख करोड़ पार

जो NPA का खेल है उसका ईयर वाइज डेटा निकाला गया तो चौंकाने वाली स्थिति थी। NCLT के जरिए जो 35 लाख करोड़ का खेल नजर आ रहा है जो उठाया गया, उन सबके बीच NPA अपने तौर पर बतलाता है कि लगभग 1 लाख करोड़ जो खुद सरकार ने कहा, उतने पैसे NPA के जरिए अलग-अलग तरीके से दिए गए।

सरकारी बैंकों का NPA पिछले 10-11 वर्षों में 13,21,260 करोड़ रुपये रहा। अगर इसमें प्राइवेट बैंक और फॉरेन बैंक्स को भी जोड़ दें, तो यह 16 लाख करोड़ को पार कर जाता है।


कॉर्पोरेट सेक्टर में कुछ ही हाथों में सब कुछ

इस देश के भीतर सबसे बड़ा बिजनेस क्या है? कंपनियों को खोलकर बैंकों से लोन लेकर सरकार से नजदीकी रखते हुए या तो भाग जाइए या फिर नए तरीके सरकार ने ही नए कानूनों के जरिए निकाल दिए हैं जहां आपको कोई मुश्किल नहीं होगी। राहत-रियायत होगी क्योंकि सरकार चाहती है कि इस देश में मिनिमम प्लेयर रहें जिनके हाथों में इस देश को चलाने की क्षमता हो।

वही कानून अपने तौर पर बताएगा कि आपके लिए कौन सा रास्ता है। उस कंपनी को किसी दूसरी कंपनी के हिस्से में डाल दिया जाएगा, उस कंपनी के साथ कोई और बड़ी कंपनी जुड़ जाएगी। जैसे स्टील के क्षेत्र में जो पैसा 58% डूबा, कर्ज लेने वाली कंपनियों ने नहीं लौटाया। वो कौन सी कंपनी थी और उस कंपनी को दूसरी किस कंपनी ने खरीद लिया? जब इस दायरे में आइएगा तो आपके सामने इस देश के टॉप 20 बड़े कॉर्पोरेट ही खड़े होंगे जिनकी भागीदारी, हिस्सेदारी, साझीदारी सरकार के साथ है। और इन 20 बड़े कॉर्पोरेट में से 11 बड़े कॉर्पोरेट गुजरात से आते हैं।


आम आदमी के लिए अलग नियम, कॉर्पोरेट के लिए अलग

प्राइवेट लोन लीजिए और नहीं लौटाइएगा तो जेल तक की स्थिति आएगी। यहां तक कि क्रेडिट कार्ड का भी पैसा नहीं लौटाइएगा तो मुश्किल में आ जाइएगा। पशुधन को लेकर बकरियां बैंक उठाके ले जाती है। गाय-भैंस ले जाती है गांव से। खेती का लोन लेते हैं तो वहां फंस जा रहा है मामला। लेकिन इस फील्ड में करोड़ों के वारे-न्यारे होते चले जा रहे हैं और कोई पूछने वाला क्यों नहीं है?

इंस्टीट्यूशन हो, बैंक हो, बैंकों पर निगरानी रखने के लिए कंपनियां या सरकारी संस्थाएं जो काम कर रही हैं और सरकारी संस्थाओं में काम करने वाले नौकरशाह हैं – यह एक पूरी साइकिल ऐसी क्यों ना बना दी जाए? हर के पास ताकत है, हर को राहत है, हर को अपराध की छूट है। और इन सबके बीच सरकार के पास नोट छापने की मशीन है।


क्या है पूरी पृष्ठभूमि?

2014 के बाद से सरकार ने कुछ सेक्टर्स को आगे बढ़ाने पर जोर दिया – स्टील, कंस्ट्रक्शन, मैन्युफैक्चरिंग, रियल एस्टेट, फार्मा, टेक्सटाइल और फूड एंड बेवरेज। इन सेक्टर्स की कंपनियों को बैंकों से भारी लोन दिए गए। दावा था कि भारत का बाजार बड़ा है, इंफ्रास्ट्रक्चर में निजीकरण होगा, लाखों करोड़ खर्च होंगे। नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन बनाई गई।

लेकिन हुआ यह कि कंपनियों ने पैसा उठाया, दिवालिया हो गईं या मर्जर हो गया। बैंकों का पैसा डूब गया। सरकार ने कानून बना दिए जिससे इन कंपनियों को राहत मिले। और आम आदमी? वह क्रेडिट कार्ड का पैसा नहीं लौटाए तो मुश्किल में पड़ जाता है। किसान का खेती का लोन फंस जाए तो बैंक उसकी गाय-भैंस तक उठा ले जाती है। लेकिन करोड़ों के वारे-न्यारे होते जा रहे हैं और कोई पूछने वाला नहीं।


भारत दुनिया में अकेला देश

बचेंगे सिर्फ तीन-चार बड़े सवाल। भारत दुनिया का एकमात्र देश है जहां एवरेज 100 कंपनियों से ज्यादा प्रतिदिन बंद हो रही हैं। भारत दुनिया का एकमात्र देश है जहां पर बैंकों से कर्ज लेकर भागने वाले और उनकी रकम की जानकारी जो सरकारी तौर पर संसद में सरकार ने रखी वो सबसे ज्यादा है।

भारत दुनिया का एकमात्र देश है जहां पर अपराधी जो भगोड़ा है वह भी सरकार के ही डाटा को बताकर कह रहा है कि आप गलत जानकारी दे रहे हैं, झूठ बोल रहे हैं और सरकार और बैंक के बीच के डाटा मैच नहीं कर पा रहे हैं। भारत दुनिया का एकमात्र देश है जहां पर NPA की रकम को जो राइट ऑफ किया जाता है बैंकों की बुक ठीक करने के लिए, वो रकम दुनिया भर के तमाम देशों की तुलना में सबसे ज्यादा भारत के भीतर है। और भारत दुनिया का एकमात्र देश है जिसकी ग्रोथ रेट दुनिया में सबसे ज्यादा बताई जा रही है।


मुख्य बातें (Key Points)
  • 35-48 लाख करोड़ गायब: 2016 से 2025 के बीच बैंकों से निकाले गए इस पैसे में से सिर्फ 15 लाख करोड़ की रिकवरी हुई, बाकी डूब गया।
  • 2 लाख कंपनियां बंद: बीते 5 वर्षों में हर दिन औसतन 100 से ज्यादा कंपनियां बंद हुईं, और सरकार के पास कोई जवाब नहीं है।
  • ED के 6200 केस, 120 दोषी: मनी लॉन्ड्रिंग के हजारों केस में सिर्फ 120 लोग दोषी करार हुए।
  • भगोड़े सरकार को झूठा बता रहे: विजय माल्या जैसे भगोड़े अब सरकार के ही आंकड़ों को चुनौती दे रहे हैं और सरकार व बैंक के डाटा में भारी अंतर सामने आ रहा है।

 

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